Explainer: तिजोरी नहीं, गुफाओं में बंद है देश का 'असली खजाना', मिडिल ईस्ट संकट के बीच कहां है पेट्रोलियम रिजर्व

मिडिल ईस्ट संकट के बीच 'रणनीतिक तेल भंडार' की काफी चर्चा हो रही है. भारत के पास भी अपने रिजर्व तेल भंडार हैं. आखिर ये क्या होता है? आइए बताते हैं.

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  • मिडिल ईस्ट के संकट के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कमी से निपटने के लिए देश रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाते हैं
  • भारी मात्रा में तेल को जमीन के नीचे बनी प्राकृतिक या नमक की गुफाओं में सुरक्षित रखा जाता है
  • भारत में विशाखापट्टनम, मैंगलोर और पाडुर में कुल तीन स्थानों पर भूमिगत तेल भंडार की क्षमता 3.9 करोड़ बैरल है
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मिडिल ईस्ट के मौजूदा संकट को देखते हुए दुनिया भर में कच्चे तेल की किल्लत का डर एक बार फिर से पैदा हो सकता है. इस तरह के वैश्विक संकटों से निपटने के लिए दुनिया के कई देश अपने यहां 'स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (Strategic Petroleum Reserves) यानी रणनीतिक तेल भंडार रखते हैं. यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे संकट के दिनों के लिए हम और आप बैंक में पैसे बचाकर रखते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर काम आएं. लेकिन एक पूरे देश की जरूरत के लिए करोड़ों बैरल तेल को रखने के लिए सिर्फ बड़े-बड़े कंटेनर्स या गोदामों के भरोसे नहीं रहा जा सकता, इसलिए इसका असली ठिकाना जमीन के बहुत नीचे होता है. आज हम इन्हीं पेट्रोलियम रिजर्व के बारे में बता रहे हैं.

जमीन के नीचे कुदरती गुफाओं में रहता है तेल

शायद कई लोग यह नहीं जानते कि भारी मात्रा में कच्चे तेल को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के देश जमीन के नीचे बनी कुदरती गुफाओं का सहारा लेते हैं, जिन्हें मजबूत करके पेट्रोलियम के भंडार के लिए तैयार किया जाता है. मजबूत चट्टानों के बीच बनी ये गुफाएं इन हाइड्रोकार्बन्स को रखने का सबसे सुरक्षित तरीका मानी जाती हैं.

दुनिया के कुछ देश जैसे अमेरिका अपने टैक्सस और लुइसियाना प्रांत में जमीन के नीचे नमक की बड़ी-बड़ी गुफाओं का इस्तेमाल भी कच्चा तेल स्टोर करने के लिए करते हैं. इन गुफाओं के नमक को पानी में घोलकर पंप के ज़रिए निकाल लिया जाता है और उस खाली जगह को तेल भंडार में बदल दिया जाता है. भारत के राजस्थान और गुजरात में भी ऐसी नमक की गुफाएं मौजूद हैं, हालांकि अभी उनका इस्तेमाल तेल भंडारण के लिए नहीं किया गया है.

भारत में कहां हैं ये रिजर्व और कितनी है क्षमता?

भारत में इन भूमिगत गुफाओं में तेल के रणनीतिक भंडार को बनाने और सुरक्षित रखने का काम 'इंडियन स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिज़र्व्स लिमिटेड' (ISPRL) करता है. यह संस्थान पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत आने वाले ऑयल इंडस्ट्री डेवलपमेंट बोर्ड का हिस्सा है.

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फिलहाल भारत के पास तीन जगहों पर कच्चे तेल के अंडरग्राउंड स्टोरेज मौजूद हैं-

  • विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश): 1 करोड़ बैरल क्षमता
  • मैंगलोर (कर्नाटक): 1.1 करोड़ बैरल क्षमता
  • पाडुर (कर्नाटक): 1.8 करोड़ बैरल क्षमता

यानी फिलहाल कुल 3.9 करोड़ बैरल तेल जमा करने की क्षमता है. भविष्य की जरूरतों को देखते हुए सरकार दो नए रिज़र्व भी तैयार करने जा रही है, जिसमें 2.7 करोड़ बैरल क्षमता वाले ओडिशा के चांदीखोल और 1.5 करोड़ बैरल क्षमता वाले पाडुर के दूसरे चरण का निर्माण शामिल है. इसके बाद भारत की कुल क्षमता बढ़कर 7.8 करोड़ बैरल हो जाएगी.

इमरजेंसी में कितने दिन काम आएगा यह तेल?

यह रणनीतिक रिजर्व भारत की तेल कंपनियों के पास पहले से मौजूद ऑयल रिज़र्व के अलावा है. यह रिजर्व महज़ 8 से 9 दिन की आपात जरूरत को पूरा कर सकता है. इसके अलावा देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के पास भी 64 दिन के कच्चे तेल की जरूरतों के बराबर स्टॉक होता है. कुल मिलाकर भारत में 74 दिन की जरूरत का कच्चा तेल स्टोर किया जा सकता है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी का भी कहना है कि भारत के पास कई हफ्तों के तेल का स्टॉक मौजूद है.

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कच्चे तेल के इन भूमिगत रिजर्व्स से तेल को सीधे पाइपलाइन के ज़रिए रिफाइनरी तक पहुंचाया जाता है. सरकारों की यह कोशिश रहती है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम कम हों, तो वो इसी पाइपलाइन के जरिए रिजर्व में हुई कमी की भरपाई कर लें.

Petroleum Reserves

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कैसे आया इस 'इमरजेंसी रिजर्व' का विचार?

तेल को इस तरह रिजर्व रखने की जरूरत पांच दशक पहले पश्चिम एशिया के एक संकट के दौरान ही महसूस हुई थी. 1973 के इज़रायल और अरब देशों के बीच हुए योम किपुर युद्ध में जब अमेरिका ने इजरायल की मदद की, तो अरब देशों ने तेल की सप्लाई घटा दी थी. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बेतहाशा बढ़ गए, जिसे '1973-74 का ऑयल शॉक' कहा जाता है. इसके बाद अमेरिका ने सबसे पहले अपना ऑयल रिजर्व तैयार किया और 1974 में 'इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी' (IEA) का गठन हुआ, जिसमें 30 देशों ने 90 दिन का तेल रिजर्व रखने का फैसला किया.भारत 2017 में इसका एसोसिएट सदस्य बना.

भारत को इसकी अहमियत 90 के दशक में खाड़ी युद्ध के दौरान गहराई से समझ आई, जब देश के पास सिर्फ तीन दिन का तेल रिजर्व बचा था. उस भयानक ऊर्जा संकट से सबक लेते हुए 1998 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह विचार रखा और 2005 में मनमोहन सरकार के दौरान इस पर असल काम शुरू हुआ.

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पहली बार कब हुआ इस रिजर्व का इस्तेमाल?

इन भंडारों का इस्तेमाल सिर्फ आपात समय में किया जाता है. मिसाल के तौर पर, नवंबर 2021 में जब रूस और सऊदी अरब की अगुवाई वाले तेल उत्पादक देशों का संगठन OPEC+ ने तेल का उत्पादन घटाने का फैसला किया था, तब तेल की कीमतें बढ़ने का बड़ा खतरा पैदा हो गया था. उस आर्थिक चुनौती से निपटने के लिए भारत ने पहली बार अपने तेल रिजर्व का इस्तेमाल किया था. यह एक कूटनीतिक फैसला था जो अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया के साथ बातचीत के बाद लिया गया था.

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