कभी शुभेंदु की रैलियों में एक साथ लगते थे अल्लाह-हू-अकबर के नारे, उनके नाम पर मुस्लिम रखते थे अपने बच्चों के नाम

Suvendu Adhikari: साल 2020 में बीजेपी में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक भाषा बदल गई. जो नेता कभी साझा सांस्कृतिक मंच की बात करता था, वही अब 'तुष्टीकरण की राजनीति' के खिलाफ खुलकर बोलते हुए नजर आने लगे. शुभेंदु अधिकरी के इस बदलाव को बंगाल की जनता ने भी स्वीकार किया.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
अल्लाह-हू-अकबर से जय श्री राम तक: कैसे बदली सुवेंदु अधिकारी की राजनीति की धुरी?
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम आंदोलन के दौरान धर्म और जाति से ऊपर उठकर किसान और ग्रामीण अधिकारों की राजनीति की
  • शुभेंदु की सभाओं में हिंदू और मुस्लिम समान रूप से शामिल होते थे और दोनों धर्मों के नारे गूंजते थे
  • ममता बनर्जी से दूरी और बीजेपी की बढ़ती ताकत को देखते हुए शुभेंदु ने दिसंबर २०२० में भाजपा का दामन थामा
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।
नई दिल्‍ली:

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) शायद सबसे दिलचस्प और सबसे तेज राजनीतिक बदलाव का चेहरा माने जाते हैं. शुभेंदु अधिकारी की राजनीति की धुरी देखते ही देखते 180 डिग्री घूम गई. दरअसल, एक दौर था जब नंदीग्राम आंदोलन के नायक के रूप में उनकी पहचान धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठे नेता की थी. उनकी सभाओं में "अल्लाह-हू-अकबर" और "हर-हर महादेव" के नारे एक साथ गूंजते थे. मुस्लिम परिवार अपने नवजात बच्चों का नाम 'शुभेंदु' रख रहे थे. लेकिन डेढ़ दशक बाद वही शुभेंदु बंगाल में बीजेपी के सबसे फ्रायरब्रांड नेता और 'जय श्री राम' राजनीति के सबसे बड़े पोस्टर बॉय बन चुके हैं.

अल्लाह-हू-अकबर से जय श्री राम तक

दरअसल, यह बदलाव केवल एक बड़े नेता की राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती सामाजिक और चुनावी राजनीति की कहानी भी है. साल 2007 का 'नंदीग्राम आंदोलन' बंगाल की राजनीति का टर्निंग पॉइंट माना जाता है. भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन ने तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार की नींव हिला दी थी. उस आंदोलन के चर्चित चेहरों में शुभेंदु अधिकारी शामिल थे. उस समय उनकी राजनीति का केंद्र किसान, ग्रामीण अस्मिता और स्थानीय अधिकार थे, न कि धार्मिक पहचान. पूर्व मेदिनीपुर और नंदीग्राम के मुस्लिम बहुल इलाकों में शुभेंदु की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि कई मुस्लिम परिवारों ने अपने बच्चों का नाम उनके नाम पर रखा. स्थानीय नेता बताते हैं कि उस समय शुभेंदु की सभाओं में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक समान शामिल होते थे. मंच से "अल्लाह-हू-अकबर" और "हर-हर महादेव" के एक साथ नारे लगना उस दौर की बंगाल राजनीति में आम दृश्‍य थे. उस समय उनकी छवि एक ऐसे नेता की थी, जो ममता बनर्जी के आंदोलनकारी सहयोगी के रूप में वामपंथ के खिलाफ जनता की आवाज बन रहे थे.

Add image caption here
Photo Credit: PTI

TMC से दूरी और राजनीतिक असंतोष

समय के साथ ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के रिश्तों में दूरी बढ़ने लगी. पार्टी और सरकार में प्रभाव को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे. अधिकारी परिवार, जो लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का मजबूत स्तंभ माना जाता था, धीरे-धीरे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगा. इसी दौर में शुभेंदु ने बंगाल की बदलती चुनावी हवा को पढ़ना शुरू किया. बीजेपी राज्य में तेजी से उभर रही थी और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण उसकी सबसे बड़ी ताकत बन रहा था. शुभेंदु ने इस नई राजनीति में अपने लिए अवसर देखा. 19 दिसंबर 2020 को शुभेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए.



शुभेंदु की बीजेपी में नई पहचान 'जय श्री राम' 

साल 2020 में बीजेपी में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक भाषा बदल गई. जो नेता कभी साझा सांस्कृतिक मंच की बात करता था, वही अब 'तुष्टीकरण की राजनीति' के खिलाफ खुलकर बोलते हुए नजर आने लगे. उनकी सभाओं में 'जय श्री राम' प्रमुख नारा बन गया. उन्होंने बार-बार आरोप लगाया कि बंगाल में हिंदुओं के साथ भेदभाव हुआ है और बीजेपी ही उनके अधिकारों की रक्षा कर सकती है. यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं था. सुवेंदु ने खुद को बंगाल में हिंदुत्व राजनीति के सबसे भरोसेमंद चेहरे के रूप में स्थापित करने की रणनीति अपनाई.

Advertisement

ये भी पढ़ें :- पश्चिम बंगाल में BJP सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़, सुवेंदु अधिकारी की पहले दिन से ही अग्निपरीक्षा शुरू

ममता बनर्जी को हराकर दिखाया दमखम 

2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराने के बाद उनकी यह छवि और मजबूत हो गई. बीजेपी समर्थकों के बीच शुभेंदु 'हिंदू अस्मिता' और 'ममता विरोध' के सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे. शुभेंदु अधिकारी का ये बदला हुआ रूप बंगाल की राजनीति में आए बड़े बदलाव का संकेत भी है. लंबे समय तक बंगाल की राजनीति वर्ग, किसान और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही. लेकिन पिछले एक दशक में धार्मिक पहचान और ध्रुवीकरण चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा बन गया.

Advertisement

ये भी पढ़ें :- अंग-बंग-कलिंग... पूर्वी भारत के गौरव और विकास का नया कॉरिडोर

Featured Video Of The Day
Yogi Cabinet Expansion 2026: कैबिनेट विस्तार से CM योगी ने कैसे साधे सारे समीकरण? UP News
Topics mentioned in this article