विरोध का अधिकार है, लेकिन मर्यादा भी जरूरी... संसद के हंगामे पर सोनिया को लिखे पत्र में पूर्व पीएम देवगौड़ा

पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने संसद में लगातार हो रहे हंगामे और विरोध पर चिंता जताते हुए सोनिया गांधी को पत्र लिखा है और कांग्रेस व विपक्षी सांसदों से संसदीय मर्यादा बनाए रखने की अपील की.

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एच डी देवगौड़ा ने सोनिया गांधी को लिखा पत्र
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  • एच.डी. देवगौड़ा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को संसद में विपक्षी हंगामे पर गंभीर चिंता जाहिर की
  • देवगौड़ा ने लिखा कि विपक्ष के व्यवहार से लोकतंत्र की नींव को नुकसान पहुंचने का खतरा है और अराजकता बढ़ रही है
  • उन्होंने संसदीय गरिमा बनाए रखने और विरोध के लिए समय-परीक्षित और सुस्थापित तरीकों के पालन पर जोर दिया है
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नई दिल्ली:

देश के पूर्व पीएम और राज्यसभा सदस्य एच.डी. देवगौड़ा ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संसद में विपक्ष द्वारा हंगामे और विरोध पर चिंता जताई है. उन्होंने लिखा है, संसद और उसके परिसर में विपक्षी दलों द्वारा अनजाने में पैदा की गई अराजकता से मैं बहुत परेशान हूं. देवगौड़ा ने आगे लिखा है, "मुझे नहीं पता कि आप इस तरह की अनियंत्रित गतिविधियों और नकारात्मक ऊर्जा के प्रसार के परिणामों को समझ पा रही हैं या नहीं. मुझे लगता है कि इससे हमारे लोकतंत्र की नींव को बहुत नुकसान हो सकता है और कड़वाहट की एक अमिट छाप छोड़ी जा सकती है. मैंने पहले आपको पत्र न लिखने का कारण यह था कि मुझे लगा कि समय के साथ चीजें शांत हो जाएंगी, लेकिन मुझे खेद है कि सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं.

लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों को नुकसान का खतरा

पूर्व पीएम एच. डी. देवगौड़ा ने आगे लिखा कि सोनिया गांधी आप जानती हैं कि मैंने अपने करियर की शुरुआत लोकतांत्रिक संस्थाओं के जमीनी स्तर से की थी और मैंने अपने जीवन के कुल 65 वर्ष विधायक और सांसद के रूप में बिताए हैं. साथ ही मैंने अपना लगभग नब्बे प्रतिशत समय विपक्ष की बेंचों पर बिताया है. आपने स्वयं भी विपक्ष में लंबे वर्ष बिताए हैं और वहां रहते हुए आपने गरिमा और परिपक्वता के साथ व्यवहार किया है. चूंकि यह मेरे जीवन का अंतिम संसदीय सत्र हो सकता है, इसलिए मैं कुछ बातें कहना अनिवार्य समझता हूं इस आशा के साथ कि इससे संसदीय परंपराओं और मर्यादा की धीरे-धीरे बहाली होगी."

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विपक्ष में रहते हुए संसदीय गरिमा का अनुभव साझा

पूर्व प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, "मुझे लगता है कि विपक्ष के नेता के नेतृत्व में कांग्रेस सांसदों ने संसद के अंदर और उसके परिसर में बहुत अधिक व्यवधान उत्पन्न किए हैं. हाल के दिनों में संसद में नारेबाजी, तख्तियां लहराने और गाली-गलौज की घटनाएं हद से ज्यादा देखने को मिली हैं. गैर-गंभीरता का ऐसा रवैया देखने को मिला है, जिसने संसद और संसदीय लोकतंत्र के मेरे मूल विचार और संरचना पर ही प्रहार किया है. निसंदेह, संसदीय लोकतंत्र के मेरे विचार हमारे संस्थापक पिताओं, जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, बी.आर. अंबेडकर और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद आदि के दिए गए उपदेशों और मार्गदर्शन पर आधारित हैं. अपने लंबे अनुभव में मैंने संसद को कभी इतनी अराजकता और लापरवाही में नहीं देखा जितना हमने हाल ही में देखा है.

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नारेबाजी और अव्यवस्था पर कड़ा संदेश

देवगौड़ा ने आगे लिखा, "अपने पूरे करियर में, यहां तक ​​कि अत्यधिक उकसावे की स्थिति में भी मैंने कभी भी राज्य विधानसभा या संसद में विरोध प्रदर्शन करने के लिए सदन के वेल में प्रवेश नहीं किया. यह संस्कृति हमें हमारे लोकतंत्र के पूर्वजों ने सिखाई थी. मैं समझता हूं कि विपक्ष के नेता का जीवन आसान नहीं होता. उनके सामने एक बहुत बड़ा कर्तव्य होता है कि वे सत्ता पक्ष के समक्ष उन अन्याय और कमियों को लाएं, जिन्हें वे महसूस करते हैं और मानते हैं कि वे हो रहे हैं, लेकिन ऐसा करने का एक सुस्थापित और समय-परीक्षित तरीका है. विरोध प्रदर्शन के दौरान वे स्वयं को नीचा नहीं दिखा सकते और न ही अपनी कुर्सी की गरिमा को कम कर सकते हैं. वे यह नहीं सोच सकते कि उनकी सफलता नियमों और परंपराओं से बाहर जाकर काम करने में निहित है.

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विरोध का अधिकार, लेकिन नियमों और मर्यादाओं के साथ

जब हम सांसद के रूप में शपथ लेते हैं, तो हम अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को इसके नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं के प्रति प्रतिबद्ध करते हैं. चूंकि मैंने स्वयं राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सरकार चलाई है, इसलिए मैं कह सकता हूं कि मैंने जिन वैध विपक्ष का सामना किया है, उन्होंने हमेशा हमारी संसद और हमारे लोकतंत्र की परंपराओं के प्रति जागरूकता दिखाई है. उन्होंने राष्ट्रीय हित की मांग और आवश्यकता के अनुसार संयम से काम किया है. विरोध प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने संसद के प्रवेश द्वार को अवरुद्ध नहीं किया, न ही अपनी सभा को चाय की दुकान की सभा जैसा बनाया और इससे भी बुरा, संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय, बिस्कुट और पकौड़े मंगवाए. जब ​​दुनियाभर में लोकतंत्रों को भारी दबावों का सामना बड़ी नाजुकता से करना पड़ा है तो मुझे लगता है कि विपक्ष को इस बात का ध्यान रखते हुए कार्य करना चाहिए कि उनकी अतिवादिता इसके अस्तित्व को ही भारी नुकसान पहुंचा सकती है. वास्तव में, उन्हें संसदीय मर्यादा, प्रक्रिया और परंपराओं का संरक्षक होना चाहिए."

संसदीय परंपराओं की रक्षा की सोनिया गांधी से अपील

पूर्व प्रधानमंत्री ने पत्र में लिखा है, "मैं इस पर और अधिक चर्चा नहीं करना चाहता. मुझे यकीन है कि आप मेरी चिंताओं और उससे भी महत्वपूर्ण, मेरे इरादे को समझ गई होंगी. मैं किसी को नीचा नहीं दिखाना चाहता, न ही किसी की भूमिका या उत्साह को कम करना चाहता हूं, लेकिन मैं आपसे एक आग्रह करता हूं कि आप अपने राजनीतिक अनुभव और परिपक्वता का लाभ उठाते हुए अपने दल के नेताओं और अन्य लोगों से बात करें. आप उनसे यह अनुरोध करें कि वे स्वयं को, अपने उद्देश्य को और अपने राजनीतिक भविष्य को दीर्घकालिक रूप से नुकसान न पहुंचाएं. मुझे पूरा विश्वास है कि आप आवश्यक कदम उठाएंगे. मेरा मानना ​​है कि विपक्ष जितना चाहे उतना विरोध कर सकता है, लेकिन विरोध इस तरह से किया जाना चाहिए जिससे उन सभी चीजों को नष्ट न किया जा सके जिन्हें हमने 75 वर्षों से अधिक के गौरवशाली वर्षों में मिलकर बनाया है."

(IANS इनपुट्स के साथ)

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