ड्रोन कैचर सिस्‍टम खरीदने की तैयारी में भारत, जानें कैसे'जाल' में फंसेंगे ड्रोन्‍स, स्टेल्थ UAV का बचना भी होगा नामुमकिन

कम रडार पहचान वाले ड्रोन और मानव रहित विमान से बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए ड्रोन कैचर सिस्टम की खरीद के लिए सूचना अनुरोध (RFI) जारी किया है.

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  • रक्षा मंत्रालय की सेना के लिए कम रडार पहचान वाले ड्रोन पकड़ने के लिए ड्रोन कैचर सिस्टम खरीद की तैयारी है.
  • प्रस्तावित सिस्टम में ड्रोन सेंसर, ड्रोन कैचर और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन शामिल होंगे जो मिलकर काम करेंगे.
  • ड्रोन सेंसर को कम से कम 4 किलोमीटर दूरी से छोटे आकार के ड्रोन को पहचानने और ट्रैक करने में सक्षम होना चाहिए.
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नई दिल्‍ली:

अगर कोई विमान या ड्रोन देश में घुसपैठ करे तो सबसे पहले उसका पता लगाने का एक ही जरिया है और वो है रडार. लेकिन रडार की भी अपनी सीमाएं होती हैं. ड्रोन का आकार क्या है, वो कितना स्टेल्थ है, उसके आधार पर ही रडार किसी खतरे को ट्रैक कर पाता है. आजकल ऐसे ड्रोन आ गए हैं, जो रडार पर बहुत कम या छोटे दिखते हैं. इसी कड़ी में कम रडार पहचान (Low Radar Cross Section – RCS) वाले ड्रोन और मानव रहित विमान (Unmanned Aerial Vehicles) से बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए ड्रोन कैचर सिस्टम की खरीद के लिए सूचना अनुरोध (Request for Information) जारी किया है.

हालांकि मंत्रालय ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस RFI के तहत कितने सिस्टम खरीदे जाएंगे. लेकिन प्रस्तावित सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से होंगे. इसमें -
- ड्रोन सेंसर
- ड्रोन कैचर
- ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (GCS) शामिल हैं. 

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मछली के जाल की तरह करेगा ऑपरेट 

यह सिस्टम कम RCS वाले ड्रोन को पहचानने, उनकी निगरानी करने और उन्हें जाल (नेट) के जरिए पकड़कर निष्क्रिय करने के लिए बनाया जाएगा यानी ये एक तरह से मछली के जाल की तरह ऑपरेट करेगा. जैसे मछलियां जाल को पार नहीं कर पातीं, वैसे ही ये ड्रोन कैचर सिस्टम भी दुश्मन के ड्रोन्स को पार नहीं होने देगा.

RFI के अनुसार, यह सिस्टम अकेले भी काम कर सकेगा और जरूरत पड़ने पर मौजूदा एयर डिफेंस हथियारों और एंटी-ड्रोन सिस्टम के साथ मिलकर भी काम कर सकेगा. इसे देशभर के अलग-अलग इलाकों जैसे मैदान, रेगिस्तान और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात किया जा सकेगा. 

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ऑपरेशन सिंदूर के बाद महसूस हुई जरूरत 

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया है कि बीते कुछ समय में कम RCS ड्रोन और झुंड में उड़ने वाले ड्रोन (Swarm Drones) का खतरा तेजी से बढ़ा है. हाल के अभियानों, जैसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल देखा गया, जिससे एक खास ड्रोन कैचर क्षमता की जरूरत महसूस हुई. भारतीय सिस्टम्स ने अधिकतर ड्रोन्स को रोक लिया. लेकिन फिर भी कुछ ड्रोन्स LoC पार करने में सफल हो गए थे.

ऐस तैयार होगा दुश्‍मन ड्रोन के लिए जाल 

सिस्टम की मुख्य क्षमताएं और जरूरी शर्तें देखें तो पता चलता है कि इस सिस्टम में कुल 3 हिस्से होंगे जो मिलकर दुश्मन के ड्रोन्स के लिए एक जाल तैयार करेंगे.

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1. ड्रोन सेंसर
RFI के मुताबिक ड्रोन सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन की जाने वाली एरे ( Active Electronically Scanned Array) तकनीक या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होना चाहिए. शर्त यह है कि ये सेंसर यह सेंसर बड़े हवाई क्षेत्र की निगरानी करने में सक्षम हो. ये जहां भी तैनात हो, वहां से 360 डिग्री का कवरेज दे सके. 

इसकी क्षमता इतनी होनी चाहिए कि ये एक साथ कम से कम 20 ड्रोन की पहचान कर उन्हें ट्रैक कर सके. साथ ही ये कौन सा टारगेट कैसा है? उससे कितना खतरा हो सकता है, ये प्राथमिकता खुद तय कर के देकर ड्रोन कैचर तक जानकारी भेज सके. चूंकि इसे कम RCS वाले ड्रोन्स को रोकने के लिए बनाया जाएगा, इसलिए शर्त ये है कि ये 0.01 वर्ग मीटर RCS वाले लक्ष्य को कम से कम 4 किमी दूरी से पहचानने में सक्षम हो.

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2. ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (GCS)
ये इस पूरे सिस्टम का कमांड सेंटर होगा. इसका मुख्य काम ड्रोन सेंसर से मिली जानकारी को सुरक्षित डेटा लिंक के जरिए ड्रोन कैचर तक पहुंचाना होगा. ये सिस्टम दुश्मन ड्रोन की टेलीमेट्री (उड़ान से जुड़ी जानकारी) दिखाएगा. इससे सिस्टम में लगा माइक्रोप्रोसेसर ये गणना करेगा कि टारगेट पर हमला कैसे और किस हथियार से किया जाए. 

साथ ही ये ड्रोन कैचर को हमला करने के लिए जरूरी डेटा भी भेजेगा. इसे लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस के जरिए कमांडर तक पहुंचाया जाएगा. इससे रियल टाइम में दुश्मन के ड्रोन्स की निगरानी और उन्हें मार गिराना आसान हो जाएगा.

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3. ड्रोन कैचर
RFI में रखी गई शर्त के मुताबिक ड्रोन कैचर पूरी तरह स्वचालित (ऑटोमैटिक) होना चाहिए. कैचर को जैसे ही GCS से टारगेट की जानकारी मिलेगी, वैसे ही ये खुद से टारगेट को रोकने की तैयारी शुरू कर देगा.

ये सिस्टम ऐसा होना चाहिए जो दुश्मन ड्रोन को रोककर जाल (नेट) के जरिए पकड़े और उसे निष्क्रिय यानी बेकार कर सके. खास बात यह है कि ये सिस्टम अकेले भी काम कर सकेगा और एक बड़े इंटीग्रेटेड सिस्टम का हिस्सा बनकर भी काम करेगा. शर्त है कि इसे चलाना आसान होना चाहिए. खासकर इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) क्षमता के मामले में इसे टॉप क्वालिटी का होना चाहिए. सिर्फ जाल से पकड़ने के अलावा, इस सिस्टम में जैमर (सिग्नल बाधित करने वाला उपकरण) भी होना चाहिए.

यह जैमर दुश्मन ड्रोन के रेडियो सिग्नल को बाधित करके (RF डिनायल), उसके GPS/GNSS सिग्नल को ब्लॉक या गुमराह करके ड्रोन को वहीं गिरा देगा. मिलिट्री की भाषा में इसे सॉफ्ट किल कहा जाता है. RFI को देखें तो शर्त है कि ये सिस्टम अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने में सक्षम हो. इस तरह यह सिस्टम फिजिकल यानी हार्ड किल और इलेक्ट्रॉनिक यानी सॉफ्ट किल, दोनों तरीकों से दुश्मन ड्रोन को निष्क्रिय करने में सक्षम हो.
 

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