पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की पहली बार सरकार बनने जा रही है और ममता बनर्जी का 15 साल का किला ढह रहा है. बीजेपी को महाविजय के लिए बंगाल में ही किसी कद्दावर नेता की तलाश थी और ममता बनर्जी के सिपहसालार शुभेंदु अधिकारी को पाले में लाकर वो कमी पूरी की गई. टीएमसी की चुनावी रणनीति को बखूबी समझने वाले शुभेंदु अधिकारी ने संदेशखाली, आरजीकर और उलबेरिया-हावड़ा में दुर्गा पूजा हिंसा जैसे मुद्दे पर ममता को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पूरे बंगाल को कई यात्राओं से मथ डाला. कांग्रेस से सियासी सफर शुरू करने वाले अधिकारी ने ममता के साथ ही 1998 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था. शुभेंदु अधिकारी अविवाहित हैं और उत्कल ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.आइए जानते हैं कि वफादारी से बगावत तक उनका सफर.
राजनीतिक विरासत में आगे बढ़े
शुभेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में एक समृद्ध राजनीतिक परिवार में हुआ था.उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति में सम्मानित और कद्दावर नाम हैं. मेदिनीपुर के पूरे क्षेत्र पर दशकों से अधिकारी परिवार का प्रभाव रहा है. शुभेंदु ने राजनीति की शुरुआती बारीकियां उन्हीं से सीखीं. उन्होंने अपना राजनीतिक करियर 1989 में कांग्रेस की छात्र परिषद से शुरू किया.उस दौर में पूरे बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का एकछत्र दबदबा था, ऐसे में एक विपक्षी छात्र नेता के रूप में उन्हें पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा.1995 में कांथी नगर पालिका में पार्षद के रूप में चुनकर उन्होंने अपने चुनावी सफर की औपचारिक शुरुआत की.
नंदीग्राम और जननेता का उदय
ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव रखी तो शुभेंदु अधिकारी और उनका परिवार ममता के साथ जुड़ गया. लेकिन शुभेंदु के जीवन का सबसे अहम मोड़ साल 2007 में आया, जब वामपंथी सरकार ने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फैसला किया, उस समय लेफ्ट सरकार इतनी शक्तिशाली थी कि कोई भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था. लेकिन यहीं पर शुभेंदु अधिकारी ने वो कर दिखाया, जिसने उन्हें एक आम नेता से 'जननेता' बना दिया. ममता बनर्जी बेशक इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा थीं. वह कोलकाता से लेकर दिल्ली तक मीडिया में नंदीग्राम की आवाज उठा रही थीं, लेकिन कैमरों से दूर असली लड़ाई नंदीग्राम की संकरी पगडंडियों और खेतों में लड़ी जा रही थी.
नंदीग्राम आंदोलन के असली नायक
जन आंदोलन खड़ा करने, लोगों को हिम्मत देने और लेफ्ट के मजबूत काडर से सीधी टक्कर लेने का काम शुभेंदु अधिकारी कर रहे थे.उन्होंने गांव वालों को एकजुट करके 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' (BUPC) बनाई. शुभेंदु का काम करने का तरीका बाकी नेताओं से बिल्कुल अलग था. वह सिर्फ रैलियों में भाषण देकर वापस कोलकाता लौटने वाले नेता नहीं थे.वह रात को नंदीग्राम के गांवों में रुकते, लोगों से ठेठ स्थानीय भाषा में बात करते और उनके डर को दूर करते. जहां लेफ्ट सरकार पुलिस और अपने काडर के दम पर लोगों को डरा रही थी, वहीं शुभेंदु किसानों के लिए एक मजबूत ढाल बनकर खड़े हो गए थे. इसी जमीनी जुड़ाव की वजह से गांव वाले उन पर आंख मूंदकर भरोसा करने लगे थे. 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद जब पूरा प्रदेश खौफ में था, शुभेंदु ने पीछे हटने के बजाय घायलों को अस्पताल पहुंचाया और डरे हुए परिवारों का संबल बने. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नंदीग्राम की असली चाबी शुभेंदु के हाथों में थी, जिससे 2011 में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार का पतन सुनिश्चित हुआ.
मोदी लहर में भी लोकसभा चुनाव जीते
तृणमूल कांग्रेस की 2011 की बंपर जीत ने यह साबित कर दिया कि शुभेंदु अधिकारी अब केवल एक विधायक नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति के एक स्तंभ बन चुके हैं. उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में तमलुक सीट से लड़ा और लेफ्ट के दिग्गज नेता लक्ष्मण सेठ को 1 लाख से ज्यादा वोटों से हराकर अपनी ताकत दिखाई. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी.
ममता के दाहिने हाथ बने शुभेंदु
ममता बनर्जी को बंगाल के प्रशासनिक ढांचे और संगठन को और अधिक धार देने के लिए शुभेंदु की जरूरत महसूस हुई. उन्हें राज्य की राजनीति में बुलाया गया और परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए. इन विभागों के जरिए शुभेंदु का सरकारी मशीनरी और जमीनी ढांचे पर नियंत्रण और भी मजबूत हो गया. इस दौरान उन्होंने मुर्शिदाबाद, मालदा और जंगल महल जैसे उन क्षेत्रों में भी टीएमसी को खड़ा किया, जहां पहले विपक्ष का कब्जा था.पूरे बंगाल के हर कार्यकर्ता के लिए 'दादा' बन चुके थे.
पार्टी के भीतर असंतोष
शुभेंदु अधिकारी की छवि पर 2016 के बाद कुछ विवादों के बाद असर पड़ा, लेकिन असली भूकंप 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद आया. बीजेपी के बेहतरीन प्रदर्शन ने ममता बनर्जी को परेशान कर दिया, जिसके बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एंट्री हुई. ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में वर्चस्व बहुत तेजी से बढ़ा. शुभेंदु जैसे 'ग्राउंड लीडर' को महसूस होने लगा कि पार्टी में कॉर्पोरेट स्टाइल के दखल के कारण उनके जैसे पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है. यह असंतोष महीनों तक सुलगता रहा और आखिरकार नवंबर 2020 में कैबिनेट से इस्तीफे के साथ बाहर आ गया. टीएमसी में खलबली मच गई और पार्टी आलाकमान को समझ आ गया कि एक बहुत बड़े कद का नेता उनके हाथ से फिसल रहा है. टीएमसी के वरिष्ठ नेता सौगता रॉय और खुद प्रशांत किशोर ने शुभेंदु को मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन शुभेंदु अपना मन बना चुके थे.
बगावत और बीजेपी में शामिल होना
शुभेंदु अधिकारी ने दिसंबर 2020 में तृणमूल कांग्रेस और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. यह एक 20 साल पुराने रिश्ते का अंत था. 19 दिसंबर 2020 को मेदिनीपुर में अमित शाह की रैली में उन्होंने भगवा चोला ओढ़ लिया. टीएमसी के लिए यह एक बड़ा झटका था, जबकि बीजेपी के लिए यह बंगाल में सत्ता के द्वार खोलने जैसा था. टीएमसी ने उन पर ईडी और सीबीआई के डर का आरोप लगाया, जबकि शुभेंदु ने पार्टी को 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' बताकर अपनी नाराजगी जाहिर की.
Suvendu vs Mamata
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नंदीग्राम से गुरु को हराया
ममता बनर्जी ने 2021 के चुनाव में अपनी सुरक्षित भवानीपुर सीट छोड़कर शुभेंदु के गढ़ नंदीग्राम से लड़ने का फैसला किया. यह चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि साख और अहंकार का युद्ध बन गया था. नंदीग्राम में शुभेंदु ने ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश को चौंका दिया. इस जीत ने उन्हें रातों-रात बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया और उन्हें 'लीडर ऑफ अपोजिशन' का पद मिला.आज शुभेंदु अधिकारी ममता सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. उन पर कई मुकदमे दर्ज हैं (जैसे पूर्व बॉडीगार्ड की मौत का मामला और राहत चोरी के आरोप), जिन्हें वे बदले की राजनीति का हिस्सा मानते हैं.
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क्या मुख्यमंत्री बनेंगे सुवेंदु अधिकारी
विवादों के बावजूद वो बंगाल में बीजेपी का सबसे मुखर चेहरा हैं. शुभेंदु और ममता की यह सियासी दुश्मनी इस बात का सटीक उदाहरण है कि राजनीति में न कोई पक्का दोस्त होता है और न ही कोई पक्का दुश्मन. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नंदीग्राम का यह नायक, जिसने लेफ्ट को गिराया और फिर 'दीदी' को चुनौती दी, वह आने वाले समय में बंगाल की सत्ता का समीकरण कैसे बदलेगा.














