'मेरा क्या बिगाड़ लिया?' वाला एट्टीट्यूड, SC ने वकील को फटकारा, हाईकोर्ट को नीचा दिखाने की मंशा पर भड़के जज

पिछले साल अधिवक्ता महेश तिवारी और झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश कुमार के बीच तीखी बहस हुई थी. सुनवाई के दौरान उन्होंने न्यायमूर्ति कुमार से कहा था कि वे 'हद पार न करें'. वकील के इस रवैये पर SC ने फटकार लगाई है और कहा है कि हाईकोर्ट में जाकर माफी मांगें.

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झारखंड हाईकोर्ट के एक वायरल वीडियो से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट महेश तिवारी की याचिका पर कड़ी टिप्पणी की है. यह वीडियो उस वक्त सामने आया था जब सुनवाई के दौरान महेश तिवारी ने जज से कहा था, 'डोंट क्रॉस द लिमिट!' इसी मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ सुओ‑मोटो अवमानना कार्यवाही शुरू की थी.

इस अवमानना कार्यवाही के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे महेश तिवारी को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने फटकार लगाई. CJI ने सख्त लहजे में कहा, 'वह कोलकाता (हाईकोर्ट) गए बिना सिर्फ यहां से कोई आदेश चाहते हैं, ताकि कह सकें, ‘क्या बिगाड़ लिया मेरा?'

CJI सूर्यकांत ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा, 'अगर उन्हें माफी मांगनी है तो माफी मांगें. अगर उन्हें जजों को आंख दिखानी है, तो दिखाएं. हम यहां बैठे हैं, देख लेंगे.'

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हाईकोर्ट से माफी की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महेश तिवारी को झारखंड हाईकोर्ट की पांच‑जजों की बेंच के सामने ही माफी मांगनी होगी. साथ ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से कहा कि अगर वकील माफी मांगते हैं, तो सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए.

पूरा मामला क्या है?

16 अक्टूबर 2025 को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस राजेश कुमार और एडवोकेट महेश तिवारी के बीच तीखी बहस हुई थी. बहस के दौरान तिवारी ने कहा था, 'सर, किसी व्यक्ति को अपमानित करने की कोशिश मत कीजिए… देश जल रहा है, न्यायपालिका के साथ जल रहा है.'

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बाद में उन्होंने जज से कहा, 'Don't cross the limit.'

यह पूरी बातचीत रिकॉर्ड हो गई और सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.

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इसके बाद झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश तारलोक सिंह चौहान, जस्टिस सुझीत नारायण प्रसाद, रोंगोन मुखोपाध्याय, आनंद सेन और राजेश शंकर की पांच‑सदस्यीय पीठ गठित कर सुओ‑मोटो अवमानना नोटिस जारी किया और तिवारी से तीन हफ्ते में जवाब मांगा.

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किस मामले की हो रही थी सुनवाई 

दरअसल महेश तिवारी अपने मुवक्किल की बिजली कनेक्शन बहाली के मामले में बहस कर रहे थे. बकाया राशि को लेकर अदालत में विवाद हुआ. मामला सुलझने के बावजूद, उसके बाद की टिप्पणियों ने विवाद को बढ़ा दिया, जिसके चलते यह मामला अवमानना तक पहुंच गया.

अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह मामला हाईकोर्ट में ही निपटेगा और माफी ही एडवोकेट के लिए एकमात्र रास्ता हो सकता है.

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