जातिसूचक गालियों के मामले में आरोपियों की अग्रिम जमानत रद्द, जानें सुप्रीम कोर्ट ने क्या कुछ कहा

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के मामले में आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज FIR की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने जातिसूचक गालियां देने के आरोप में आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है
  • पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एफआईआर की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त करते हुए अग्रिम जमानत दी थी
  • जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ कथित तौर पर जातिसूचक गालियां देने के मामले में आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर एफआईआर की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित की शिकायत पर नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई है. जस्टिस पी.वी. संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों को अग्रिम जमानत दी गई थी.

नाली विवाद से शुरू हुआ था मामला

हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर की सत्यता पर संदेह जताया था कि वह कथित पीड़ित की शिकायत पर नहीं, बल्कि एक पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई थी. यह मामला दो पक्षों के बीच हुए एक विवाद से जुड़ा है. अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों का आरोप था कि ऊंची जाति के लोगों के घरों की नालियों का पानी उनके घरों की ओर मोड़ा जा रहा था. जब प्रभावित लोगों ने इसका विरोध किया, तो इलाके में तनाव बढ़ गया.
स्थिति को संभालने और समझौता कराने के लिए पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन इस दौरान कथित तौर पर विवाद हिंसक हो गया.

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जातिसूचक गालियों और फायरिंग का आरोप, FIR दर्ज

अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने न केवल जातिसूचक गालियां दीं, बल्कि हथियारों का भी इस्तेमाल किया और फायरिंग की. घटना का वीडियो मौजूद होने की भी बात कही गई है. इसके बाद मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी के बयान और उपलब्ध सामग्री के आधार पर पुलिस ने SC/ST एक्ट, 1989, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत एफआईआर दर्ज की. जांच के दौरान घटना से जुड़ा एक काउंटर केस भी सामने आया, जो शिकायतकर्ता पक्ष के खिलाफ दर्ज किया गया था, हालांकि जांच में आरोप निराधार पाए जाने के बाद उसे बंद कर दिया गया.

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हाईकोर्ट ने FIR के आधार पर जताया था संदेह

आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया. हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उन्हें राहत दे दी कि एफआईआर कथित पीड़ित की शिकायत पर दर्ज नहीं हुई थी, बल्कि पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई थी. अदालत ने यह भी संदेह जताया था कि क्या आरोपों से SC/ST एक्ट का अपराध बनता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने एफआईआर के स्रोत को अनावश्यक महत्व दिया और यह नहीं देखा कि उपलब्ध जानकारी से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है या नहीं.

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सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत रद्द कर आत्मसमर्पण का आदेश

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर केवल पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज होने से उसकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह अधिकारी स्वयं घटना का प्रत्यक्षदर्शी हो. पीठ ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट और पुलिस के हलफनामे जैसी महत्वपूर्ण सामग्री को नजरअंदाज कर दिया, जिनमें फायरिंग और जातिसूचक गालियां दिए जाने के स्पष्ट आरोप थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी और उन्हें 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया.

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