असम की सालेहा खातून और सरबानू बेगम को बांग्लादेश भेजने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, सोनाली खातून के बाद एक और केस

सुप्रीम कोर्ट ने असम की दो मुस्लिम महिलाओं बांग्लादेश डिपोर्ट करने पर रोक लगा दी है. दोनों महिलाओं की याचिका पर सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने ये आदेश सुनाया है.

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सुप्रीम कोर्ट असम SIR सालेहा खातून (फाइल फोटो)
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  • सुप्रीम कोर्ट ने असम की दो महिलाओं को डिपोर्ट करने पर रोक लगाई
  • सालेहा खातून और सरबानू बेगम को फिलहाल बांग्लादेश नहीं भेजा जाएगा
  • सालेहा खातून खुद को भारतीय नागरिक बताती हैं, SC में होगी सुनवाई
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने असम की दो महिलाओं को डिपोर्ट करने पर लगाई रोक लगा दी है. सालेहा खातून, और सरबानू बेगम को विदेशी घोषित किए जाने के मामलों में बड़ा अंतरिम राहत आदेश दिया है. अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक इन महिलाओं का निर्वासन नहीं किया जाएगा. गौरतलब है कि असम के फॉरेन ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित की गई दो महिलाओं सालेहा खातून और सरभानु बेगम को डिपोर्ट किया जाना था. 

याचिका में खातून की अर्जी 

याचिका में बताया गया है कि 50 वर्षीय सालेहा खातून एक गरीब और अशिक्षित महिला हैं, जो 2 मार्च 2026 से असम के गोलपारा डिटेंशन सेंटर में बंद हैं. उसे फॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया था और बाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा था. याचिका में कहा गया है कि सालेहा खातून ने अपने भारतीय नागरिक होने के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज और गवाह प्रस्तुत किए थे. उसने दावा किया कि उनके पिता अहसान अली और माता कोरपुलजान के नाम 1971 से पहले के मतदाता रिकॉर्ड और NRC  के लीगेसी डेटा में दर्ज हैं. 

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी 

याचिका के अनुसार  खातून ने एनआरसी लीगेसी रिकॉर्ड, मतदाता सूची, गांव प्रधान (गांवबुड़ा) और ग्राम पंचायत के प्रमाणपत्र, पारिवारिक दस्तावेज और अपनी बहन की गवाही प्रस्तुत की थी. इसके बावजूद विदेशी ट्रिब्यूनल ने 13 दिसंबर 2018 के आदेश में उसके दावे को नाम, उम्र और अन्य विवरणों में मामूली विसंगतियों के आधार पर खारिज कर दिया. याचिका में आरोप लगाया गया है कि ट्रिब्यूनल ने शादीशुदा महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले लिंकेज प्रमाणपत्रों को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया.  बाद में हाईकोर्ट ने भी 9 दिसंबर 2025 को याचिका खारिज कर दी.

खातून खुद को भारतीय नागरिक बताती रही है 

याचिका में कहा गया है कि नागरिकता का प्रश्न व्यक्ति के सबसे बुनियादी अधिकारों से जुड़ा है. खातून का दावा है कि उसे अपने ही देश में विदेशी घोषित किए जाने और नागरिक अधिकारों से वंचित होने का खतरा है, जबकि उसे लगातार स्वयं को भारतीय नागरिक बताया है और उसके समर्थन में साक्ष्य भी दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है. इसका मतलब है कि अंतिम फैसला आने तक इन  महिलाओं को देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा. 

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दोनों महिलाओं को गोलपारा डिटेंशन सेंटर में बंद रखा गया है 

इन महिलाओं की तरफ से दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि उन्हें असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किए जाने के बाद हिरासत में लिया गया है और दोनों महिलाओं को मार्च 2026 से गोलपारा डिटेंशन सेंटर में बंद रखा गया हैं. जस्टिस विक्रम नाथ और वी. मोहना की  बेंच ने केंद्र सरकार और असम सरकार को नोटिस जारी कर उन महिलाओं की याचिकाओं पर जवाब मांगा, जिन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट  22 जुलाई को अगली सुनवाई करेगा. इस बीच, कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर सालेहा खातून और सरभानु बेगम हिरासत में रहती हैं, तो उन्हें सुनवाई की अगली तारीख तक डिपोर्ट नहीं किया जाएगा. 

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