- भारत के पास पर्याप्त कोयला भंडार और मजबूत सप्लाई सिस्टम है, जिससे बिजली संकट का खतरा कम है.
- रिकॉर्ड कोयला उत्पादन और नीतिगत सुधारों ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है.
- मिडिल ईस्ट में टकराव के बावजूद भारत की बिजली व्यवस्था स्थिर रहने की संभावना है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट के डर में डाल दिया है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन में बाधाएं और जियो-पॉलिटिकल जोखिम ने कई देशों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी की हैं पर इन सब के बीच इस बार भारत की स्थिति थोड़ी अलग है. संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि देश के पास पर्याप्त कोयला भंडार यानी काला सोना और ऊर्जा संसाधन मौजूद हैं. उन्होंने भरोसा दिलाया कि मौजूदा वैश्विक संकट के बावजूद भारत की बिजली व्यवस्था पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा. यह केवल राजनीतिक आश्वासन नहीं था बल्कि प्रधानमंत्री का दावा एक लंबी रणनीतिक तैयारी का नतीजा है.
दरअसल, भारत ने पिछले एक दशक के दौरान जिस तरह कोयला यानी 'काला सोना' को अपनी ऊर्जा सुरक्षा का मुख्य आधार बनाया है, वह आज संकट के समय उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आ रहा है. कोयले को इसके अहम आर्थिक महत्व और व्यापक उपयोग के कारण काला सोना या ब्लैक गोल्ड कहा जाता है.
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भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. देश की लगभग 70% बिजली अभी भी कोयले से ही बनती है. ऐसे में अगर कोयले की सप्लाई मजबूत है, तो बिजली व्यवस्था भी मजबूत रहती है. इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में है कोल इंडिया लिमिटेड- जो दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है और इसने वित्त वर्ष 2024 में 770 मिलियन टन से अधिक उत्पादन किया है, जो देश के कुल घरेलू कोयला उत्पादन का करीब 80% है. इसके अलावा कई प्राइवेट और कैप्टिव माइनिंग प्रोजेक्ट्स ने भी उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है.
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रिकॉर्ड कोयला उत्पादन हासिल किया है. यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक बदलाव का संकेत भी है, जहां देश ने आयात पर निर्भरता घटाकर घरेलू संसाधनों को प्राथमिकता दी है. हालांकि भारत कोयला आयात भी करता है. जो कि 2024-25 में करीब 248.5 मिलियन टन था. लेकिन विदेशी निर्भरता को लगातार कम किया जा रहा है. यही वजह है कि वर्तमान वित्त वर्ष के दौरान कोयले के आयात में 4.2 फीसद की कमी आई है.
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कैसे तैयार हुआ यह मजबूत मॉडल?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति तीन बड़े स्तंभों पर टिकी है. पहला स्तंभ, रिकॉर्ड उत्पादन और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ना है. सरकार ने कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं. इसमें कमर्शियल माइनिंग की अनुमति देना, निजी कंपनियों को इस सेक्टर में एंट्री देना और तेज क्लियरेंस प्रक्रिया शामिल है. इन कदमों की वजह से उत्पादन में तेजी आई और आयात पर निर्भरता कम हुई.
दूसरा स्तंभ, मजबूत स्टॉकपाइल यानी भंडारण करना है. पहले कई बार ऐसा होता था कि बिजली घरों में कोयले की कमी हो जाती थी. देश के विभिन्न हिस्सों में बिजली की कटौती हुआ करती थी. लेकिन अब सरकार ने पावर प्लांट्स में न्यूनतम स्टॉक बनाए रखने का नियम सख्ती से लागू किया है. आज देश के अधिकांश थर्मल पावर प्लांट्स के पास पर्याप्त कोयला स्टॉक मौजूद है, जो कई दिनों तक बिजली उत्पादन को बिना रुकावट जारी रख सकता है.
तीसरा स्तंभ सप्लाई चेन मैनेजमेंट में सुधार करना है. जितना अहम कोयले की उपलब्धता बनाए रखना है, उतना ही जरूरी उसका सही समय पर पहुंचना यानी ढुलाई का समय है. सरकार ने इसके लिए तमाम उपाय किए जिनमें रेलवे नेटवर्क का विस्तार, मालगाड़ी के रैक्स बढ़ाए गए, इनकी डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम की सुचारू व्यवस्था की गई. इससे कोयले की घरेलू सप्लाई भरोसेमंद बनती चली गई और यही कारण है कि आज बिजली संयंत्र अनवरत चल रहे हैं.
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देश की लगभग 74 प्रतिशत बिजली कोयला आधारित बिजली संयंत्रों द्वारा उत्पन्न की जाती है
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मिडिल ईस्ट संकट में भी क्यों नहीं डगमगाएगी बिजली?
मध्य-पूर्व यानी मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और हॉर्मुज स्ट्रेट से मालवाहक जहाजों के आवागमन पर पड़े असर ने सीधा तेल की कीमतों पर असर डाला. भारत में इस्तेमाल किए जाने वाले कुल तेल का करीब 85 फीसद हिस्सा आयात होता है और उसमें भी इस हॉर्मुज स्ट्रेट से ही कुल आयातित तेल का करीब 80 फीसद हिस्सा आता है. ऐसे में जहां इसके कुछ मालवाहक जहाज हॉर्मुज से कुछ पहले रुक गए थे वहीं तेल की बढ़ती कीमतों ने अर्थव्यवस्था पर दबाव भी डाला.
अभी फिलहाल इसका गुनात्मक असर नहीं दिखा तो इसकी वजह सरकार के पास तेल का भंडार होना है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्याप्त बताया है. उन्होंने देश की संसद को बताया कि देश के पास इस समय 53 लाख मिट्रिक टन की कैपेसिटी है. और 65 लाख मिट्रिक टन तक कैपेसिटी बढ़ाने पर काम चल रहा है. तेल कंपनियों के पास अलग से तेल रिजर्व होते हैं.
ऐसे में अगर इसकी कीमतें आगामी कुछ दिनों या हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में नियंत्रित हो गई तो संभवतः भारत में तेल की कीमतें बढ़ाने की जरूरत ही न पड़े. या फिर इसकी कीमतों में बहुत कम इजाफा किया जाए ताकि इसके गुनात्मक असर को आम आदमी तक पहुंचने से रोका जा सके. पर इन सब के बीच देश में बिजली का उत्पादन अपेक्षाकृत सुरक्षित है. बिजली के उत्पादन में तेल की हिस्सेदारी बहुत कम है. देश में कोयला आधारित बिजली पर ज्यादा निर्भरता है और इसका घरेलू उत्पादन मजबूत है. इसका मतलब यह है कि अगर तेल की कीमतें बढ़ती भी हैं, तो भारत की बिजली सप्लाई पर तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ेगा.
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भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकता के लगभग 55 प्रतिशत के लिए कोयले पर निर्भर है
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क्यों बढ़ा कोयले का महत्व?
कुछ साल पहले तक दुनिया भर में कोयले को धीरे-धीरे खत्म करने की बात हो रही थी. जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के कारण इसे ‘पुरानी ऊर्जा' माना जा रहा था. लेकिन हाल के वैश्विक संकटों ने यह दिखा दिया कि अक्षय ऊर्जा अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है. गैस और तेल की सप्लाई अनिश्चित हो सकती है. यानी बेसलोड पावर के लिए कोयला अभी भी जरूरी है. भारत ने इस हकीकत को जल्दी समझ लिया और कोयले को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे आधुनिक तकनीक के साथ इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई.
अप्रैल से दिसंबर 2024 तक भारत के कोयला आयात में 8.4 प्रतिशत की गिरावट आई. वहीं वर्तमान वित्त वर्ष के दौरान कोयले के आयात में 4.2 फीसद की कमी आई है
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सरकार ने क्या नीतिगत बदलाव किए?
भारत की कोयला नीति में पिछले वर्षों में कई बड़े बदलाव हुए. इसकी कमर्शियल माइनिंग की शुरुआत हुई. पहले कोयला खनन लगभग पूरी तरह सरकारी कंपनियों के हाथ में था. लेकिन अब निजी कंपनियों को भी खनन की अनुमति दी गई है, जिससे प्रतिस्पर्धा और उत्पादन दोनों बढ़े हैं. इसके साथ ही सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम विकसित किया गया है. पहले खनन परियोजनाओं की मंजूरी में सालों का वक्त लगता था लेकिन अब यह प्रक्रिया पहले के मुकाबले तेज और पारदर्शी हुई है. सरकार ने बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया है. कोयला खदानों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है.
ऐसे में कोयले के क्षेत्र में भारत के सामने आगे कई अवसर हैं. इसमें ऊर्जा आत्मनिर्भरता सबसे पहले आता है क्योंकि फिलहाल घरेलू कोयले के दम पर ही भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को खुद पूरा कर सकता है. कोयला मंत्रालय ने बीते शनिवार (21 मार्च, 2026) को जारी अपनी एक प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी दी कि देश ने लगातार दूसरे साल रिकॉर्ड 1 बिलियन टन कोयला उत्पादन किया है. यह उपलब्धि उसे एनर्जी सेक्टर में आत्मनिर्भरता और मुख्य उद्योगों को बिना किसी रुकावट फ्यूल सप्लाई पक्का करने की दिशा में बड़ा अहम है. साथ ही कोयला के क्षेत्र में बढ़ते उत्पादन से खनन और उससे जुड़े उद्योगों में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं. साथ ही भारत क्लीन कोल टेक्नोलॉजी, गैसीफिकेशन और कार्बन कैप्चर जैसे क्षेत्रों में भारत आगे बढ़ सकता है.
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बढ़ रहा है
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आगे क्या हैं चुनौतियां?
बेशक भारत ने बिजली उत्पादन में करीब-करीब आत्मनिर्भरता हासिल की है. हालांकि यह तस्वीर पूरी तरह आसान भी नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरणीय दबाव का है. कोयला प्रदूषण का बड़ा स्रोत है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सर्जन कम करने का दबाव बढ़ रहा है. इसके अलावा लॉजिस्टिक की बाधाएं भी हैं. हालांकि बड़े स्तर पर इसमें सुधार हुआ है, फिर भी ट्रांसपोर्टेशन अब भी एक बड़ी चुनौती है. इसके अलावा फाइनेंश और निवेश भी एक बड़ी चुनौती है. दुनिया का झुकाव ग्रीन एनर्जी की तरफ है, इसकी वजह से कोयला आधारित किसी भी प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग जुटा पाना एक बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.
2070 तक नेट जीरो लक्ष्य कैसे हासिल होगा?
मोदी सरकार ने 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन) हासिल करने का लक्ष्य रखा है. जब कोयले पर इतनी अधिक निर्भरता है तो यह लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकेगा? दरअसल, सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन (अक्षय ऊर्जा यानी सौर, पवन और हाइड्रोजन) पर आधारित बिजली क्षमता हासिल करने की दिशा में काम कर रही है. इसी के तहत मुफ्त बिजली योजना लाई गई जिसमें 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाकर सौर ऊर्जा को मुख्य स्रोत बनाने की योजना आई. इसी दिशा में कोयला का गैसीकरण किया जा रहा है. इसके जरिए 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण करने का लक्ष्य है, जो स्वच्छ ऊर्जा विकल्प प्रदान करता है.
केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने इसी हफ्ते (22 मार्च 2026) को भारत विद्युत शिखर सम्मेलन 2026 को संबोधित करते हुए बताया कोयला गैसीकरण भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, आयात पर निर्भरता कम करने और औद्योगिक विकास को सहयोग देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
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कोयला का गैसीकरण स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प देता है
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कोयला गैसीकरण बनेगा 'गेमचेंजर'
कोयला गैसीकरण तकनीक में कोयले को सिंथेटिक (हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड के विभिन्न अनुपातों में मिश्रण) गैस में परिवर्तित किया जाता है.
इस समय देश में कोयले की वार्षिक मांग लगभग एक अरब टन है, जिसके 2047 तक काफी बढ़ने की उम्मीद है. इसलिए ऊर्जा की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है. लिहाजा सरकार ने राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू किया है जिसका लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण करना है.
यही कारण है कि भारत ने एक संतुलित नीति अपनाई है. उसने एक तरफ सोलर और विंड एनर्जी को बढ़ावा दिया है तो दूसरी ओर कोयले को बेसलोड के रूप में बनाए रखा. सरकार का लक्ष्य है कि भविष्य में अक्षय ऊर्जा का एनर्जी सेक्टर में हिस्सा बढ़े लेकिन तब तक कोयला ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बना रहेगा.
आज यह 'काला सोना' देश की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है. इसके बल पर ही देश में बिजली निर्बाध चल रही है. इसके रिकॉर्ड उत्पादन, मजबूत स्टॉक और बेहतर सप्लाई चेन ने भारत को इस मुकाम तक पहुंचाया है कि मिडिल ईस्ट संकट का असर यहां की बिजली पर नहीं पड़ा है.













