लुका-छिपी क्यों खेल रहा है? मुस्लिम व्यक्ति पर हमले की जांच में नाकामी पर यूपी पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

मुस्लिम व्यक्ति पर कथित नफरती आपराधिक हमले की जांच में विफल रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने एफआईआर में आईपीसी की धारा 153बी नहीं जोड़ने पर नाराजगी जताई और जांच अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाए.

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धार्मिक पहचान को लेकर नफरती अपराध करने का आरोप
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  • सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को मुस्लिम व्यक्ति पर नफरती हमले की जांच में विफल रहने पर कड़ी फटकार लगाई है
  • पुलिस ने अदालत के आदेश के बावजूद एफआईआर में आईपीसी की धारा 153बी के तहत आरोप शामिल नहीं किए थे
  • धारा 153बी धार्मिक और सांप्रदायिक घृणा फैलाने वाले अपराधों के लिए 3 से 5 वर्ष तक की सजा का प्रावधान करती है
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सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम व्यक्ति पर हुए नफरती हमले की जांच में विफल रहने पर यूपी पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153बी के तहत आरोप नहीं जोड़े गए. पीठ के सामने उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने कहा कि आगे की जांच के लिए आवश्यक अनुमति मांगी गई है.

कोर्ट ने जांच अधिकारी से सवाल किए

इस पर पीड़ित के वकील ने कहा कि इस अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पुलिस ने 2023 में दर्ज एफआईआर से धारा 153बी को हटा दिया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, “आपका जांच अधिकारी अदालत के साथ लुका-छिपी क्यों खेल रहा है? क्या आप 153बी और 295ए से पीछे हट सकते हैं?” कोर्ट ने बताया कि आईपीसी की धारा 153बी उन आरोपों या कथनों को दंडित करती है जो विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषाई, क्षेत्रीय समूहों या जातियों के बीच राष्ट्रीय एकता के खिलाफ शत्रुता या घृणा उत्पन्न करते हैं या उत्पन्न करने की संभावना रखते हैं.

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चार्जशीट में जोड़ने की दलील

इस धारा के तहत बोले गए या लिखित शब्द, संकेत या किसी भी तरह के प्रस्तुतिकरण को अपराध माना जाता है, जिसके लिए तीन वर्ष तक के कारावास या जुर्माने का प्रावधान है. यदि यह अपराध किसी पूजा स्थल पर किया जाता है तो सजा बढ़कर पांच वर्ष तक हो सकती है. इस पर एएसजी नटराज ने कहा कि धारा 153बी को चार्जशीट दाखिल करते समय जोड़ा जा सकता है. हालांकि पीड़ित के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि बयान से जानबूझकर केवल एक पंक्ति हटाई गई है. यह केवल उनकी टोपी नहीं थी जिसे हटाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एसीपी को तलब करने की बात करते हुए कहा, “आप इस एसीपी को बुलाइए, जिसने यह रिपोर्ट दी है. उन्हें आने दीजिए और बताने दीजिए कि वह यह सब क्यों कर रहे हैं.” कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 16 फरवरी 2026 के आदेश के अनुपालन में प्रतिवादियों द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे से वह संतुष्ट नहीं है.

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एसीपी को तलब करने के संकेत

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह जांच अधिकारी को तलब करने के इच्छुक हैं. हालांकि एएसजी केएम नटराज के अनुरोध पर कोर्ट ने 16 फरवरी 2026 के आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया और मामले को 19 मई को दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने एएसजी से कहा कि वे अपने अधिकारियों को सही सलाह दें. कोर्ट ने टिप्पणी की, “हमें अधिकारियों को बुलाने में कोई खुशी नहीं होती, लेकिन अनावश्यक रूप से वे हमें ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं.” यह पूरा मामला मुस्लिम धर्मगुरु काजीम अहमद शेरवानी की याचिका से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है.

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धार्मिक पहचान पर हमले का आरोप

याचिका में वर्ष 2021 में नोएडा में हुई एक घटना का जिक्र है, जिसमें कुछ लोगों पर उनकी धार्मिक पहचान को लेकर नफरती अपराध करने का आरोप लगाया गया है. शेरवानी का आरोप है कि उनकी दाढ़ी खींची गई, टोपी उतारी गई और धार्मिक आधार पर अभद्र तरीके से अपशब्द कहकर उनका अपमान किया गया.

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