हरीश राणा को कैसे दी जाएगी इच्छामृत्यु? सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद अब आगे का प्रोसेस क्या है

Passive Euthanasia Process: भारत में इच्छामृत्यु की मंजूरी मिलने के बाद भी प्रक्रिया तुरंत पूरी नहीं होती. अस्पताल की एथिक्स कमेटी, दो मेडिकल बोर्ड, परिवार की सहमति और मजिस्ट्रेट की निगरानी जैसे कई चरण पूरे किए जाते हैं.

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Passive Euthanasia Process: कैसे दी जाती है इच्छामृत्यु

Passive Euthanasia Process: हरीश राणा केस में इच्छा मृत्यु की इजाजत मिलने के बाद फिर से इस मुद्दे पर एक चर्चा सी शुरू हो गई है. कुछ लोगों को लगता है कि ये फैसला सही है. जबकि कुछ लोग इस फैसले को सही नहीं मानते. लंबे समय से गंभीर बीमारी और असहनीय दर्द से जूझ रहे लोगों के लिए ये मुद्दा संवेदनशील भी है और जटिल भी. इस केस में भी भारत में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सख्त शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया यानी लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है. हालांकि किसी मामले में इच्छामृत्यु की मंजूरी मिल जाना अंतिम कदम नहीं है. इसके बाद भी कई कानूनी और मेडिकल प्रोसेस का पालन करना पड़ता होगा, ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि फैसला पूरी तरह सही और मरीज के हित में है.

अस्पताल की एथिक्स कमेटी की समीक्षा

इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद सबसे पहले अस्पताल की एथिक्स कमेटी या मेडिकल बोर्ड पूरे मामले की दोबारा जांच का नियम है. ये टीम डॉक्टरों और विशेषज्ञों से मिलकर बनेगी. वो मरीज की बीमारी, मेडिकल रिपोर्ट और इलाज की स्थिति का विस्तार से अध्ययन करेंगे. इसका मकसद ये सुनिश्चित करना होता है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना वास्तव में नहीं बची है.

दूसरा मेडिकल बोर्ड भी करेगा पुष्टि

नियम के मुताबिक पहले मेडिकल बोर्ड की राय के बाद एक दूसरा स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड भी मरीज की स्थिति की समीक्षा करेगा. ये कदम इसलिए जरूरी होता है ताकि किसी भी तरह की गलती या जल्दबाजी से बचा जा सके. दोनों बोर्ड अगर एक ही नतीजे पर पहुंचते हैं. तभी प्रोसेस आगे बढ़ाया जाएगा.

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मरीज की ‘लिविंग विल' या परिवार की सहमति

अगर मरीज ने पहले से लिविंग विल यानी अपनी अंतिम इच्छा लिखकर दी है. तो उसी के आधार पर फैसला लिया जाता है. अगर ऐसी कोई लिखित इच्छा नहीं है. तो परिवार के करीबी सदस्य जैसे माता-पिता, जीवनसाथी या बच्चे अपनी सहमति देते हैं. इस सहमति को रिटन में भी दर्ज किया जाता है.

मजिस्ट्रेट की निगरानी

भारत में इच्छामृत्यु प्रोसेस में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की भूमिका भी अहम होती है. मजिस्ट्रेट ये सुनिश्चित करते हैं कि मरीज की इच्छा और परिवार की सहमति बिना किसी दबाव के दी गई है. नियम के मुताबिक इसके बाद ही अंतिम मंजूरी दी जाएगी.

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लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया

सभी मंजूरियों के बाद डॉक्टरों की टीम को नियंत्रित और मानवीय तरीके से लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना होगा. इस दौरान मरीज को दर्द न हो. इसके लिए पेलिएटिव केयर (दर्द कम करने वाला ट्रीटमेंट) दिया जा सकता है. पूरी प्रक्रिया मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार और रिकॉर्ड के साथ की जानी जरूरी है. इसमें मरीज को कोई जहरीला इंजेक्शन या दवा नहीं दी जा सकती है, क्योंकि ऐसे मामले एक्टिव यूथेनेशिया में आते हैं, जिसकी इजाजत भारत में नहीं है. 

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