भारत ने एडवांस परमाणु रिएक्टर प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के जरिये परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में जो बड़ी उपलब्धि हासिल की है, वो उसे एनर्जी सेक्टर में न केवल आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि देश में सस्ती और सुलभ बिजली का रास्ता भी साफ होगा. परमाणु बिजली बनाने के लिए भारत को अब ईंधन के लिए भी कनाडा जैसे देशों की ओर ताकने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. दरअसल, परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण में PFBR रिएक्टर ने ऐसी स्टेज (क्रिटिकैलिटी) हासिल कर ली है, जिससे संयंत्र खुदबखुद ईंधन पैदा करेगा और बिजली भी बनाएगा. तीसरे चरण में ईंधन के तौर पर थोरियम की जरूरत पड़ेगी, लेकिन गर्व की बात ये है कि भारत में थोरियम का सबसे बड़ा 25 फीसदी का भंडार है.
भारत में बिजली की तेजी से बढ़ती खपत
देश में 2047 तक आबादी शायद 150 करोड़ के पार हो चुकी होगी. घटती गरीबी, तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग और शहरीकरण के कारण बिजली की खपत तेजी से बढ़ी है. भारत को बिजली उत्पादन बढ़ाने के साथ उसकी कीमतों को काबू में रखने की दोहरी चुनौती भी है. भारत को जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के उत्पादन को भी सीमित रखना है. ऐसे में परमाणु संयंत्रों से पैदा होने वाली बिजली बड़ा बदलाव लाएगी. तमिलनाडु के कलपक्कम के PFBR रिएक्टर ने क्रिटिकैलिटी का टारगेट पा लिया है. इससे परमाणु विखंडन में इतने न्यूट्रॉन पैदा होने लगते हैं कि अपनेआप न्यूक्लियर रिएक्शन होने लगता है. और परमाणु बिजली बनने लगती है.
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भारत में कौन सी बिजली कितनी सस्ती
1. परमाणु ऊर्जा की बात करें तो पुराने परमाणु संयंत्रों (जैसे तारापुर 1-2) की बिजली 92 पैसे से ₹1.20 प्रति यूनिट तक सस्ती हो सकती है. हालांकि नए नाभिकीय संयंत्रों जैसे कुडनकुलम की बिजली 4 से 6 रुपये प्रति यूनिट के बीच होती है.
2. जल विद्युत संयंत्र :पुराने बांधों की बिजली सबसे सस्ती होती है, लेकिन देश में जो नए बड़े जल विद्युत संयंत्र बन रहे हैं, उनसे बिजली उत्पादन की लागत 5 से 7 रुपये प्रति यूनिट तक हो सकती है. विस्थापन और पर्यावरण संबंधी मुआवजे की लागत अधिक होती है.
3. कोयला (Thermal Plants): पुराने कोयला संयंत्रों की बिजली 3.50 से 5 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है, लेकिन कोयले की बढ़ती कीमतों, ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ती चिंता और परिवहन खर्च के कारण नए प्लांट की लागत 6 से 8 रुपये तक जा सकती है.
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परमाणु ऊर्जा क्यों सस्ती
हाइड्रो प्लांट साल भर एक समान बिजली नहीं दे सकते, क्योंकि गर्मियों में पानी कम हो जाता है. परमाणु संयंत्र साल के 365 दिन बराबर बिजली देते हैं, जिससे पावर ग्रिड को स्थिरता मिलती है. बैकअप पावर की जरूरत नहीं पड़ती.
कम जगह में तैयार नाभिकीय ऊर्जा
एक परमाणु संयंत्र को उतनी ही बिजली बनाने के लिए बेहद कम जगह की जरूरत पड़ती है. जबकि जल विद्युत संयंत्र के लिए बड़े बांध बनाने पड़ते हैं और हजारों एकड़ जंगल डूब जाते हैं. टिहरी डैम इसका उदाहरण है. कलपक्कम के PFBR जैसे रिएक्टरों के आने से भारत अपनी पुरानी परमाणु राख (Waste) को ही ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर पाएगा. इससे भविष्य में बिजली की दरें और कम होंगी.
भारत में अभी बिजली उत्पादन की क्षमता
- 524 गीगावॉट तक है. इसमें 47.4 फीसदी कोयला-गैस संयंत्रों से है.
- 51.2 गीगावॉट हाइड्रो पावर है, जो कुल उत्पादन का 9.8 फीसदी है.
- परमाणु बिजली संयंत्रों से 8.8 GW यानी करीब 1.7 फीसदी उत्पादन होता है.
- 216 गीगावॉट यानी करीब 27 फीसदी सौर ऊर्जा उत्पादन
- 10.5 फीसदी हिस्सेदारी पवन ऊर्जा उत्पादन की है
2047 तक कितना लक्ष्य
एटामिक पावर - 100 गीगावॉट- 5 प्रतिशत
सौर ऊर्जा - 1200 गीगावॉट- 57 प्रतिशत
पवन ऊर्जा- 400 गीगावॉट - 19 प्रतिशत
हाइड्रो प्लांट- 116 गीगावॉट- 5.5 प्रतिशत
थर्मल प्लांट - 250 गीगावॉट - 12-13 प्रतिशत














