कांग्रेस के सामने ममता का सरेंडर, अस्तित्व खोने का डर

पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी ने अब कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. हाथ बढ़ाना उनकी मजबूरी है, क्योंकि बात अब राजनीतिक अस्तित्व पर आ गई है.

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सोनिया गांधी और ममता बनर्जी.
IANS
नई दिल्ली:

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आजकल काफी उथल पुथल चल रहा है. वैसे तो इसकी शुरूआत ममता बनर्जी के चुनाव हारने के बाद से ही शुरू हो गई थी. मगर अब ममता बनर्जी की पार्टी टूट चुकी है, सांसद अलग हो गए और तो और पार्टी का चुनाव चिह्न भी चला गया. ये सब तब हुआ है जब बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव होने हैं.

पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस को कहा कि इन दोनों सीटों पर गठबंधन कर लेते हैं और नंदीग्राम कांग्रेस लड़े और वो रेजीनगर सीट लड़ेंगी. मगर कांग्रेस ने मना करते हुए दोनों जगह अपने उम्मीदवार उतार दिए. फिर हुआ ये कि नंदीग्राम से ममता बनर्जी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया तब ममता बनर्जी ने कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा कि कांग्रेस हमारी स्वाभाविक घटक है और सिस्टर पार्टी है. 

ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया है. अब इस नई दोस्ती के कई राजनीतिक मतलब निकाले जा रहे हैं.

अब बात अस्तित्व पर आ गई है

1998 में कांग्रेस से अलग हो कर तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता बनर्जी अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस के साथ जाने से कभी नहीं हिचकी. 

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लेकिन तब उनका एक ही मकसद था कि पश्चिम बंगाल से वामपंथियों की सत्ता को उखाड़ फेंकना. वो एनडीए सरकार के वक्त केंद्र की सरकार का हिस्सा भी रहीं मगर तब उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी वामदल थे.

अब बंगाल में राजनीति ने एक और करवट ली है और बीजेपी सरकार में है और वो ममता बनर्जी के पीछे पड़ी है और अब बात ममता बनर्जी के राजनीतिक अस्तित्व पर आ गई है.

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कांग्रेस से नजदीकी का पहला अहसास ममता बनर्जी ने तब कराया था जब वो बंगाल का चुनाव हारने के बाद पहली बार दिल्ली आई थीं इंडिया गठबंधन के बैठक में शामिल होने के लिए. अपने 15 साल के शासन के दौरान ममता बनर्जी ने कांग्रेस को हमेशा भला बुरा ही कहा खासकर बंगाल कांग्रेस को.

राष्ट्रीय स्तर पर भी वो कांग्रेस नेतृत्व को नकारती ही रहीं. यही नहीं जब इंडिया गठबंधन बना तब तृणमूल कांग्रेस की तरफ से ये मांग भी की गई थी कि ममता बनर्जी इसकी प्रमुख बने. मगर सरकार जाने के बाद उनकी पार्टी के नेताओं के सुर बदल गए हैं.

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तस्वीर 8 जून को हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक की है.
Photo Credit: IANS

'छोड़ो कल की बातें...'

उनकी पार्टी के नेता कुणाल घोष ने कहा है कि 'छोड़ो कल की बातें आओ हम नई शुरुआत करते हैं, हमें कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने में कोई आपत्ति नहीं हैं.'

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अब ममता बनर्जी के बेहद करीबी और लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा है कि 'हमें राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने में कोई आपत्ति नहीं है. राहुल गांधी भी हमारे साथ काम करना चाहते हैं. ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन की पिछली बैठक में राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने की बात की थी जिस पर अभी तक जवाब नहीं आया है. राहुल गांधी ममता बनर्जी के संपर्क में हैं, हमने नंदीग्राम में कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला लिया है. दिक्कत केवल अधीर रंजन चौधरी से है वो ममता के विरोधी हैं मगर फैसला बंगाल कांग्रेस को करना है. हमें इतना पता है कि राहुल गांधी को ममता बनर्जी के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं है.'

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कांग्रेस के सामने हथियार डाल दिए हैं?

इसका मतलब साफ है कि ममता तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस पार्टी के सामने हथियार डाल दिया है. बंगाल में चुनाव की हार के बाद जब ममता बनर्जी दिल्ली आईं थीं तब उनकी सोनिया गांधी के साथ लंबी मुलाकात हुई थी और ये भी कहा गया कि दोनों पार्टियों के विलय पर भी बात हुई है मगर इसकी पुष्टि किसी ने भी नहीं की.

मगर गांधी परिवार से ममता बनर्जी के रिश्ते की बात हमेशा से होती रही है. ये भी कहा जाता रहा है कि उन्होंने कांग्रेस उस वक्त के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के वजह से छोड़ी थी और 10 जनपथ से उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे.

और जैसा कि हमेशा होता आया है कि ममता बनर्जी अपने बड़े राजनीतिक दुश्मन से लड़ने के लिए बाकियों से हाथ मिलाने से नहीं हिचकती.

वामपंथियों से लड़ने के लिए कभी उन्होंने बीजेपी का सहारा लिया तो अब बीजेपी से लड़ने के लिए कांग्रेस का दामन थाम रही हैं. बंगाल में तो चर्चा इस बात की है कि वो वामदलों का भी साथ ले सकती हैं क्योंकि बंगाल में अब ममता बनर्जी के साथ साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के अस्तित्व का खतरा है. 

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वाम दलों से भी हाथ मिलाएंगी ममता?

अभी जो उपचुनाव होने जा रहे हैं वहां पर रेजीनगर मुस्लिम बहुल इलाका है. यहां 65 फीसदी आबादी मुस्लिम समाज की है. यहां पर ममता बनर्जी की पार्टी के अलावा कांग्रेस और वामदल का उम्मीदवार है. यहां मुस्लिम समुदाय किसको वोट करता है उसी से तय होगा कि पूरे बंगाल में आने वाले दिनों में इस समुदाय का वोटिंग पैटर्न क्या रहेगा.

लेकिन जहां तक बंगाल की राजनीति की बात है तो ममता बनर्जी को लगता है कि कांग्रेस के सहारे ही उनकी नैया पार लग सकती है और कांग्रेस भी इतिहास की बातों को भुलाकर ममता को बचाना चाहेगी क्योंकि अभी भी उनके पास करीब 41 फीसदी वोट हैं. उधर ममता भी कह रही हैं छोड़ो कल की बातें, साथी हाथ बढ़ाना रे.

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