पूर्व सेना प्रमुख की किताब को लेकर उठा राजनीतिक गतिरोध गहराया, जानिए क्या है विशेषज्ञों की 'रूल 349' पर राय!  

इस राजनीतिक गतिरोध ने लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों (Rules of Procedure and Conduct of Business) को फोकस में ला दिया है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की पुस्तक से चुनिंदा विवरण उद्धृत करने के राहुल गांधी की मांग को नियम 349 के तहत खारिज किया था.

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नई दिल्ली:

पिछले 22 साल में पहली बार विपक्ष के भारी हंगामे के बीच गुरुवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित करना पड़ा. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक गतिरोध सोमवार को शुरू हुआ, जब सदन में विपक्ष के नेता, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एम.एम. नरवणे द्वारा लिखी एक अप्रकाशित किताब को कोट करने पर अड़ गए जिसमें उन्होंने 2020 में लद्दाख में भारत-चीन सीमा झड़प के बारे में विवादित  तथ्य लिखे हैं.

पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब को कोट करने की राहुल गांधी की मांग से उठे राजनीतिक गतिरोध के कारण इस पूरे हफ्ते लोक सभा में कामकाज ठप रहा, जिससे एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई. इसकी वजह से लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बड़ी बहस में न तो लोकसभा में विपक्ष के नेता, राहुल गांधी और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाग ले सके.

इस राजनीतिक गतिरोध ने लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों (Rules of Procedure and Conduct of Business) को फोकस में ला दिया है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की पुस्तक से चुनिंदा विवरण उद्धृत करने के राहुल गांधी की मांग को नियम 349 के तहत खारिज किया था, ये कहते हुए कि उनकी किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. नियम 349 के अनुसार जब सदन की बैठक चल रही हो, कोई सदस्य- (i) सदन के तय बिज़नेस से अलग कोई भी पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ेगा.

इस किताब का हवाला देते हुए लोकसभा स्पीकर ने कहा था कि अखबार की कटिंग पर, कोई किताब पर, कोई ऐसा विषय जो ऑथेंटिक नहीं हैं उन विषयों पर सदन में चर्चा की परम्परा नहीं रही है...आपने मुझसे नियम के लिए सवाल पूछा है. मैं आपको पहले नियम बता देता हूँ. नियम 349. ऐसी पुस्तक, समाचार पत्र नहीं पढ़ा जायेगा, जिसका सभा की कार्यवाही से कोई संबंध न हो. मैं दूसरा नियम पढ़ देता हूँ. नियम सबके लिए हैं. नियम 353 भी देख लीजिये.

महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राहुल गांधी को कारवां मैगज़ीन से कोट करने की अनुमति देने से इंकार करते हुए नियम 349 के साथ ही नियम 353 का भी हवाला दिया. नियम 353 में कहा गया है कि किसी सदस्य द्वारा किसी भी व्यक्ति के खिलाफ मानहानिकारक (defamatory) या अभियोगात्मक ( incriminatory) प्रकृति का कोई भी आरोप तब तक नहीं लगाया जाएगा जब तक कि सदस्य ने अध्यक्ष और संबंधित मंत्री को पर्याप्त अग्रिम सूचना नहीं दी है ताकि मंत्री जवाब देने से पहले मामले की जांच कर सकें: बशर्ते कि अध्यक्ष किसी भी समय किसी भी सदस्य को ऐसा आरोप लगाने से रोक सकते हैं यदि अध्यक्ष की राय है कि ऐसा आरोप सदन की गरिमा के लिए अपमानजनक है या ऐसे आरोप लगाने से कोई सार्वजनिक हित पूरा नहीं होता है. 

संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञों की राय इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर बंटी हुई है. भारत की पहली महिला लोकसभा महासचिव रहीं स्नेहलता श्रीवास्तव, जो 2017 से  2020 के बीच निचले सदन की महासचिव रहीं, ने शनिवार को एक साक्षात्कार में एनडीटीवी से कहा कि नियम 349 का दायरा बड़ा है क्योंकि यह सदन के बिज़नेस को संदर्भित करता है. इस मामले में सबसे मुख्य मुद्दा यह है कि पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. केवल एक अप्रकाशित पुस्तक के अंश एक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. इसे प्रमाणित (authenticate) नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अप्रकाशित पुस्तक के मामले में लेखक भविष्य में पुस्तक के कंटेंट को बदल सकता है.लेकिन लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी, जो 1 अगस्त, 2005 से 30 अगस्त, 2010 के बीच निचले सदन के महासचिव रहे, इस मुद्दे पर अलग राय रखते हैं.

एक साक्षात्कार में पी.डी.टी.आचारी ने एनडीटीवी से कहा कि नियम 349 के अनुसार, आप सदन के बिज़नेस से अलग हटकर कोई किताब, लेख या अखबार नहीं पढ़ सकते हैं. इसका सकारात्मक अर्थ यह है कि यदि कोई विषय सदन के कामकाज से जुड़ा है, तो एक सांसद इसे पढ़ सकता है. राहुल गांधी के मामले में, सदन का बिज़नेस राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस था. इसका मतलब है कि सदन का कामकाज रक्षा, विदेशी मामलों से जुड़े मुद्दों से जुड़ा था...ये सभी मामले राष्ट्रपति के अभिभाषण में हैं.

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राहुल गांधी जो कहना चाहते थे वह सदन के बिज़नेस से जुड़ा था. राहुल गांधी एक लेख पढ़ना चाहते थे जो एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. जब भी कोई सांसद कुछ उद्धृत करना चाहता है, तो वह इसे प्रमाणित और सत्यापित कर सकता है. आप किसी के खिलाफ अपमानजनक संदर्भ नहीं दे सकते, लेकिन प्रमाणीकरण के बाद अध्यक्ष सांसद को एक प्रकाशित पत्रिका, पुस्तक या पत्र से उद्धरण देने की अनुमति देता है. राहुल गांधी को अनुमति न देना तर्कसंगत नहीं था.

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