सबरीमाला केस: धर्म को समाज सुधार के नाम पर खोखला नहीं कर सकते, देवता को मानोगे तो परंपरा भी माननी होगी-सुप्रीम कोर्ट

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि सुधार के नाम पर धर्म को खत्म नहीं किया जा सकता और श्रद्धालु अपनी मर्जी से धार्मिक परंपराओं को 'पिक एंड चूज' नहीं कर सकते. बेंच ने ऐतिहासिक संदर्भों और धार्मिक स्वायत्तता को बनाए रखने पर जोर दिया है.

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  • सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने धर्म के मूल स्वरूप को सुधार के बहाने खत्म करने से रोका है
  • जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि इतिहास को भूलकर नया भविष्य नहीं लिखा जा सकता है
  • जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने धर्म के मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप को सीमित रखने पर जोर दिया है
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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. नौ जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि सुधार के बहाने धर्म के मूल स्वरूप को खत्म नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने 'चुनिंदा तरीके से' धार्मिक परंपराओं को स्वीकार करने या नकारने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई है.

'अतीत को मिटाकर भविष्य नहीं लिखा जा सकता'

सुनवाई के 10वें दिन जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हम भारत के सभ्यतागत और धार्मिक इतिहास की अनदेखी नहीं कर सकते. उन्होंने कहा, "जीवंत संविधान अच्छी बात है, लेकिन हमें अतीत को नहीं भूलना चाहिए. इतिहास से ही वर्तमान बनता है, आप इसे पूरी तरह साफ कर नया इतिहास नहीं लिख सकते."

"धर्म का विनाश" बर्दाश्त नहीं

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि अगर हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार किसी प्रथा को मानने या न मानने का अधिकार मांगेगा, तो धर्म का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा. बेंच ने कहा कि धर्म के मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, अन्यथा यह 'धर्म के विनाश' (Annihilation of Religion) जैसा होगा.

क्या आस्था को टुकड़ों में बांटा जा सकता है?

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक बुनियादी सवाल उठाया-"अगर आप मंदिर के देवता में विश्वास रखते हैं, तो क्या आप उनसे जुड़ी परंपराओं को खारिज कर सकते हैं?" उन्होंने कहा कि आस्था एक 'पैकेज' की तरह होती है. आप यह नहीं कह सकते कि आप मूर्ति को तो मानते हैं, लेकिन उसकी पूजा पद्धति या उससे जुड़ी वर्जनाओं को नहीं मानेंगे.

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इंदिरा जयसिंह की दलीलें और 'अस्पृश्यता' का सवाल

याचिकाकर्ताओं की ओर से इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि महिलाओं को रोकना अनुच्छेद 17 (छुआछूत का उन्मूलन) का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को रोकना उनके जीवन के सबसे रचनात्मक समय को प्रतिबंधित करने जैसा है. उन्होंने तर्क दिया कि मंदिर में प्रवेश 'श्रद्धा' का विषय है और किसी भी रोक को 'कानूनी चोट' के आधार पर ही उचित ठहराया जा सकता है.

क्या है पूरा विवाद?

यह सुनवाई 2018 के सबरीमाला फैसले से जुड़े संवैधानिक सवालों पर टिकी है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच इस बात की जांच कर रही है कि क्या मंदिर में प्रवेश एक मौलिक अधिकार है या यह 1950 से पहले से चली आ रही एक परंपरा मात्र है. कोर्ट अब इस बारीक रेखा को समझने की कोशिश कर रहा है कि 'सामाजिक सुधार' की सीमा कहाँ खत्म होती है और 'धार्मिक स्वायत्तता' कहाँ से शुरू होती है.

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