Aspirants sandeep bhaiya story : अगर आप यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं या नहीं भी कर रहे हैं तो भी शायद 'Aspirants' वेब सीरीज के संदीप भैया का नाम तो आपने सुना होगा. एक ऐसा किरदार जिसने लाखों UPSC स्टूडेंट्स की सच्चाई को पर्दे पर उतार दिया. सालों की मेहनत, दिन-रात की पढ़ाई और एक ही सपना, अधिकारी बनना. लेकिन जब आखिरी अटेंप्ट भी निकल गया और रिजल्ट नहीं आया, तो ऐसा लगा जैसे सब खत्म हो गया. दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर प्रयागराज तक, हजारों स्टूडेंट्स हर साल इसी डर के साथ जीते हैं. अगर आप भी उसी मोड़ पर खड़े हैं, तो समझ लीजिए कि कहानी खत्म नहीं हुई, बस रास्ता बदलने का वक्त आया है.
संदीप भैया के साथ क्या हुआसंदीप भैया ने अपनी जिंदगी के कई साल UPSC की तैयारी में लगा दिए. लेकिन जब आखिरी अटेंप्ट में भी सफलता नहीं मिली, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था, अब क्या. उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी तैयारी को ही अपनी ताकत बना लिया. उन्होंने स्टेट PCS की तरफ रुख किया और फिर असिस्टेंट लेबर कमिश्नर बनकर अपनी नई पहचान बनाई. यानी सपना बदला, लेकिन मकसद वही रहा, समाज की सेवा करना.
UPSC में अटेंप्ट और नियमUPSC में अटेंप्ट कैटेगरी के हिसाब से तय होते हैं. जनरल कैंडिडेट्स को 32 साल तक 6 मौके मिलते हैं. ओबीसी को 35 साल तक 9 अटेंप्ट दिए जाते हैं. SC-ST कैंडिडेट्स 37 साल तक अनलिमिटेड अटेंप्ट दे सकते हैं. ध्यान रखने वाली बात ये है कि अटेंप्ट तभी गिना जाता है, जब आप प्रिलिम्स का पेपर देते हैं.
अटेंप्ट खत्म हो जाए तो क्या करेंअगर आपके सारे अटेंप्ट खत्म हो गए हैं, तो भी कई रास्ते खुले हैं. स्टेट PCS जैसे UPPSC, BPSC और MPPSC के जरिए आप SDM या DSP बन सकते हैं. SSC CGL के जरिए ग्रुप-B अधिकारी बनकर भी शानदार करियर बनाया जा सकता है. UGC NET के जरिए प्रोफेसर बनने का मौका मिलता है.
इसके अलावा एड-टेक कंपनियों में कंटेंट क्रिएटर, मेंटर या करंट अफेयर्स एक्सपर्ट बनकर भी अच्छा भविष्य बनाया जा सकता है. बड़े एनजीओ और थिंक-टैंक को ऐसे लोगों की तलाश रहती है, जिन्हें देश की पॉलिसी, इकोनॉमी और समाज की गहरी समझ हो. आपकी यूपीएससी की पढ़ाई यहां आपको दूसरों से बहुत आगे रखती है.
मेहनत कभी बेकार नहीं जातीUPSC की तैयारी आपको एक अलग नजरिया देती है. अगर अटेंप्ट खत्म हो गए हैं, तो ये मत सोचिए कि सब खत्म हो गया. संदीप भैया की तरह खुद को संभालिए, दिशा बदलिए और फिर से आगे बढ़िए. क्योंकि असली जीत वही है, जब आप हार के बाद भी खड़े हो जाते हैं.
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