आप जनरल से अल्पसंख्यक कैसे हो गए, जब CJI ने वकील से पूछा सवाल, हरियाणा मुख्य सचिव से मांगा जवाब

हरियाणा में रहने वाले जाट समुदाय के भाई-बहन ने अल्पसंख्यक कोटे का लाभ लेने के लिए परीक्षाओं से कुछ समय पहले बौद्ध धर्म अपना लिया और उसे सरकार की तरफ से अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया. अब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है.

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सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने हरियाणा के मुख्य सचिव से मांगा जवाब
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  • सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने के तरीके पर आपत्ति जताई और जवाब मांगा है
  • जाट समुदाय के भाई-बहन ने परीक्षाओं से पहले बौद्ध धर्म अपना कर अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र प्राप्त किया था
  • कोर्ट ने याचिका खारिज कर इस प्रक्रिया को धोखाधड़ी करार दिया और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए
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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने के तरीके पर आपत्ति जताते हुए उससे जवाब मांगा है. दरअसल हरियाणा में रहने वाले जाट समुदाय के भाई-बहन ने अल्पसंख्यक कोटे का लाभ लेने के लिए परीक्षाओं से कुछ समय पहले बौद्ध धर्म अपना लिया और उसे सरकार की तरफ से अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया. अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे नए तरीके का फ्रॉड बताया है और हरियाणा के  मुख्य सचिव से जवाब मांगा है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही थी.

आखिर मामला क्या है?

यह मामला हरियाणा के हिसार के एक जाट परिवार से आने वाले कृष्ण पुनिया के बच्चों, नितिन पुनिया और एकता पुनिया द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है. दोनों जन्म से जनरल कैटेगरी में आते हैं. उनकी याचिका के अनुसार दोनों का सेलेक्शन उत्तर प्रदेश के सुभारती यूनिवर्सिटी के सुभारती मेडिकल कॉलेज में बौद्ध अल्पसंख्यक कोटा के तहत एडमिशन के लिए हुआ था. हालांकि दोनों NEET-PG कोर्स में एनरॉल (नामांकन) नहीं हो सके.

याचिकाकर्ताओं ने उपमंडल अधिकारी (नागरिक), हिसार द्वारा जारी बौद्ध अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र प्राप्त किया था और इसी की मदद से उनका सेलेक्शन कॉलेज में हुआ था. हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने 2016 में अधिसूचना जारी की थी जिसके अनुसार अल्पसंख्यक दर्जे का दावा करने वाले को उत्तर प्रदेश राज्य से भी मान्यता लेनी थी, भले ही उनके पास राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से मान्यता हो. एक तरफ तो उत्तर प्रदेश राज्य ने ऐसी मान्यता से इनकार कर दिया था, तो दूसरी तरफ संबंधित प्राधिकारी ने दोनों को एडमिशन दे दिया था. अब मामला कोर्ट में पहुंच गया.

कोर्ट में क्या हुआ?

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कड़ी मौखिक टिप्पणियां कीं और परिवार के आचरण को एक तरह का धोखाधड़ी करार दिया. 

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CJI ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि आप पुनिया हैं? आप कौन से अल्पसंख्यक हैं? अब मुझे यह स्पष्ट रूप से पूछने दीजिए. आप कौन से पुनिया हो? इसपर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, जाट पूनिया. CJI ने इसपर सवाल किया, "तो फिर आप अल्पसंख्यक कैसे हैं." इसपर याचिकाकर्ता की तरफ से जवाब मिला कि बौद्ध धर्म अपना लिया. यह मेरा अधिकार है. CJI कांत बोले कि वाह! ये एक नए तरह का फ्रॉड है.

CJI कांत ने याचिका खारिज करते हुए कहा, "बिल्कुल खारिज. आप अल्पसंख्यकों के अधिकारों को छीनना चाहते हैं. आप देश के सबसे अमीर स्थानों में से एक हैं. आपको अपनी योग्यता पर गर्व होना चाहिए. यह एक और तरह की धोखाधड़ी है. हमें आगे टिप्पणी करने के लिए मजबूर न करें."

कोर्ट ने जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए पूछा, "हिसार के उपमंडल अधिकारी ने ऐसे प्रमाण पत्र कैसे जारी किए हैं?"

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जवाबदेही की मांग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव को अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने पर राज्य में गाइडलाइंस पर स्टेटस-रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा, "हम हरियाणा के मुख्य सचिव से जानना चाहेंगे कि अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए क्या गाइडलाइंस हैं और किस आधार पर जनरल कैटेगरी के उम्मीदवार, जो कमजोर वर्ग से नहीं हैं और जिन्होंने खुद को सामान्य उम्मीदवार बताया है, उन्हें बौद्ध समुदाय से संबंधित माना जा सकता है.''

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