'फेयरनेस' का काला सच: धार में पत्नी ने खेला खूनी खेल ! क्या 25 हजार करोड़ के 'गोरेपन' का बाजार घोल रहा है जहर?

Dark Skin crime in india: मध्यप्रदेश के धार में 'सांवलेपन' के कारण हुई हत्या ने समाज में फैले गहरे रंगभेद को उजागर किया है. भारत में जहां 25,000 करोड़ का ब्यूटी मार्केट हमारी सोच में 'गोरेपन' का जहर घोल रहा है, वहीं मैट्रिमोनियल साइट्स के फिल्टर इस भेदभाव को और बढ़ावा दे रहे हैं. जानिए कैसे यह 'मेंटल महामारी' मासूम जिंदगियां निगल रही है और बाजार हमारी असुरक्षाओं पर फल-फूल रहा है.

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  • मध्य प्रदेश के धार में पति के 'काले रंग' के कारण पत्नी ने उसकी हत्या करवा दी, जो रंगभेद का गंभीर उदाहरण है
  • भारत में स्किन केयर बाजार तेजी से बढ़ रहा है और त्वचा निखारने वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है
  • मैट्रिमोनियल वेबसाइटों पर गोरे रंग को प्राथमिकता देने वाले फिल्टर का विरोध बढ़ने पर उसे हटाना पड़ा
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Fairness Obsession in India:  साल 1974 में एक सुपरहिट फिल्म आई थी, 'रोटी'- इसमें राजेश खन्ना-मुमताज पर फिल्माया गाना था- गोरे रंग पर न इतना गुमान कर, गोरा रंग तो दिन में ढल जाएगा...गाने में बड़ी सीख छिपी लेकिन लगता है हम भारतीयों ने इसके मायने को आज 52 सालों बाद भी नहीं समझा...तभी के धार से रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर आई है. जिसमें  एक पत्नी ने अपने पति को सिर्फ इसलिए रास्ते से हटा दिया क्योंकि उसे पति का रंग 'काला' लगता था. उसका कहना था- "तुम काले हो और मुझे डिजर्व नहीं करते." आपको यह सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन धार की यह घटना उस गहरे नासूर का सिरा है जो भारत के ज्यादातर घरों, हर मैट्रिमोनियल विज्ञापन और हर ब्यूटी पार्लर की नींव में दबा है. हम इसे अक्सर 'रंगभेद' या  या 'Colorism' कहते हैं, लेकिन असल में यह एक 'मेंटल महामारी' है जिसे बाजार की ताकतें खाद-पानी दे रही हैं....कैसे जानिए इस रिपोर्ट में...

सबसे पहले बात मध्यप्रदेश की धार की...वहां के  राजोद थाना क्षेत्र में मिर्ची व्यापारी देवकृष्ण पुरोहित को उनकी पत्नी प्रियंका हमेशा ताने मारती थी- “तुम काले हो”. घर में आए दिन इसी बात को लेकर विवाद होता रहता था, जिससे देवकृष्ण मानसिक दबाव में रहने लगा था. रिश्तों में तनाव बढ़ा तो प्रियंका ने अपने प्रेमी कमलेश की सहायता से 1 लाख रुपये की सुपारी देकर अपने पति देवकृष्ण की हत्या करवा दी. देवकृष्ण की बहन ने बताया- भाभी हमेशा उनके भाई को उनके सावंलेपन को लेकर ताने मारती थी. देवकृष्ण अब इस दुनिया में नहीं हैं पर उनकी मौत से जो सवाल उठे हैं वे अभी भी जिंदा हैं. दरअसल देखा जाए तो धार की घटना तो बस झांकी है...असलियत कहीं और भी ज्यादा भयानक है. अपराध की फाइलों में ऐसे कई पन्ने दबे हैं जहां 'रंग' की सनक कातिल बनी है. मसलन-  

अब आप समझ गए होंगे कि रंगभेद की सनक के जानलेवा होने की धार इकलौती घटना नहीं है. अब सवाल ये है कि आखिर लोग सूरत की जगह सीरत को तवज्जो क्यों नहीं दे रहे हैं. देखा जाए तो इसकी वजह सिर्फ यही है कि हम जिस परिवेश में बड़े हो रहे हैं वो  हमें गोरे रंग को ही अच्छा मानने की ही सीख देता है. इन परिस्थितियों पर भी नजर डाल लेते हैं. 

अलग-अलग विभिन्न मार्केट रिपोर्ट्स (जैसे Fortune Business Insights) के अनुमानों को देखें तो भारत का स्किन केयर मार्केट 2026 तक 2.98 बिलियन डॉलर (करीब 25,000 करोड़ रुपये) के आंकड़े को छू रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस बाजार का एक बड़ा हिस्सा उन प्रोडक्ट्स के भरोसे चल रहा है जो 'त्वचा निखारने' या 'गोरापन' देने का दावा करते हैं.रिसर्च फर्म Mintel के कंज्यूमर बिहेवियर ट्रेंड्स बताते हैं कि मैट्रिमोनियल साइट्स पर 'Fair' फिल्टर का इस्तेमाल दूसरे स्किन टोन के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है.

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Vyansaintelligence और Fortune Business Insights की रिपोर्ट के अनुसार 2026 तक यह $2.98 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है. 

मैट्रिमोनियल वेबसाइट Shaadi.com को हटाना पड़ा फिल्टर का ऑप्शन

इस मुहिम की शुरुआत साल 2020 में हुई. जब अमेरिका में अभियान चल रहा था- 'ब्लैक लाइव्स मैटर'. इसी दौरान भारतीय मूल की मेघन नागपाल ने Shaadi.com पर 'स्किन कलर' फिल्टर देखा. उन्होंने इसकी शिकायत की, लेकिन जब वेबसाइट ने इसे हटाने से इनकार कर दिया, तो हेतल लखानी ने इस भेदभाव के खिलाफ ऑनलाइन पिटीशन शुरू की. देखते ही देखते 14 घंटे के भीतर 16,000 से ज्यादा लोगों ने इस पर हस्ताक्षर कर अपना विरोध दर्ज कराया. भारी जनमत और वैश्विक दबाव के आगे झुकते हुए Shaadi.com को रातों-रात अपने प्लेटफॉर्म से स्किन टोन फिल्टर हटाना पड़ा.
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डर्मेटोलॉजिस्ट के क्लिनिक में 'गोरेपन' की सेल

अब जमाना सिर्फ घरेलू नुस्खों का नहीं रहा. अब लोग मेडिकल साइंस के जरिए रंग बदलना चाहते हैं.कई डर्मेटोलॉजिकल सर्वे और क्लिनिकल ट्रेंड्स (जैसे IJDVL के शोध) इशारा करते हैं कि स्किन क्लीनिकों में आने वाले मरीजों में एक बड़ा हिस्सा यानि हर 3 में से 1 मरीज केवल पिगमेंटेशन या स्किन लाइटनिंग की चाहत लेकर आता है.ग्लूटाथियोन' जैसे स्किन ब्राइटनिंग इंजेक्शनों और लेजर थेरेपी की मांग में सालाना 15 से 18 प्रतिशत की अनुमानित बढ़ोतरी देखी जा रही है.जानकारों के मुताबिक भारत में एक बड़ी आबादी 'बॉडी इमेज एंग्जायटी' से जूझ रही है, जिसका मूल कारण सांवले रंग के प्रति सामाजिक नजरिया है.

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 नाम बदला,नीयत नहीं: 'फेयर' से 'ग्लो'तक का सफर

भारत में ये समस्या गंभीर है. इतनी गंभीर की सरकारों को भी सख्ती दिखानी पड़ी. सरकार ने 2020 में 'ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट' में बदलाव का प्रस्ताव दिया, जिसमें गोरा करने का भ्रामक दावा करने पर 50 लाख रुपये तक का जुर्माना और 5 साल की जेल की बात कही गई. विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) ने 'Fair' जैसे शब्दों पर नकेल कसी, जिसके बाद 'Fair & Lovely' रातों-रात 'Glow & Lovely' बन गई. हालांकि चिंता की बात ये है कि विज्ञापन आज भी वही कह रहे हैं— "चमक (गोरापन) लाओ, तभी दुनिया देखेगी.

आखिर ये खत्म कब होगा? 

दरअसल धार की उस महिला ने अपने पति की जान इसलिए ली क्योंकि उसे बचपन से समाज, सिनेमा और विज्ञापनों ने सिखाया कि 'खूबसूरती' सिर्फ दूध जैसे रंग में होती है. जब तक हम 'चरित्र' से पहले 'चमड़ी' देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक धार जैसी खबरें आती रहेंगी और 25 हजार करोड़ का यह बाजार हमारी असुरक्षाओं पर फलता-फूलता रहेगा.
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डिस्कलेमर: इस आर्टिकल में दिए गए आंकड़े अलग-अलग रिपोर्ट्स और एजेंसियों के अनुमान के आधार पर है. वास्तविक आंकड़ों में अंतर हो सकता है. 

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