"टैक्स देने वाले सोचते हैं, पैसा विकास में लगे, फ्री में देने के लिए नहीं..." : चुनावों में फ्री-बी के वादे पर SC

सीजेआई ने कहा कि ये सब मानते हैं कि ये एक गंभीर मुद्दा है, जो टैक्स देते हैं वो सोचते होंगे कि टैक्स का पैसा विकास के लिए लगना चाहिए, न कि फ्री में देने के लिए.

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चुनावों में मुफ्त सुविधाओं के वादे पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई (फाइल फोटो)

चुनाव में मुफ्त सुविधाओं का वादा करने वाली राजनीतिक पार्टियो की मान्यता रदद् करने की मांग वाली अश्विनी उपाध्याय की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई. SC ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि हमें हलफनामा नहीं मिलता, लेकिन वो सभी न्यूज पेपर को मिल जाता है. हमने आपका हलफनामा न्यूज पेपर में पढ़ लिया है. आखिर हमसे पहले मीडिया को कैसे मिल गया. याचिकाकर्ता की ओर से विकास सिंह ने चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि यह संभव है कि राजनीतिक दल इस तरह के वादे करते हैं, यह जानते हुए कि इसे प्रतिबंधित किया जाएगा या नियामक प्राधिकरण द्वारा प्रतिकूल टिप्पणी की जाएगी, जो चुनाव के बाद वास्तविक कार्यान्वयन की तुलना में अधिक प्रचार और लाभ देकर अपनी स्थिति को बेहतर ढंग से पूरा कर सकते हैं. SC ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या सभी राजनीतिक पार्टी चुनाव के पहले अपना मेनिफेस्टो चुनाव आयोग को देती हैं? विकास सिंह ने कहा कि नहीं, ऐसा कोई नियम नहीं है. केंद्र सरकार की तरफ से SG ने कहा कि ज्यादातर फ्री बी मेनिफेस्टो का हिस्सा नहीं होते, वो चुनाव प्रचार के दौरान वादे में कहे जाते हैं.

CJI ने कहा कि ये सब मानते हैं कि ये एक गंभीर मुद्दा है, जो टैक्स देते हैं वो सोचते होंगे कि टैक्स का पैसा विकास के लिए लगना चाहिए, न कि फ्री में देने के लिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सवाल ये है कि हम किस हद तक इस मामले में जा सकते हैं. इस मामले में चुनाव आयोग है, राजनीतिक पार्टियां हैं, फाइनेंशियल डिसिप्लिन होना चाहिए. दूसरे देशों को देखना चाहिए. भारत में हमने राज्य और केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को देखा है. बाढ़, सूखा और कोविड के समय कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं. भारत भी एक ऐसा देश है, जहां गरीबी है और केंद्र सरकार भी भूखों को खाना खिलाने आदि की योजना है. SG ने कहा कि लोक कल्याण करने का एकमात्र तरीका मुफ्त उपहारों का वितरण नहीं हो सकता. CJI ने कहा कि मुफ्त उपहार और सामाजिक कल्याण योजना अलग हैं.

आम आदमी पार्टी की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अदालत जो एक्सपर्ट कमेटी के गठन का सुझाव दे रही है वो मामले को कहीं नहीं ले जाएगा. फ्री बी को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. सीजेआई ने कहा कि अगर हम कहते हैं कि इस तरह के देश में यह दो और ये मत दो. इसे कैसे हल किया जा सकता है.

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वकील विजय हंसारिया ने कहा कि मैंने सिफारिश दी है कि कौन-कौन इस कमेटी का हिस्सा हो सकता है. अरविंद दातार ने कहा कि इस समिति को रिपोर्ट के लिए 8 सप्ताह की समय सीमा दी जा सकती है.  सीजेआई ने कहा कि मान लीजिए कि अगर मैं चुनाव लड़ रहा हूं तो वे 100 बातें कहेंगे, लेकिन आप उनसे पैसे जमा करने के लिए नहीं कह सकते. जब तक वे सत्ता में नहीं आएंगे, तब तक उन्हें बजट के बारे में कैसे पता चलेगा?

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सिंघवी - इस अदालत को एक समिति के माध्यम से भी यात्रा शुरू नहीं करनी चाहिए.  ये न्यायिक रूप से प्रबंधनीय मानक नहीं है. मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली या मुफ्त सार्वजनिक परिवहन जैसे चुनावी वादे " फ्री बी" नहीं हैं, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत समाज बनाने की दिशा में "राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों" का निर्वहन करने के उदाहरण हैं. विकास का समाजवादी और कल्याणवादी मॉडल" मुफ्त या रियायती दरों पर कई सुविधाएं प्रदान करना है. एक असमान समाज में ये योजनाएं "बिल्कुल आवश्यक" हैं. सीजेआई ने कहा कि आप ये नहीं कह सकते कि SC को इस मामले को बिल्कुल भी नहीं देखना चाहिए.

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केंद्र सरकार ने फ्री बी कल्चर का कड़ा विरोध किया है.  SG तुषार मेहता ने कहा कि अब इस मुफ्तखोरी की संस्कृति को आर्ट के स्तर तक ऊंचा कर दिया गया है और अब चुनाव केवल इसी आधार पर लड़ा जाता है. यदि मुफ्त उपहारों को लोगों के कल्याण के लिए माना जाता है, तो यह एक आपदा की ओर ले जाएगा. ये एक खतरनाक स्तर है. कोर्ट को इसमें दखल देना चाहिए और नियम तय करने चाहिए. एसजी ने कहा कि अब इस मुफ्तखोरी की संस्कृति को कला के स्तर तक ऊंचा कर दिया गया है और अब चुनाव केवल जमीन पर लड़ा जाता है. यदि मुफ्त उपहारों को लोगों के कल्याण के लिए माना जाता है, तो यह एक आपदा की ओर ले जाएगा. सीजेआई ने कहा कि यह अलग मुद्दा है. अर्थव्यवस्था का पैसा लुटाना और लोगों का कल्याण, दोनों को संतुलित करना होगा,  इसलिए यह बहस होनी चाहिए. कोई ऐसा होना चाहिए जो विचारों को दृष्टि में रखे. अगले हफ्ते तक हमें ये विचार दें.

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