- पीओके की कहानी 1947 के भारत विभाजन और पाकिस्तान के जन्म के साथ शुरू होती है.
- पीओके को आज एक सेमी-ऑटोनोमस इलाके के रूप में चलाया जाता है.
- यहां एक विधानसभा, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होते हैं. सुप्रीम कोर्ट भी मौजूद है.
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके (PoK) एक बार फिर बड़े तनाव और हिंसा के बाद चर्चा में है. हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तान सुरक्षा बलों की फायरिंग में 30 से ज्यादा लोगों की मौत और करीब 200 लोग घायल हो गए. ये प्रदर्शन अचानक नहीं आयोजित किए गए थे. अगले महीने 27 तारीख को होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले इलाके में राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा था. सबसे बड़ा विवाद जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी के उस विरोध से जुड़ा था जिसमें 12 सीटों को शरणार्थियों के लिए रिजर्व किए जाने पर सवाल उठाए गए.
प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि यह फैसला स्थानीय लोगों के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करता है और बाहर से आए लोगों को फायदा देता है. इसी मुद्दे ने पूरे क्षेत्र को हिंसा और असंतोष की आग में झोंक दिया. लेकिन असली सवाल यह है कि पीओके आखिर पाकिस्तान के लिए इतना अहम क्यों है कि इतने लंबे समय से विवाद और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद वह इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिखता.
भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय पाकिस्तान से भारत आते लोग
Photo Credit: AFP
पीओके का ऐतिहासिक बैकग्राउंड
पीओके की कहानी 1947 के भारत विभाजन और पाकिस्तान के जन्म के साथ शुरू होती है. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया था.
जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन महाराजा ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए. भारत का कहना है कि यह पूरी तरह कानूनी और वैध प्रक्रिया थी, जो अन्य 560 से अधिक रियासतों की तरह ही थी. इसके बाद पाकिस्तान की ओर से कबायली हमले हुए, जिसमें बाद में नियमित सेना भी शामिल हो गई. इससे युद्ध की स्थिति बनी और मामला संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा.
1949 में युद्धविराम के बाद जम्मू और कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया. एक हिस्सा भारत के पास रहा और दूसरा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया, जिसे आज पीओके कहा जाता है.
भारतीय संसद
Photo Credit: AFP
भारत का आधिकारिक रुख
भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि जम्मू और कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है. 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने एक प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर अपना हक जताते हुए कहा था कि यह भारत का अटूट अंग है. पाकिस्तान को इस हिस्से को छोड़ना होगा, जिस पर उसने कब्जा जमा रखा है. इसमें यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी प्रकार के अलगाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा. यह प्रस्ताव आज भी भारत की आधिकारिक नीति का आधार माना जाता है.
Photo Credit: AFP
पीओके की स्थिति अभी क्या है?
पीओके को आज एक सेमी-ऑटोनोमस इलाके के रूप में चलाया जाता है. यह पाकिस्तान का कोई पूर्ण रूप से इलाका नहीं है. इसे दो हिस्सों में बांटा गया है- आजाद जम्मू-कश्मीर (एजेके) और गिलकित बाल्तिस्तान. इसकी राजधानी मुजफ्फराबाद है जिसे तीन डिवीजन में बांटा गया है- मीरपुर, मुजफ्फराबाद और पूंछ. यहां 10 जिले हैं. वहीं गिलगित-बाल्तिस्तान में भी तीन डिवीजन- गिलगित, बाल्तिस्तान और दियामीर हैं. यहां 14 जिले हैं.
यहां एक विधानसभा, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होते हैं. सुप्रीम कोर्ट भी मौजूद है, जिसमें एक चीफ जस्टिस और दो अन्य जज होते हैं. लेकिन असली शक्ति पाकिस्तान सरकार और कश्मीर काउंसिल के पास रहती है.
Photo Credit: AFP
आजाद कश्मीर कितना आजाद है?
पीओके को पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है, लेकिन इसकी आजादी सीमित मानी जाती है. पाकिस्तान के संविधान में इसके चार प्रांतों, पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा का जिक्र है और इसमें आजाद कश्मीर को शामिल नहीं किया गया है. पीओके को पाकिस्तान की संसद में भी सीधा प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है. इसका प्रशासन आजाद कश्मीर अंतरिम संविधान अधिनियम 1974 के तहत चलता है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण इस्लामाबाद के पास रहता है.
कश्मीर काउंसिल एक 14 सदस्यीय निकाय है, जिसकी अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते हैं. इसमें कई सदस्य पाकिस्तान सरकार के जरिए नियुक्त होते हैं.
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का सुप्रीम कोर्ट
Photo Credit: AFP
राजनीतिक नियंत्रण और सीमित स्वतंत्रता
पीओके के संविधान में यह प्रावधान है कि पाकिस्तान के खिलाफ गतिविधियों को दंडनीय माना जा सकता है. पाकिस्तान में शामिल होने के खिलाफ विचार रखने वाले उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराया जा सकता है और यहां चुनाव लड़ने वालों को पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी होती है. इससे स्पष्ट होता है कि राजनीतिक स्पेस सीमित है और नियंत्रण का ढांचा काफी सख्त है.
पाकिस्तान के संविधान में पीओके की स्थिति
पाकिस्तान के संविधान में पीओके को सीधे तौर पर प्रांत के रूप में शामिल नहीं किया गया है. अनुच्छेद 257 में यह कहा गया है कि जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय करेंगे, तब उनके संबंध तय किए जाएंगे. यह एक अधूरा दावा माना जाता है जिसमें पाकिस्तान कानूनी रुप से उसकी अंतिम स्थिति को स्पष्ट नहीं करता.
पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर
Photo Credit: AFP
फिर पाकिस्तान के लिए पीओके इतना अहम है क्यों?
पीओके पाकिस्तान के लिए सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उसकी रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संरचना का हिस्सा बन चुका है. पीओके का सबसे अधिक महत्व सिंधु नदी सिस्टम से जुड़ा है, जिसमें सिंधु, झेलम और चेनाब जैसी नदियां शामिल हैं. यह पानी पाकिस्तान के पंजाब और सिंध जैसे कृषि क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी है.
भारत ने बगलिहार, दुलहस्ती और सलाह नाम से हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट बनाए हैं, जो नदी के बहाव पर आधारित तकनीक का उपयोग करके बिजली बनाती हैं. भारत जब इन बांधों के गेट बंद करता है, तो पाकिस्तान में पानी का बहाव कम हो जाता है. अनुमान के अनुसार पाकिस्तान की करीब 70 प्रतिशत सिंचाई जरूरतें इसी सिस्टम पर निर्भर हैं. ऐसे में अगर पीओके पर उसका नियंत्रण कमजोर होगा तो उसका कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, देश में खाद्य संकट बढ़ सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है.
पाकिस्तान में धान लगाते किसान
Photo Credit: AFP
पाकिस्तान के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र पंजाब और सिंध हैं. इन दोनों राज्यों की चावल, गेहूं, कपास, गन्ना जैसी फसलें पूरी तरह सिंचाई पर निर्भर हैं. और यह सिंचाई पीओके से आने वाले नदी सिस्टम पर आधारित है. यानी पाकिस्तान की फूट सिक्योरिटी भी पीओके से मिलने वाले पानी से जुड़ा हुआ है.
पीओके सिर्फ पानी नहीं देता, बल्कि बिजली उत्पादन में भी अहम भूमिका निभाता है. इस क्षेत्र में बहने वाली नदियों पर बने या प्रस्तावित कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पाकिस्तान की बिजली का बड़ा हिस्सा सप्लाई करते हैं. पाकिस्तान की 10 से 15 प्रतिशत बिजली हाइड्रोपावर से आती है, जिसमें पीओके आधारित परियोजनाओं की बड़ी भूमिका है. पाकिस्तान पहले से ही ऊर्जा संकट, लोड शेडिंग और बिजली की कमी से जूझता रहा है. ऐसे में पीओके उसकी ऊर्जा सुरक्षा का अहम हिस्सा बन जाता है.
पीओके की रणनीतिक अहमियत
पीओके की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है. यह क्षेत्र भारत और पाकिस्तान के बीच संवेदनशील सीमा पर स्थित है. यह एक तरह का बफर जोन, निगरानी क्षेत्र और सैन्य रणनीति का केंद्र माना जाता है. इसी वजह से यह क्षेत्र दोनों देशों के बीच तनाव का स्थायी कारण रहा है.
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा
Photo Credit: AFP
चीन और सीपीईसी का कनेक्शन
आज पीओके की अहमियत और भी बढ़ गई है क्योंकि यह सीपीईसी यानी चीन पाकिस्तान ऑर्थिक गलियारे का हिस्सा है. यह परियोजना चीन को ग्वादर पोर्ट से जोड़ती है और इसका बड़ा हिस्सा गिलगित, बाल्तिस्तान और पीओके से गुजरता है. इससे अरबों डॉलर के निवेश, सड़कें, टनल प्रोजेक्ट और लॉजिस्टिक नेटवर्क जुड़े हैं. ऐसे में अगर पीओके पर पाकिस्तान का नियंत्रण कमजोर पड़ता है तो इसका सीधा असर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भी पड़ेगा.
संसाधन और आर्थिक महत्व
पीओके प्राकृतिक संसाधनों से भी भरपूर है. यहां मार्बल, ग्रेफाइट, जेमस्टोन्स, बेंटोनाइट और लिमोनाइट जैसे अमूल्य खनिज पाए जाते हैं. इन प्राकृतिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में उपयोग होता है, जबकि स्थानीय स्तर पर विकास अपेक्षाकृत कम रहता है.
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आए दिन लोगों के विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं
Photo Credit: AFP
स्थानीय असंतोष और विकास की स्थिति
कई अध्ययन और रिपोर्ट्स यह संकेत देते हैं कि पीओके में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां गंभीर हैं. यहां की बड़ी आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है. यहां कुपोषण और खाद्य असुरक्षा मौजूद है. बच्चों में स्वास्थ्य समस्याएं देखी जाती है और ग्रामीण इलाकों में विकास की गति बेहद धीमी है. इन्हीं वजहों से यहां समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं.
कुल मिलाकर पीओके का मुद्दा केवल सीमाई विवाद का हिस्सा नहीं है बल्कि पाकिस्तान के लिए यह इतिहास, राजनीति, संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय रणनीति के लिहाज से भी अहम है. लेकिन हाल के दिनों में यहां असंतोष तेजी से बढ़ते देखा गया है.