इंदौर में दूषित पानी से पत्नी की मौत, तेरहवीं के बाद पति भी चल बसे, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

Indore Contaminated Water Death: उर्मिला और अलगूराम यादव अब बढ़ती सूची में दो नाम भर हैं, लेकिन भगीरथपुरा के लिए उनकी मौतें एक ऐसा सवाल छोड़ गई, जिसे आंकड़े धो नहीं सकते.

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इंदौर में दूषित पानी से एक ही परिवार के दो लोगों की मौत.
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  • इंदौर के भगीरथपुरा में दूषित पानी पीने से एक परिवार के दो सदस्यों की मौत हो गई और तीसरा अस्पताल में भर्ती हुआ
  • पहले महिला की मौत और फिर तेरह दिन बाद उनके पति अलगूराम यादव की भी उल्टी-दस्त के बाद मौत हो गई
  • स्वास्थ्य विभाग ने अलगूराम की मौत को अन्य बीमारियों से जोड़ा, जबकि परिवार ने पानी को मुख्य कारण बताया
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इंदौर:

इंदौर के भगीरथपुरा ने सिर्फ पानी की गुणवत्ता नहीं खोई, उसने एक पूरे परिवार की सुरक्षा का भरोसा खो दिया धीरे-धीरे, तेरह दिनों के अंतराल में. 28 दिसंबर को उल्टी-दस्त के बाद मौत 70 साल की उर्मिला यादव की हो गई. तेरह दिन बाद, ठीक उनकी तेरहवीं के बाद, उनके पति अलगूराम यादव की तबीयत बिगड़ने लगी. 9 जनवरी को उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत के साथ अरोबिंदो अस्पताल में भर्ती कराया गया. करीब एक महीने तक इलाज के बाद, गुरुवार रात अलगूराम यादव ने भी दम तोड़ दिया.

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दूषित पानी पीकर पति-पत्नी दोनों चले गए

जब एनडीटीवी की टीम उर्मिला यादव की मौत के तीसरे दिन उनके बेटे से मिलने पहुंचा तो घर में प्रार्थना-सभा चल रही थी. अगरबत्तियों की हल्की खुशबू फैली थी, रिश्तेदार चुपचाप बैठे थे, और कमरे के एक कोने में सोफे पर थके-हारे लेकिन जीवित अलगूराम यादव लेटे थे. आज वही दृश्य एक स्मृति बन चुका है. अलगूराम भी अब इस दुनिया में नहीं हैं.

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अलगूराम यादव पहले से कई बीमारियों से ग्रस्त थे. लकवा, दाहिनी जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर और अन्य समस्याएं, लेकिन परिवार का दावा है कि 8 जनवरी तक उनकी हालत स्थिर थी. उनके बेटे और पेशे से दर्जी संजय यादव कहते हैं, “मेरे पिता बिल्कुल ठीक थे. मां की मौत के बाद ही उनकी तबीयत बिगड़ी, वही लक्षण, वही पानी.”

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15 सालों में दादी बनीं, पोते के साथ सिर्फ 10 महीने बिता पाईं

संजय का दुख शब्दों में समाना मुश्किल है. मां उर्मिला के बीमार पड़ने से सिर्फ 11 महीने पहले, पंद्रह साल के इंतज़ार के बाद, परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ था. उर्मिला पहली बार दादी बनी थीं एक ऐसा सुख, जिसके लिए घर ने बरसों दुआ की थी. लेकिन वह अपने नाती के साथ मुश्किल से आठ-दस महीने ही बिता पाईं.

बेटे संजय ने कहा, “मेरी मां हर मायने में स्वस्थ थीं, खुद चलती थीं, घर संभालती थीं. कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, फिर एक शाम उल्टी हुई, अगली सुबह आईसीयू में थीं और रविवार सुबह वह चली गईं.”

बच्चा भी बीमार हुआ, अस्पताल में रहा भर्ती

नवजात बच्चा भी बीमार पड़ा. उसे चाचा नेहरू अस्पताल में भर्ती कराया गया और 17-18 बोतल सलाइन चढ़ाने के बाद छुट्टी मिली. वह अब घर पर है, लेकिन कमजोर है. संजय ने धीमे स्वर में कहा कि पंद्रह साल बाद यह बच्चा हमारी ज़िंदगी में आया और मेरी मां को उसके साथ एक साल भी नहीं मिला.

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इलाके के लोगों का कहना है कि चेतावनी के संकेत पहले से साफ थे. बीमारियां फैलने से कई दिन पहले नल का पानी गंदा आने लगा था. कहीं ड्रेनेज का काम चल रहा था, कहीं पाइपलाइन खुली पड़ी थीं शिकायतें की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. अलगूराम और उर्मिला यादव के भांजे विजय यादव ने उस पूरे घटनाक्रम को गुस्से के साथ याद करते हुए कहा, “मेरी मौसी 28 दिसंबर को चल बसीं. 31 तारीख को उनका पोता अस्पताल में भर्ती हुआ. तेरहवीं के अगले ही दिन मेरे मौसा की तबीयत बिगड़ गई उन्हें ऑरोबिंदो ले जाया गया, हमें मिलने तक नहीं दिया गया.”

प्रशासन का दावा- मौत की वजह पानी नहीं, बीमारियां

जब अलगूराम की हालत कुछ बेहतर हुई तो उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया, लेकिन फिर तबीयत बिगड़ती चली गई.  उनकी मौत के बाद परिवार को बताया गया कि कारण ‘को-मॉर्बिडिटी' यानी अन्य बीमारियां थीं. हालांकि भांजे  विजय ने इस बात को नकार दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें दूसरी बीमारियां थीं, प्रशासन झूठ बोल रहा है, अगर ऐसा ही था, तो सरकार ने लाखों रुपये का इलाज क्यों वहन किया”

उर्मिला की मौत के बाद परिवार को रेड क्रॉस सोसायटी से 2 लाख की आर्थिक सहायता मिली. इससे तत्काल खर्चों में कुछ राहत मिली, लेकिन यह नहीं बता पाई कि एक ही घर में, एक ही पानी पीने के बाद, हफ्तों के अंतराल में दो जानें क्यों गईं.

दूषित पानी से 33 मौतों का दावा

भगीरथपुरा में दूषित पानी से अब तक 33 मौतों का दावा स्थानीय लोग कर रहे हैं. सरकार ने 21 मौतों को ही बात स्वीकारी है. 22वीं मौत के बाद से अधिकारियों ने आगे की मौतों को पानी से जोड़ने से इनकार करते हुए उन्हें “अन्य बीमारियों” का परिणाम बताया.  कई परिवारों का कहना है कि एक-जैसे लक्षणों के बावजूद मौत का कारण आधिकारिक तौर पर नकार दिया गया. कुछ घरों में एक से अधिक मौतें हुई हैं. जिन 21 मौतों को सरकार मानती है, उनमें से 20 परिवारों को 2 लाख की सहायता दी गई है. बाकी परिवारों की लड़ाई सिर्फ मुआवज़े की नहीं, बल्कि स्वीकृति की है.

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अदालत ने सरकार की रिपोर्ट पर उठाए सवाल

अदालत ने भी सरकार के पक्ष पर सवाल उठाए हैं. पिछली सुनवाई में उसने मृत्यु ऑडिट रिपोर्ट को “आई-वॉश” बताया, आंकड़ों में विसंगतियों पर आपत्ति जताई और सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक समिति गठित की. अदालत ने इलाके में तुरंत स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने और चार हफ्तों में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया, अगली सुनवाई 5 मार्च को होगी.

आधिकारिक तौर पर अब तक 450 से अधिक मरीज भर्ती होकर डिस्चार्ज हो चुके हैं. तीन मरीज अभी भी अस्पताल में हैं. उर्मिला और अलगूराम यादव अब बढ़ती सूची में दो नाम भर हैं, लेकिन भगीरथपुरा के लिए उनकी मौतें एक ऐसा सवाल छोड़ गई, जिसे आंकड़े धो नहीं सकते. जब पानी चुपचाप मारता है, तो कौन तय करता है कि किन मौतों को गिना जाए और किन्हें किसी और बीमारी के नाम पर समझा-बुझा दिया जाए.
 

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