- नालंदा दुनिया का सबसे प्राचीन आवासीय विश्वविद्यालय था, जहां हजारों विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन करते थे.
- नालंदा में विषयों के बीच ज्ञान का समन्वित प्रवाह था, जहां वाद-विवाद सत्य की खोज के लिए किए जाते थे
- आक्रमण के बाद भी नालंदा का ज्ञान तिब्बत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलता रहा और पांडुलिपियां संरक्षित हुईं
"ज्ञान पर कभी पूर्णविराम नहीं लगता, यह बढ़ता है, यात्रा करता है और अलग‑अलग रूपों में प्रकट होता है." नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी की ये बात शत-प्रतिशत सही है. दुनिया में बहुत कम स्थान ऐसे हैं जहां, यह कथन उतना ही गहरा अर्थ रखता हो, जितना प्राचीन नालंदा महाविहार के खंडहरों के बीच. सदियों पुराने ईंटों के अवशेषों के बीच, प्रसिद्ध बौद्ध मठवासी विश्वविद्यालय के मंदिर संख्या तीन में खड़े होकर, प्रो. चतुर्वेदी एक ऐसे विचार पर चिंतन करते हैं जो आक्रमण, आग और समय की परीक्षा के बावजूद जीवित रहा है. ये कह रहा है कि कि किताबें जलाई जा सकती हैं, लेकिन ज्ञान को नष्ट नहीं किया जा सकता.
राष्ट्रपति मुर्मू का नालंदा दौरा
यह विचार उस समय और भी महत्वपूर्ण लगता है, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 31 मार्च 2026 को नालंदा के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करने के लिए पहली बार यहां आने की तैयारी कर रही हैं. यह क्षण भारत की सभ्यतागत विरासत और भविष्य की आकांक्षाओं के बीच एक सशक्त सेतु बन जाता है. एनडीटीवी की यह खास बातचीत न केवल कही गई बातों के कारण दुर्लभ थी, बल्कि उसके स्थान के कारण भी. बातचीत का कुछ हिस्सा प्राचीन नालंदा महाविहार के संरक्षित खंडहरों के भीतर का है. यहां आम लोगों की एंट्री सख्ती से नियंत्रित है. यहां हज़ार वर्षों से अधिक का इतिहास समाहित हो गया.
दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात आवासीय विश्वविद्यालय
प्रो. चतुर्वेदी बताते हैं कि नालंदा केवल एक शिक्षण संस्था नहीं था. यह दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात आवासीय विश्वविद्यालय था, जहां लगभग 10,000 विद्यार्थी और विद्वान रहते, बहस करते और लगभग दो दशकों तक अध्ययन करते थे. ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड या स्टैनफोर्ड जैसे आधुनिक विश्वविद्यालयों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही नालंदा चीन, कोरिया, तिब्बत और दक्षिण‑पूर्व एशिया तक से विद्वानों को आकर्षित कर रहा था. "जो आप यहां देख रहे हैं, वह संचित ज्ञान की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है," प्रो. चतुर्वेदी खंडहरों की वास्तुकला की ओर इशारा करते हुए कहते हैं. "इन नक्काशियों को देखिए, नियोजन को देखिए, ध्वनि, हवा और छात्रों की एकाग्रता का जो ध्यान रखा गया है, वह सब बताता है कि ज्ञान ने सभ्यता को कितनी गहराई से आकार दिया."
यहां ज्ञान के अलग‑अलग खांचे नहीं थे
नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा का पैमाना अभूतपूर्व था. छात्रों को दर्शन, तर्कशास्त्र और गणित में महारत हासिल करनी होती थी, उसके बाद ही वे खगोलशास्त्र, चिकित्सा या अन्य विषयों में विशेषज्ञता प्राप्त कर सकते थे. यहां ज्ञान के अलग‑अलग खांचे नहीं थे. बहस, जिज्ञासा और नैतिक आधार के साथ विषयों के बीच ज्ञान स्वतः प्रवाहित होता था, न कि प्रतिस्पर्धा के दबाव में. प्रो. चतुर्वेदी के अनुसार, यह समन्वित दृष्टिकोण आधुनिक शिक्षा प्रणालियों से बिल्कुल अलग है, जहां अध्ययन अक्सर मुश्किल विभागों में बंट जाता है. नालंदा में वाद‑विवाद केंद्रीय था, लेकिन वह आक्रामक नहीं था. आंगन संवाद, निर्णय और सामूहिक तर्क के लिए बनाए गए थे. यहां तर्क जीतने के लिए नहीं, बल्कि सत्य की खोज के लिए किये जाते थे.
प्राचीन विश्वविद्यालय का प्रभाव भारत की सीमाओं से बहुत आगे तक फैला. ह्वेन सांग, जिन्हें आज चीनी नाम से श्वेनज़ांग कहा जाता है, जैसे चीनी विद्वान यात्रियों ने यहां वर्षों तक अध्ययन किया, ग्रंथों का अनुवाद किया और उन विचारों को पूर्वी एशिया तक ले गए. संस्कृत, अपनी समृद्धि और जटिलता के साथ, सभ्यताओं के बीच सेतु भाषा बन गई. हाथ से लिखी गई पांडुलिपियां, जिन्हें तैयार करने में एक दशक से भी अधिक समय लगता था, पहाड़ों और समुद्रों को पार करती हुई अन्य क्षेत्रों में ज्ञान की जड़ें जमाती रहीं.
फिर हुआ नालंदा पर आक्रमण
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि नालंदा पर आक्रमण हुआ और उसे आग लगा दी गई. वहां की लाइब्रेरी महीनों तक जलती रही, क्योंकि यहां रखी पांडुलिपियों की संख्या काफी ज्यादा थी. हज़ारों ग्रंथ नष्ट हुए. विद्वानों की हत्या कर दी गई या उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया गया. यह केवल एक विश्वविद्यालय को नहीं, बल्कि एक सभ्यता की बौद्धिक स्मृति को मिटाने का प्रयास था. लेकिन, जैसा कि प्रो. चतुर्वेदी बताते हैं, यह प्रयास अंततः असफल रहा. "लोग पांडुलिपियां लेकर भाग निकले. उन्हें तिब्बत, चीन और दक्षिण‑पूर्व एशिया ले जाया गया. ज्ञान जीवित रहा." आज भी दलाई लामा अपने प्रवचनों में नालंदा के आचार्यों का उल्लेख करते हैं. इनमें से कुछ ग्रंथों को विदेशों में संरक्षित किया गया और उनका अनुवाद हुआ. कुछ अन्य सदियों बाद राहुल सांकृत्यायन जैसे विद्वानों के असाधारण प्रयासों के माध्यम से भारत वापस लौटे, जिन्होंने विदेशी संग्रहालयों और मठों से पांडुलिपियां खोजकर उन्हें पुनः भारत पहुंचाया. जब तिब्बत से बौद्ध भारत लौटे, तो वे अपने साथ सैकड़ों संरक्षित पांडुलिपियां लेकर आए, जिनमें से कई का आज भी अध्ययन और अनुवाद किया जा रहा है.
खंडहरों से नए परिसर की ओर...
भौतिक विनाश के बावजूद ज्ञान की यह निरंतरता ही नए नालंदा विश्वविद्यालय का दार्शनिक मूल है. जब बातचीत खंडहरों से नए परिसर की ओर बढ़ती है, तो अंतर स्पष्ट दिखता है. राजगीर के पास समतल भूमि पर फैला आधुनिक विश्वविद्यालय साफ‑सुथरी रेखाओं, खुले आंगनों और उद्देश्यपूर्ण अकादमिक भवनों के साथ खड़ा है. फिर भी, इसके डिज़ाइन में प्राचीन नालंदा की आत्मा को संजोया गया है, खासकर पुस्तकालय की केंद्रीय भूमिका के माध्यम से. स्तूप के आकार में बना नया पुस्तकालय विश्वविद्यालय का हृदय माना जाता है. यहीं नालंदा का पुनर्जागरण मूर्त रूप लेता है. इसे भविष्य में लाखों पुस्तकों और पांडुलिपियों को समेटने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जहां संरक्षण, अनुवाद और प्रदर्शनी के लिए समर्पित स्थल होंगे.
प्रो. चतुर्वेदी समझाते हैं, "विचार यह है कि हमें याद रहे ज्ञान कैसे खोया गया था और यह भी कि उसे वास्तव में कभी नष्ट नहीं किया जा सकता." आज पांडुलिपियां दुनिया भर में फैली हुई हैं, कई लिपियों और भाषाओं में लिखी हुई. नालंदा के विद्वान अब अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों के साथ मिलकर इन ग्रंथों की पहचान कर रहे हैं, उनका अध्ययन कर रहे हैं और उनकी प्रतियां एक साथ लाने का काम कर रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल लिपियों को पढ़ने, फॉन्ट को मानकीकृत करने और अनुवाद में सहायता के लिए किया जा रहा है, जिससे प्राचीन विचार आधुनिक विद्वानों के लिए सुलभ हो सकें. संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल के नेतृत्व में 'भारत का ज्ञान भारतम मिशन' इस परंपरा को डिजिटल माध्यम से पुनर्जीवित करने के लिए समर्पित है. प्राचीन पांडुलिपियां केवल पाठ नहीं थीं, वे दृश्य कलाकृतियां भी थीं, जिनमें उमदा चित्र होते थे. नालंदा आधुनिक समय में पाठ्य अध्ययन और ललित कलाओं के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास कर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय में होता था.
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नालंदा में डेटा एनालिटिक्स और AI
आज नया नालंदा विश्वविद्यालय मुख्य रूप से पोस्टग्रेजुएट, पीएचडी और पोस्ट‑डॉक्टोरल स्तर की शिक्षा पर केंद्रित है और उसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप बेहद खास है. अधिकांश विद्यार्थी भारत के बाहर से, विशेषकर दक्षिण‑पूर्व एशिया से आते हैं, जिससे नालंदा की ऐतिहासिक भूमिका एक वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में पुनः स्थापित होती है, न कि केवल एक राष्ट्रीय संस्था के रूप में. 400 एकड़ में फैला यह नया परिसर पूरी तरह विदेश मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है. प्रो. चतुर्वेदी बताते हैं कि विश्वविद्यालय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति अध्ययन तथा डेटा एनालिटिक्स एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे उभरते क्षेत्रों में नए कार्यक्रम शुरू कर रहा है, जिनमें आगामी शैक्षणिक सत्र से प्रवेश खुले हैं.
यह अंतरराष्ट्रीयता कोई संयोग नहीं है. नालंदा के पुनरुद्धार की नींव 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की उस परिकल्पना से पड़ी थी, जिसमें उन्होंने बिहार से अपनी महान सभ्यतागत शक्ति से फिर जुड़ने और 'युवा मस्तिष्कों को प्रज्वलित करने' का आह्वान किया था. इस विचार को एशियाई देशों के सहयोग से गति मिली, जिन्होंने नालंदा को साझा विरासत के रूप में पहचाना.
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नालंदा सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं
भारत के लिए नालंदा सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि एक स्टेटमेंट है. यह विश्वगुरु बनने की उस आकांक्षा को दर्शाता है, जो प्रभुत्व से नहीं, बल्कि नैतिकता, विनम्रता और समावेशिता से परिपक्व ज्ञान के माध्यम से अभिव्यक्त होती है. प्रो. चतुर्वेदी बार‑बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्राचीन भारतीय चिंतन में ज्ञान के सही पात्र की पहचान को अत्यंत महत्व दिया गया, ताकि शिक्षा शक्ति या लाभ के बजाय मानवता की सेवा कर सके. व्यवहारिक विज्ञान, अर्थशास्त्र में नैतिकता, दर्शन और गणित की पारस्परिकता, जिन अवधारणाओं को आधुनिक अनुशासन आज फिर खोज रहे हैं, वे सब सदियों पहले नालंदा की नींव में निहित थीं. उदाहरण के लिए, शून्य की अवस्था, या शून्यता का विकास, वैश्विक स्तर पर गणित और विज्ञान को बदलने से पहले शून्यता पर दार्शनिक चिंतन से उभरा.
जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नालंदा के दीक्षांत समारोह में शामिल होने जा रही हैं, तो इस पुनर्जीवित ज्ञान केंद्र की उनकी पहली यात्रा गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखती है. यह न केवल एक संस्था की मान्यता है, बल्कि उस विचार की पुनः पुष्टि भी है कि भारत का भविष्य अपनी गहरी बौद्धिक परंपराओं से जुड़ते हुए और दुनिया के साथ खुले संवाद में निहित है.
जली हुई ईंटों के बीच खड़े होकर, जो आज भी विनाश की साक्षी हैं, और फिर बहस व जिज्ञासा से जीवंत कक्षाओं से होकर गुजरते हुए, एक सत्य अनिवार्य रूप से सामने आता है. साम्राज्य ढह सकते हैं, पुस्तकालय जल सकते हैं, लेकिन ज्ञान, एक बार रचा गया, तो कभी समाप्त नहीं होता. नालंदा की कहानी अब केवल खोए हुए अतीत की नहीं है. यह उस ज्ञान की कहानी है जो जीवित रहा और उस संकल्प की, जिसके साथ भारत एक बार फिर विश्व को कुछ देने के लिए आगे बढ़ रहा है. एक विश्वमित्र बनकर.














