मां सिर्फ पांचवीं तक पढ़ सकीं, लेकिन बेटी को खूब पढ़ाया... रोचक है जस्टिस वी. मोहना की SC की जज बनने की कहानी

पोल्लाची के एक बड़े परिवार से निकलकर देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च संस्थान तक पहुंचना वी. मोहना की असाधारण उपलब्धि है. उनकी यह यात्रा उन सभी युवाओं- खासतौर पर महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो परंपराओं की सीमाओं से आगे बढ़कर बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस रखते हैं.

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सुप्रीम कोर्ट की जज बनीं जस्टिस वी. मोहना
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  • जस्टिस वी. मोहना का जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पोल्लाची में एक बड़े परिवार में हुआ था.
  • उनके पिता भारतीय सेना में सेवा देने के बाद तमिलनाडु सरकार में वरिष्ठ कीट-विज्ञानी के रूप में काम करते थे.
  • उनकी मां ने कम शिक्षा के बावजूद मोहना की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कानून की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.
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नई दिल्ली:

वरिष्ठ वकील से सुप्रीम कोर्ट की जज बनीं जस्टिस वी. मोहना का जीवन बेहद प्रेरणादायक रहा है. वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट के कॉरिडोर में वकील के तौर पर उनका हंसता-मुस्कराता चेहरा कई लोगों ने देखा. लेकिन उनके साहस, संघर्ष और शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं. तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के व्यापारिक नगर पोल्लाची में जन्मी वी. मोहना का बचपन ऐसे परिवार में बीता, जहां अनुशासन, परिश्रम और शिक्षा को जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्य माना जाता था. 13 भाई-बहनों में वह 11वीं संतान थीं- एक बड़े परिवार का हिस्सा, जिसमें 9 बेटियां और 4 बेटे थे.

पिता से मिला अनुशासन, मां से मिला प्रोत्साहन

उनके पिता एस. वेंकिटा सुब्रमणि अय्यर अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे. भारतीय सेना में सेवा देने के बाद उन्होंने तमिलनाडु सरकार में वरिष्ठ कीट-विज्ञानी के रूप में कार्य किया. सेना से मिला अनुशासन और सेवा-भाव पूरे परिवार के जीवन का आधार बना, जहां हर बच्चे से उत्कृष्टता और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती थी. वहीं, उनकी माता कावेरी अम्माल ने बेटी की प्रतिभा को निखारने में अहम भूमिका निभाई. खास बात यह है कि उनकी मां खुद सिर्फ पांचवीं कक्षा तक पढ़ी थीं, लेकिन उन्होंने मोहना की वाद-विवाद, भाषण, निबंध लेखन और विचार-विमर्श में रुचि को पहचाना. उन्होंने समझ लिया था कि यह केवल शौक नहीं, बल्कि एक सफल वकील बनने की क्षमता का संकेत है.
 

परंपरा से अलग राह चुनने की प्रेरणा

जस्टिस मोहना से जुड़े सूत्रों के अनुसार मां ने उन्हें ऐसे पेशे की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जिस पर उनके परिवार में पहले कभी किसी ने कदम नहीं रखा था. यानी कानून की पढ़ाई और वकालत. मोहना की मेहनत और प्रतिभा ने जल्द ही उन्हें पहचान दिलाई. दसवीं से लेकर स्नातक तक उन्हें राष्ट्रीय मेधा छात्रवृत्ति प्राप्त हुई.

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साल 1983 में भारत में पहली बार पांच वर्षीय एकीकृत BA LL.B कोर्स शुरू किया गया, और मोहना उन शुरुआती छात्रों में शामिल थीं, जिन्होंने कोयंबटूर लॉ कॉलेज (बाद में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, कोयंबटूर) के पहले बैच में दाखिला लिया. उस समय कॉलेज अपने शुरुआती दौर में था—कक्षाएं किराए की इमारतों में लगती थीं, पुस्तकालय सीमित था और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.

ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा का खर्च भी खुद उठाया

83 छात्रों के बैच में केवल लगभग 9 छात्राएं थीं. इसके बावजूद मोहना ने अपनी मेहनत, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में सक्रिय भागीदारी और सीखने के जुनून से अपनी अलग पहचान बनाई. सूत्रों के मुताबिक, पढ़ाई में किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए उन्होंने कार्यरत महिलाओं के छात्रावास में रहते हुए ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा का खर्च भी खुद उठाया.

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साल 1988 में उन्होंने इस ऐतिहासिक पहले बैच के सदस्य के रूप में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उनके सहपाठियों में के. वी. विश्वनाथन भी शामिल थे, जो आगे चलकर वरिष्ठ वकील बने, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहे और 2023 में सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हुए.

पोल्लाची के एक बड़े परिवार से निकलकर देश की न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्थान तक पहुंचना वी. मोहना की असाधारण उपलब्धि है. उनकी यह यात्रा उन सभी युवाओं—खासतौर पर महिलाओं—के लिए प्रेरणा है, जो परंपराओं की सीमाओं से आगे बढ़कर बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस रखते हैं.

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