"क्रिमिनल मामलों में TV चैनलों पर होने वाली बहस आपराधिक न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान": SC

आपराधिक मामलों में टीवी पर होने वाली बहस पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी आई है. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में टीवी चैनलों में होने वाली बहस आपराधिक न्याय प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप के समान है. ये मामला आपराधिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र का हैं.

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ऐसी कोई भी बहस जो अदालतों के क्षेत्र में हैं, उन्हें आपराधिक न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाएगा.
नई दिल्ली:

आपराधिक मामलों में टीवी पर होने वाली बहस पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी आई है. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में टीवी चैनलों में होने वाली बहस आपराधिक न्याय प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप के समान है. ये मामला आपराधिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र का हैं. जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ का ये फैसला है. अपराध से संबंधित सभी मामले और क्या कोई विशेष बात सबूत का एक निर्णायक हिस्सा है ? इसे एक टीवी चैनल के माध्यम से नहीं, बल्कि एक कोर्ट द्वारा निपटाया जाना चाहिए. अदालत चार आरोपियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर विचार कर रही थी, जिन्हें डकैती के मामले के तहत दोषी ठहराया गया था. 

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ये एक पुलिस अधिकारी को स्वीकारोक्ति की प्रकृति में एक बयान के बारे में है. इसे जांच एजेंसी द्वारा रिकॉर्ड की गई डीवीडी पर उक्त बयानों को एक चैनल द्वारा कार्यक्रम में चलाया और प्रकाशित किया गया था. पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में चलाई गई डीवीडी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का आधार बनाया था. डीवीडी को एक निजी टीवी चैनल के हाथों में जाने की अनुमति देना कर्तव्य की उपेक्षा और न्याय के प्रशासन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के अलावा और कुछ नहीं है. अपराध से संबंधित सभी मामले और क्या कोई ऐसा विशेष सबूत का एक निर्णायक हिस्सा है, इसे एक न्यायालय द्वारा निपटाया जाना चाहिए, न कि एक टीवी चैनल के माध्यम से. यदि कोई स्वैच्छिक बयान था, तो मामले को कानून की अदालत द्वारा निपटाया जाएगा.  सार्वजनिक मंच इस तरह की बहस या सबूत के लिए जगह नहीं है. वरना कानून के न्यायालयों के अनन्य क्षेत्राधिकार और कार्य क्या रहेंगे. ऐसी कोई भी बहस या चर्चा जो अदालतों के क्षेत्र में हैं, उन्हें आपराधिक न्याय प्रशासन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप माना जाएगा.

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