- डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ' नेहरू और लियाकत समझौते' के विरोध में मंत्री पद से इस्तीफा दिया था.
- इस्तीफा देने के बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी. जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बनी.
- डॉ. मुखर्जी की 125वीं जयंती पर कोलकाता में बीजेपी सरकार बड़ा आयोजन करने जा रही है.
'भारतीय जन संघ' की स्थापना करने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 6 जुलाई को 125वीं जयंती है. उनके द्वारा स्थापित किया गया यही जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में विलय हो गया था. लेकिन 8 अप्रैल 1950 की तारीख भारतीय इतिहास में एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में दर्ज है. क्योंकि इसी दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच एक ऐसा समझौता हुआ था. इस समझौते को 'नेहरू-लियाकत समझौता' या 'दिल्ली पैक्ट' के नाम से जाना जाता है. जिसने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव किया था. क्योंकि इस फैसले के विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था. दरअसल, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक गैर-कांग्रेसी और सर्वदलीय कैबिनेट बनाई थी. जिसमें मुखर्जी एक स्वतंत्र नेता के रूप में कैबिनेट मंत्री थे, जिसे बाद में उन्होंने छोड़ दिया था. लेकिन पंडित नेहरू और लियाकत अली के बीच ऐसा क्या समझौता हुआ था. जिसका डॉ. मुखर्जी ने खुलकर विरोध किया था.
क्या था नेहरू-लियाकत समझौता?
दरअसल, 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान नया देश बना था. लेकिन विभाजन के बाद भी भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक आबादी भारत में मुस्लिम और पाकिस्तान में हिंदू-सिख रहते थे. साल 1949-50 के दौरान पूर्वी पाकिस्तान जो अब बांग्लादेश है. वहां हिंदुओं पर भारी अत्याचार की खबरें आईं. जिससे पश्चिम बंगाल में शरणार्थियों का संकट खड़ा हो गया और दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई. इस संकट से निपटने के लिए भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली में एक अहम मुलाकात हुई, जिसमें कुछ अहम मुद्दों पर समझौता हुआ.
नेहरू-लियाकत समझौते के अहम बिंदू
- इस समझौते में शरणार्थियों को छूट का फैसला दिया गया था. जिसके तहत शरणार्थियों को अपनी छोड़ी हुई संपत्ति को बेचने या उसका निपटारा करने के लिए बिना किसी रोक-टोक के अपने देश लौटने की अनुमति दी गई थी.
- इसके अलावा दोनों देश अपने अल्पसंख्यकों को पूर्ण नागरिकता, सुरक्षा और मौलिक अधिकारों की गारंटी देने की बात हुई थी.
- जबरन कराए गए शादियों और धर्म परिवर्तन को अवैध माना जाएगा.
- दोनों देशों में प्रांतीय स्तर पर निगरानी के लिए अल्पसंख्यक आयोग बनाए जाएंगे.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने क्यों किया था विरोध ?
नेहरू कैबिनेट में शामिल श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस समझौते का विरोध किया था. 6 अप्रैल 1950 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. क्योंकि उनका मानना था कि पाकिस्तान यह शर्तें नहीं मानेगा. मुखर्जी का साफ मानना था कि पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है, जो अपने वादों से मुकर जाएगा और वहां हिंदू कभी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे. उन्होंने इस समझौते को नेहरू की कमजोरी और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति करार दिया था. मुखर्जी का प्रस्ताव था कि या तो दोनों देशों के बीच अल्पसंख्यकों की पूरी अदला-बदली हो या फिर हिंदुओं को बसाने के लिए पाकिस्तान से जमीन का हिस्सा मांगा जाए. इन्हीं मुद्दो को लेकर उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल छोड़ दिया.
डॉ. मुखर्जी ने किया जनसंघ का गठन
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना और कांग्रेस छोड़ना भारतीय राजनीति का एक बड़ा फैसला साबित हुआ. सरकार से अलग होने के बाद मु्खर्जी मुख्य विपक्ष के रूप में उभरे. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से 21 अक्टूबर 1951 को 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की थी. यही जनसंघ 1980 में भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के रूप में पुनर्गठित हुआ था. बीजेपी डॉ. मुखर्जी के इस फैसले को राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में याद करती है.
कोलकाता में बड़ा आयोजन
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 125वीं जयंती पर बीजेपी कोलकाता में बड़ा आयोजन करने जा रही है. यह आयोजन इसलिए भी अहम है कि क्योंकि जनसंघ और बीजेपी की स्थापना के बाद यह पहला मौका है जब डॉ. मुखर्जी के गृहराज्य में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में भाजपा इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कर रही है. यह जयंती इसलिए बेहद खास है क्योंकि केंद्र सरकार इसे केवल एक दिन के कार्यक्रम के बजाय दो साल लंबे जुलाई 2025 से जुलाई 2027 के बीच राष्ट्रव्यापी उत्सव के रूप में मनाया है. जिसके तहत कोलकाता के इको पार्क में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शिलान्यास करेंगे. इसके अलावा, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद उनकी यह ऐतिहासिक जयंती उनके 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' के राष्ट्रीय एकता के संकल्प की पूर्ण सिद्धि के रूप में मनाई जा रही है.
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