- BJP ने बंगाल में 2019 के बाद अपनी चुनाव रणनीति में बदलाव कर विकास और नए बंगाल के वादे पर अधिक जोर दिया है.
- हालांकि हिंदुत्व BJP के प्रचार का मुख्य स्तंभ बना हुआ है, खासकर उत्तरी बंगाल के सीमावर्ती जिलों में.
- योगी बंगाल में BJP के हिंदुत्व की राजनीति के ब्रांड एंबेसडर के रूप में 20 से अधिक रैलियां कर रहे हैं.
चुनावी राजनीति में अक्सर 'आजमाकर देखने' के तरीके को सबसे असरदार माना जाता है. कई बार ऐसा भी होता है जब किसी पुरानी और आजमाई हुई रणनीति को दोहराने से अच्छे नतीजे मिल सकते हैं. पिछले चुनावों में, खासकर 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ पश्चिम बंगाल में BJP के लिए 'स्टार प्रचारक' बनकर उभरे थे. लेकिन, इस बार ऐसा लगता है कि BJP ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया है. पार्टी ने इस बार 'बदलाव' के मुद्दे पर ज्यादा जोर दिया है.
2019 में छाया था 'जय श्री राम' का नारा, अब 'नए बंगाल' का वादा
इसी कड़ी में बीजेपी ने पूरे राज्य में "परिवर्तन यात्राएं" निकाली हैं. 2019 के चुनाव प्रचार में "जय श्री राम" का नारा छाया हुआ था. लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी का संदेश "नए बंगाल" के वादे, एक दूसरी "नवजागरण" की लहर, और राज्य में विकास लाने वाली "डबल-इंजन सरकार" के विचार पर ज्यादा केंद्रित नजर आती है.
प्रचार की रणनीति बदली लेकिन हिंदुत्व अब भी कोर में
हालांकि इसके बाद भी चुनाव प्रचार की पृष्ठभूमि में हिंदुत्व BJP के प्रचार अभियान का एक मुख्य वैचारिक स्तंभ बना है. पार्टी नेताओं का मानना है कि बंगाली समाज के कुछ वर्गों में, विशेष रूप से उत्तरी बंगाल के ग्रामीण और सीमावर्ती जिलों में, जो बांग्लादेश से सटे हैं, हिंदू पहचान की राजनीति का आकर्षण अब भी प्रासंगिक है. यहां हिंदुत्व BJP समर्थकों के लिए प्रेरणादायक तत्व बना हुआ है.
पश्चिम बंगाल में चुनावी जनसभा को संबोधित करते यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ.
हिंदुत्व की राजनीति के ब्रांड एंबेसडर योगी की बंगाल चुनाव में एंट्री
इस संदर्भ में योगी आदित्यनाथ को एक बड़ी हस्ती माना जाता है. योगी को लगभग हिंदुत्व की राजनीति का एक 'ब्रांड एंबेसडर' माना जा रहा है. पारंपरिक रूप से उन्होंने पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में चुनाव प्रचार करना अधिक पसंद किया है, जहां वे बंगाली पहचान को हिंदू राष्ट्रवाद की एक व्यापक विचारधारा से जोड़ने की बात करते दिखे.
बंगाल चुनाव में होनी है योगी की 20 से ज्यादा रैलियां
योगी आदित्यनाथ ने 12 अप्रैल को बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का अपना प्रचार अभियान शुरू किया. उन्होंने बांकुरा के सोनामुखी, नंदकुमार और कांथी दक्षिण जैसे इलाकों में रैलियों को संबोधित किया. बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को होने वाले चुनावों से पहले योगी आदित्यनाथ की 20 से ज्यादा रैलियां निर्धारित हैं. BJP का लक्ष्य उन क्षेत्रों में अपने समर्थन आधार को मजबूत करना है, जहां हिंदू आबादी काफी ज्यादा है.
बंगाल में योगी की रैली में मौजूद लोगों की भीड़ से उनकी तस्वीर दिखाती एक बच्ची.
उम्मीद है कि उनके भाषणों में "हिंदुओं की सुरक्षा," कथित कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर तृणमूल कांग्रेस की आलोचना, और बांग्लादेश तथा पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थितियों पर जोर दिया जाएगा. इसका व्यापक उद्देश्य ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ BJP की स्थिति को मजबूत करना है.
उत्तर प्रदेश में, योगी आदित्यनाथ ने एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि बनाई है, जिसे अक्सर "बुलडोजर राजनीति" से जोड़ा जाता है. इसका तात्पर्य अवैध निर्माणों को गिराने, कथित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई करने, और प्रशासन द्वारा "असामाजिक तत्वों" तथा "माफिया गतिविधियों" के रूप में वर्णित चीज़ों पर व्यापक नकेल कसने से है. उन्होंने सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर भी अपना पक्ष रखा है, जिसमें तीन तलाक का विरोध, व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की वकालत, और "समान नागरिक संहिता" (Uniform Civil Code) के विचार का समर्थन शामिल है. इस विचार का जिक्र पश्चिम बंगाल के लिए BJP के "संकल्प पत्र" (घोषणापत्र) में भी मिलता है.
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बीजेपी बंगाल में हिंदू वोटरों को करना चाहती है एकजुट
बंगाल में, जहां पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का लगभग 30% हिस्सा रहे हैं. हाल ही में मतदाता सूची में हुए बदलावों के कारण मतदाताओं की सटीक बनावट को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी मतदाताओं को और भी ज्यादा ध्रुवीकृत कर सकती है, जिससे संभवतः हिंदू वोट BJP के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं.
बंगाल बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष ने की थी यूपी मॉडल की पैरवी
कुछ दिन पहले BJP के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने वादा किया था कि अगर BJP सत्ता में आती है, तो बंगाल में 'UP-ब्रांड' की राजनीति देखने को मिलेगी.
बीजेपी नेता दिलीप घोष ने कहा, "4 मई के बाद सब कुछ बदल जाएगा. आज आप जिस पुलिस को माफियाओं के साथ बैठकर चाय पीते और भ्रष्ट नेताओं के 'चमचे' बनकर काम करते देखते हैं, उसका चरित्र पूरी तरह बदल जाएगा. वही पुलिस, उत्तर प्रदेश के अंदाज में अपराधियों का एनकाउंटर करेगी और उन्हें सलाखों के पीछे डालेगी."
बंगाल में चलेगा यूपी मॉडल, ममता का साफ जवाब- नहीं
ममता बनर्जी का जवाब साफ है- नहीं. उनका और उनकी पार्टी का कहना है कि BJP ने पहले भी बंगाल में इस तरीके को आजमाया है, लेकिन यह कामयाब नहीं रहा. तृणमूल कांग्रेस के मुताबिक, पश्चिम बंगाल जैसे मिले-जुले और सांस्कृतिक रूप से अलग-अलग तरह के लोगों वाले राज्य में सख्त और जबरदस्ती वाला राजनीतिक तरीका थोपने की कोशिश उलटी पड़ सकती है.
हालांकि, बंगाल BJP के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि TMC योगी की बुलडोजर राजनीति के खिलाफ एक नकारात्मक प्रचार अभियान चलाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा, "बुलडोजर असल में माफिया राज और जंगल राज के खिलाफ है, दादागिरी के खिलाप है. हम 'कानून का सुशासन' लाना चाहते हैं."
योगी की रैली के बाद टीएमसी नेताओं ने बदली रणनीति
हालांकि बंगाल चुनाव प्रचार में योगी आदित्यनाथ के आने के बाद अभिषेक बनर्जी समेत कई TMC नेताओं ने चुनावी माहौल को बदल दिया. जय प्रकाश मजूमदार और कुणाल घोष जैसे नेताओं ने तर्क दिया है कि बंगाली समाज मूल रूप से अनेकतावादी और सबको साथ लेकर चलने वाला है. उनके मुताबिक, बंगाली हिंदुओं की पहचान किसी संकीर्ण या अलग करने वाली पहचान से नहीं होती, बल्कि एक मिली-जुली, सांस्कृतिक रूप से कई परतों वाली और ऐतिहासिक रूप से सबको साथ लेकर चलने वाली सोच से होती है. उनका मानना है कि ऐसे समाज पर कोई ध्रुवीकृत और सख्त वैचारिक ढांचा थोपना नुकसानदायक हो सकता है.
- अगर कोई यह समझने की कोशिश करे कि योगी आदित्यनाथ से जुड़ी यह "स्टीमरोलर" या बुलडोजर-शैली की राजनीति पश्चिम बंगाल में क्यों काम नहीं कर सकती, तो इसका जवाब बंगाल के समाज और इतिहास की तरह ही बहुत गहरा है.
- यह विविधता बौद्धिक चर्चाओं में भी झलकती है. अमर्त्य सेन ने अपने कई लेखों में इस बात पर जोर दिया है कि बंगाल की पहचान को किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक कहानी तक सीमित नहीं किया जा सकता.
बंगाली संस्कृति क्या कहती है?
बंगाली पहचान, किसी भी कठोर और एकतरफा कहानी का विरोध करती है, एक लंबे और कई परतों वाले इतिहास से बनी है. चाहे मध्यकालीन समय हो या आधुनिक, यह बहुलवादी चरित्र हमेशा बना रहा है. आज, पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुसलमान दोनों ही एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए सांस्कृतिक परिवेश को साझा करते हैं. 1940 के दशक के सांप्रदायिक तनावों की यादें आज भी मौजूद हैं, लेकिन भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष ढांचे से प्रेरित होकर साथ मिलकर रहने की एक मज़बूत प्रतिबद्धता भी मौजूद है.
ठीक इसी जटिलता की वजह से बंगाल में किसी एक जैसे, सख्त राजनीतिक मॉडल को लागू करना मुश्किल हो जाता है. राज्य का सामाजिक ताना-बाना आक्रामक, एकतरफा बातों से आसानी से प्रभावित नहीं होता. इसके बजाय, यह उन बातों पर प्रतिक्रिया देता है जिनमें इसकी विविधता, इतिहास और मिली-जुली पहचान को स्वीकार किया जाता है.
असल में, BJP की रणनीति एक पतली डोरी पर चलने जैसी लगती है, जिसमें वह अपने विकास के एजेंडे और अपनी मूल विचारधारा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. यह अभी भी साफ नहीं है कि "UP-स्टाइल" का शासन मॉडल और चुनाव प्रचार का तरीका बंगाल की अनोखी राजनीतिक संस्कृति के साथ तालमेल बिठा पाएगा या नहीं. जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज होगा, इस सवाल का जवाब शायद भाषणों में नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के बैलेट बॉक्स में सामने आएगा.
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