- उत्तर बंगाल में टीएमसी की पकड़ कमजोर, बीजेपी का दबदबा बढ़ा.
- कूचबिहार में अंदरूनी बगावत और टिकट विवाद से पार्टी परेशान.
- ममता और अभिषेक का दौरा- वापसी की कोशिश या बढ़ती चिंता का संकेत.
राजनीति की यात्राओं का भी अपना एक मौसम होता है, वो (मौसम) नहीं जिसे मौसम विभाग बताता है, बल्कि वो माहौल जो किसी नेता के ईर्द-गिर्द बनता है, जब वो राजधानी कोलकाता से निकलकर उन इलाकों में जाती हैं, जहां यादें भी हैं और रहस्य भी. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पिछले हफ्ते कोलकाता में टीएमसी का घोषणापत्र जारी करने के बाद अचानक उत्तर बंगाल की ओर रुख करना कुछ ऐसा ही संकेत देता है, जैसे राज्य की सियासी हवा का रुख बदल गया हो. अब तक दक्षिण बंगाल और कोलकाता की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली ममता बनर्जी अब एक अलग ही सियासी हवा को परखती नजर आ रही हैं.
उत्तर बंगाल में ममता का आक्रामक दौरा
कुछ यात्राएं सिर्फ बाहर की नहीं होतीं, वो अंदर की भी होती हैं. ममता बनर्जी का पिछले तीन दिनों का उत्तर बंगाल दौरा भी ऐसा ही है. ऊपर से ये पूरी तरह रणनीतिक दिखता है मयनागुड़ी, डाबग्राम-फुलबाड़ी, नक्सलबाड़ी में रैलियां. स्कूल मैदानों में भाषण. पुलिस और प्रशासन की कड़ी तैयारियां. बेशक यह एक बेहद सुनियोजित और रणनीतिक कवायद है. पर यहां एक पुरानी कहानी को फिर से पढ़ा जा रहा है- एक ऐसी नेता की कहानी, जो आमजनों के साथ अपनी निकटता के लिए जानी जाती हैं, जो बाजारों और गलियों से गुजरते हुए, अब उन निर्वाचन क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं जो लंबे समय से उनकी आवाज के प्रति उदासीन रहे हैं.
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ममता को चुनौती 'भगवा ब्रिगेड' से, न कि पुरानी 'लाल ब्रिगेड' से
ऐतिहासिक रूप से, नक्सलबाड़ी ही वह जगह थी जहां सीपीआईएम की शुरुआत हुई थी, और यहीं से 'नक्सल आंदोलन' का जन्म हुआ. लेकिन यह बात दशकों पुरानी है, 1967 से 1969 के दौर की, जब चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में माओवादियों ने किसानों का विद्रोह शुरू किया था. मगर ममता बनर्जी उस पुराने क्रांतिकारी क्षेत्र में वामपंथी चुनौतियों का सामना करने नहीं, बल्कि एक बिल्कुल अलग रंग की चुनावी चुनौती से निपटने और बीजेपी की भगवा ब्रिगेड से टक्कर लेने पहुंची हैं.
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आंकड़ों में छुपी सच्चाई
किसी भी राजनीतिक सफर में आंकड़े हमेशा स्पष्ट तस्वीर और साफ-साफ सच बताने वाले साथी होते हैं. 2021 विधानसभा चुनाव में उत्तर बंगाल में टीएमसी की हालत कमजोर रही टीएमसी को 215 में से केवल 23 सीटें मिलीं थीं, जबकि बीजेपी ने 77 में से 30 सीटें अपने नाम कर लीं. हालांकि वोट शेयर के मामले में 44.53% मत झटक कर टीएमसी बेशक 42.27% वोट लाने वाली बीजेपी से आगे रही थी. यानी मुकाबला बेहद करीबी थी, लेकिन संदेश साफ था कि उत्तर बंगाल पर ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर हो रही है.
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उत्तर बंगाल का मिजाज अलग, राजनीति भी अलग
पश्चिम बंगाल को अगर लोगों की भावनाओं और वहां के इतिहास के नजरिए से बांटे तो उत्तर बंगाल वहां की एक अलग दुनिया पेश करता है. यहां की पहचान, भाषा, संस्कृति और सियासी सोच राज्य के अन्य इलाकों के मुकाबले बिल्कुल अलग है. ममता बनर्जी के लिए ये सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि एक नए इलाके में खुद को साबित करने की चुनौती है. ममता को अब राज्य के इस हिस्से में एक 'योग्य प्रवासी' बनकर जाना होगा. सिर्फ़ दिखने के लिए नहीं, बल्कि अपनी बात सुनाने, पहचान बनाने, माफी पाने और लोगों को मनाने के लिए.
कूचबिहार में टीएमसी में अंदरूनी बगावत
आजकल कूच बिहार में एक अजीब सी बेचैनी फैली हुई है, मानो चाय की दुकान पर होने वाली दबी-दबी बातें अब सत्ता के ऊंचे गलियारों तक पहुंच गई हों. टीएमसी जो लंबे समय से बंगाल की राजनीति के उतार-चढ़ाव की आदी रही है. हालात ये हैं कि अब वो खुद को अलग-अलग दिशाओं में खिंचता हुआ पा रही है. यह खिंचाव किसी बाहरी दुश्मन की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर से उठने वाली असंतोष की आवाजों के कारण है. जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस जिले में पार्टी की रग-रग में असंतोष फैल गया है. इसकी वजह से जो मुकाबला कभी बेहद सीधा-सादा था वो अब अधिक उलझा हुआ और पेचीदा बन गया है.
खोकन मियां का ही उदाहरण ले लीजिए. उनका इस्तीफा किसी अचानक हुए बड़े टकराव जैसा नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर फैली बड़ी अशांति की एक छोटी मगर बहुत कुछ कह जाने वाली स्वीकारोक्ति जैसा लगता है. खोकन मियां कभी रबींद्रनाथ घोष के बेहद करीबी हुआ करते थे. घोष 20 साल से भी अधिक समय से जिले में पार्टी की कमान मजबूती से संभाले हुए थे. अब खोकन मियां पाला बदलकर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए हैं. ऐसे मौकों पर, वफादारी किसी एक बड़ी गद्दारी की वजह से नहीं बदलती, बल्कि इसलिए बदलती है क्योंकि कई लोगों को अपने पैरों के नीचे की जमीन ही डगमगाती हुई महसूस होने लगती है.
विधायक और मंत्री रह चुके घोष को भी चुपचाप किनारे लगा दिया गया. पार्टी ने उन्हें नटाबाड़ी सीट से चुनाव लड़ने का टिकट देने से मना कर दिया था. उनकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह बेहद शांत और संयमित रही. कुछ समय के लिए वे पीछे हट गए. यह बोलते हुए कि, "मैं कुछ समय के लिए ब्रेक ले रहा हूं और अभी आराम कर रहा हूं." उनके इस छोटे से वाक्य में एक ऐसे इंसान का गहरा दुख छिपा है, जिसने अपनी आंखों के सामने उम्मीदों के दीए को बुझते देखा है और अब वह सोच रहा है कि क्या ये दीए कभी फिर से जल पाएंगे.
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पुराने नेताओं में असंतोष
लेकिन यह बेचैनी सिर्फ उनकी ही नहीं है. पार्टी के कई अन्य वरिष्ठ नेता, जैसे कि पूर्व मंत्री बिनय कृष्ण बॉर्मन और जितेन बॉर्मन, और सुचिस्मिता देब शर्मा (जो जिले में पार्टी की महिला मोर्चा की प्रमुख हैं) भी टिकट न मिलने के कारण चुनावी दौड़ से बाहर हो गए हैं. उन्होंने कोई जोरदार बगावत नहीं की लेकिन चुनाव प्रचार में उनकी चुप्पी और गैर-मौजूदगी ही सबसे ज्यादा खटक रही है. राजनीतिक पटल पर यह एक ऐसा 'खालीपन' है, जिस पर पर्यवेक्षकों की नजरें पड़े बिना नहीं रह पातीं. 2021 में, बीजेपी ने कूच बिहार जिले की 9 में से 7 विधानसभा सीटें जीतीं.
ये दरारें ऐसे माहौल में सामने आ रही हैं जो पहले से ही काफी मुश्किल है. 2021 में, बीजेपी जिले की नौ विधानसभा सीटों में से सात पर काबिज हुई थी, यानी तृणमूल के पास बमुश्किल ही थोड़ी जमीन बची थी. हालांकि बाद में हुए उपचुनाव में एक सीट उसे वापस मिल गई. लेकिन कुल मिलाकर अब भी बीजेपी का ही पलड़ा भारी है. जब कोई पार्टी, जो कभी किसी जगह पर खुद को पूरी तरह जमा हुआ महसूस करती थी, अब खुद को बस कुछ ही जगहों पर सिमटी हुई पाती है, तो चिंताएं और बढ़ जाती हैं.
एक और बड़ी समस्या है प्रतिनिधित्व की. पार्टी के इस फैसले से लोगों को काफी ठेस पहुंची है कि उसने जिले के बड़े मुस्लिम समुदाय से किसी भी उम्मीदवार को चुनाव में नहीं उतारा. मुस्लिम समुदाय के कई लोगों के लिए, राजनीति महज लेन-देन का जरिया नहीं बल्कि उनकी मौजूदगी का सवाल है, यह देखने का सवाल है कि सत्ता के गलियारों में उनकी कोई झलक दिखाई देती भी है या नहीं. एक स्थानीय नेता ने इस भावना को साफ शब्दों में जाहिर किया, “क्या अल्पसंख्यक लोग सिर्फ वोट बैंक बनकर ही रह जाएंगे, क्या सिर्फ रैलियों में भीड़ जुटाने और वोट डालने के लिए ही उनकी मौजूदगी मायने रखेगी पर क्या नेतृत्व नहीं करेंगे? चार सीटें सामान्य वर्गों के लिए हैं, कम से कम एक पर तो इस समुदाय का कोई चेहरा जरूर होना चाहिए था.”
अभिषेक बनर्जी की एंट्री
इसी उथल-पुथल भरे माहौल में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की एंट्री होती है, जो 26 मार्च को नाटाबाड़ी से अपना चुनाव अभियान शुरू करने वाले हैं. उनके आने का मकसद हालात को संभालना और स्थिरता लाना है. यह एक ऐसा मौका है जब पार्टी की बिखरी हुई कड़ियों को फिर से जोड़ा जा सके और स्थानीय कार्यकर्ताओं को पार्टी के बड़े लक्ष्यों और विचारधारा की याद दिलाई जा सके. अब यह देखना बाकी है कि क्या इससे लोगों के जख्म भर पाएंगे, या फिर यह सिर्फ उन पर एक दिखावटी मरहम लगाने जैसा ही साबित होगा.
सवाल यही है कि क्या इससे हालात सुधरेंगे या सिर्फ ऊपर से सब ठीक दिखेगा? वफादारी या अपनी पुरानी आदतानुसार कुछ स्थानीय नेता जोर देकर कह रहे हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है. लेकिन कूच बिहार में पार्टी अब एक पुरानी राजनीतिक पहेली का सामना कर रही है. रैलियों की तैयारी, पुलिस की निगरानी, मंचों की सजावट, यहां सब कुछ एक बड़े सियासी शो जैसा लगता है. लेकिन असली जीत सिर्फ भीड़ से नहीं मिलती. बीजेपी की बढ़त सिर्फ योजनाओं से नहीं आई, बल्कि लोगों के मन में अपनी जगह बनाने से आई है.
उत्तर बंगाल की जटिलता
यहां चाय बागान के मजदूर हैं, नेपाली भाषी समुदाय है, पहाड़ी और मैदान की अलग-अलग पहचान है. यहां सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं, पहचान और अस्मिता को समझना जरूरी है. पहले ममता बनर्जी दक्षिण बंगाल और कोलकाता की निर्विवाद नेता थीं. अब वो खुद उन इलाकों में जा रही हैं जो पहले उनकी प्राथमिकता नहीं थे. ये बदलाव उनकी मजबूरी भी है और उनकी रणनीति भी.
सवाल ये है कि क्या कोलकाता में बना घोषणापत्र जलपाईगुड़ी के चाय बागान या दार्जिलिंग की पहाड़ियों तक असर डालेगा? इसका जवाब बड़ी रैलियों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे भरोसे में छुपा है. ऐसे में ममता बनर्जी का उत्तर बंगाल दौरा सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि चिंता और महत्वाकांक्षा दोनों का संकेत है. ये सिर्फ सीट जीतने की लड़ाई नहीं, बल्कि भरोसा वापस पाने की जंग है.
अभी के लिए, उत्तर बंगाल कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री का मुख्य केंद्र बन गया है. वहां वो स्कूलों के मैदानों और बाजारों के चौराहों पर भाषण देंगी; वह लोगों की तालियों का अंदाजा लगाएंगी और उनकी चिंताओं को समझेंगी. अगर राजनीति आखिरकार लोगों के करीब रहने का ही एक तरीका है, तो यह बनर्जी की एक बार फिर लोगों के करीब आने की कोशिश है. अपने चुनावी घोषणापत्र की बातों को लोगों के साथ सीधे जुड़ाव में बदलने की कोशिश. क्या यह नजदीकी काफी होगी? क्या उनकी मौजूदगी लोगों की पसंद में बदल पाएगी? यह एक बहुत ही नाजुक सवाल बना हुआ है और इसी जगह पर इस यात्रा का भविष्य तय होगा, जो झंडों और माइक्रोफोन से नहीं, बल्कि लोगों की सहमति की उन हल्की, निर्णायक हवाओं से तय किया जाएगा जिन्हें बनाया नहीं जा सकता, बल्कि एक जोरदार और कड़ी चुनावी मेहनत से ही कमाया जा सकता है.
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