- CEC को हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 324(5) और 2023 के चुनाव आयोग अधिनियम के तहत विशेष बहुमत से होती है.
- महाभियोग नोटिस लोकसभा में 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर से शुरू होता है.
- नोटिस स्वीकार होने पर SC के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की जांच समिति गठित होती है.
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष आज महाभियोग/हटाने का नोटिस लाने की तैयारी में है. यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में बेहद दुर्लभ कदम है, क्योंकि CEC को हटाने की प्रक्रिया उसी तरह होती है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. इस मुद्दे पर पिछले कुछ दिनों से संसद में तीखे राजनीतिक टकराव जारी हैं.
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
भारत के संविधान के Article 324(5) और 2023 के CEC & ECs Act के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से तभी हटाया जा सकता है जब हटाने मोशन संसद के किसी भी सदन में लाया जाए और यह विशेष बहुमत (Special Majority) से पास हो.
विशेष बहुमत का मतलब
सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और उपस्थित व मतदान कर रहे सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत होना जरूरी है. बता दें कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी कठोर है.
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महाभियोग की प्रक्रिया स्टेप-बाई-स्टेप
1. नोटिस दिया जाता है (लोकसभा या राज्यसभा में से किसी एक में)
लोकसभा में नोटिस के लिए कम से कम 100 MPs के हस्ताक्षर चाहिए. राज्यसभा में कम से कम 50 MPs के हस्ताक्षर होने चाहिए. विपक्ष ने इन हस्ताक्षरों को जुटा लिया है और आज नोटिस सौंपने की तैयारी है.
2. स्पीकर/चेयरमैन द्वारा नोटिस की स्वीकार्यता
नोटिस मिलने के बाद संबंधित सदन का अध्यक्ष तय करता है कि यह नोटिस स्वीकार किया जाए या नहीं. अगर स्वीकार कर लिया गया, तो अगले चरण में मामला जांच के लिए जाता है.
3. जांच समिति का गठन
यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो एक उच्च स्तरीय समिति बनाई जाती है, जिसमें शामिल होते हैं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ (Distinguished Jurist). यह समिति आरोपों की जांच करती है और रिपोर्ट संसद को सौंपती है.
4. संसद में बहस और मतदान
समिति यदि CEC पर लगे आरोपों को सही पाती है, तो रिपोर्ट सदन में रखी जाती है. इसके बाद दोनों सदनों में इस पर बहस और मतदान होता है. किसी भी सदन में विशेष बहुमत न मिलने पर प्रस्ताव स्वतः खत्म माना जाता है.
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5. राष्ट्रपति की मंजूरी
यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों विशेष बहुमत से CEC हटाने के पक्ष में वोट करती हैं, तो प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा जाता है. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर ही CEC को पद से हटाया जा सकता है.
अब विपक्ष क्या कर रहा है?
विपक्ष का आरोप है कि विशेष इंटेंसिव रिविजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची में अनियमितताएं हुईं और CEC ने पक्षपात किया. 100 से अधिक विपक्षी सांसदों ने आज के नोटिस के लिए हस्ताक्षर कर दिए हैं. विपक्ष की योजना है कि पहले लोकसभा में नोटिस दिया जाए, जिसके बाद हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो सके.
क्या यह प्रक्रिया सफल हो सकती है?
सफलता की संभावना राजनीतिक गणित पर निर्भर करती है, क्योंकि सरकार के पास दोनों सदनों में पर्याप्त संख्या है और विशेष बहुमत प्राप्त करना विपक्ष के लिए बेहद कठिन माना जा रहा है. इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम ज्यादा राजनीतिक दबाव और संदेश देने के लिए है, न कि हटाने की वास्तविक संभावना के लिए.













