मस्जिदों से जुड़े “सर्विस इनाम” की जमीन वक्फ संपत्ति मानी जाएगी... सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रिब्यूनल के निर्णय को बहाल कर दिया. कोर्ट ने 1998 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक सेवाओं के लिए दी गई जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं बनती,बल्कि वह वक्फ का हिस्सा होती है.

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
NDTV
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने  शुक्रवार  को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मस्जिदों से जुड़े “सर्विस इनाम” की जमीन वक्फ संपत्ति मानी जाएगी और इसे बेचा या किसी को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. जस्टिस एम.एम. सुंदरश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि धार्मिक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए दी गई ऐसी जमीन “एंडोव्ड प्रॉपर्टी” (धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति) होती है, इसलिए इसकी खरीद-फरोख्त पर रोक रहती है .यह मामला आंध्र प्रदेश के करनूल जिला में स्थित 3 एकड़ जमीन से जुड़ा था. विवाद इस बात पर था कि यह जमीन वक्फ संपत्ति (सर्विस इनाम) है, या निजी संपत्ति (पर्सनल इनाम), जिसे बेचा जा सकता है.याचिकाकर्ताओं ने 1985 और 1996 की सेल डीड के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया और शांतिपूर्ण कब्जे के लिए अदालत से सुरक्षा मांगी.

वहीं, आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड का कहना था कि यह जमीन ऐतिहासिक रूप से धार्मिक उद्देश्यों के लिए समर्पित है और वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है.मामले में 1945 की एक बंटवारा डीड  अहम साबित हुई, जिसमें खुद याचिकाकर्ताओं ने इस जमीन को “सर्विस इनाम” बताया था और इससे उनके दावे को कमजोर माना गया.वक्फ ट्रिब्यूनल ने याचिका खारिज कर दी, क्योंकि याचिकाकर्ता जमीन पर अपना वैध मालिकाना हक साबित नहीं कर सके. लेकिन आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिया .

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रिब्यूनल के निर्णय को बहाल कर दिया. कोर्ट ने 1998 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक सेवाओं के लिए दी गई जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं बनती,बल्कि वह वक्फ का हिस्सा होती है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी वादी अपने दावे की मजबूती से ही केस जीत सकता है. प्रतिवादी की कमजोरी के आधार पर मालिकाना हक नहीं मिल सकता.अदालत ने कहा कि संबंधित जमीन “सर्विस इनाम” है और वक्फ संपत्ति का हिस्सा है.याचिकाकर्ता अपना वैध हक साबित नहीं कर पाए, इसलिए उन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती.

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