आज की जीवनशैली ऐसी है कि पूरा दिन एक ही कुर्सी पर बैठकर निकल जाता है और शारीरिक गतिविधि भी कम हो जाती है. ऐसे में शरीर में धीरे-धीरे कई बीमारियां पनपने लगती हैं और सबसे पहले रक्त में शुगर की मात्रा प्रभावित होती है, जिससे डायबिटीज की परेशानी कम उम्र में ही हो जाती है. डायबिटीज होने के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन खराब जीवनशैली मुख्य कारण है.
डायबिटीज को लेकर भी लोगों के बीच भ्रम की स्थिति रहती है. धारणा है कि हाई शुगर सबसे खतरनाक होता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि लो शुगर उससे ज्यादा खतरनाक होता है. विज्ञान की भाषा में लो शुगर को हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है, जिसमें मस्तिष्क को घातक क्षति पहुंचती है. यह तब होता है जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर बहुत कम हो जाता है और मस्तिष्क तक सभी तरीके से पोषण नहीं पहुंच पाता. ऐसी स्थिति अचानक बेहोशी, दौरे, और यहां तक कि आपातकालीन अवस्था तक ले जा सकती है.
रक्त में ग्लूकोज की मात्रा संतुलित रहना बहुत जरूरी है. अगर ग्लूकोज की मात्रा 70 एमजी/डीएल होती है तो ये चिंता का विषय है. इसके साथ ही अगर स्तर 40-50 के बीच है तो तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए. यह स्थिति आपातकालीन स्थिति होती है. इस स्थिति में तुरंत इलाज की जरूरत होती है. आयुर्वेद में कई ऐसे आसान और प्रभावी तरीके बताए गए हैं, जिनसे रक्त में कम होते ग्लूकोज के स्तर को संतुलित रखा जा सकता है.
इसके लिए दिनचर्या में मुलेठी का हल्का काढ़ा, खजूर या किशमिश शामिल करें और इसके साथ ही छोटे-छोटे अंतराल पर भोजन लेना शुरू करें. इससे शरीर में ग्लूकोज बनता रहेगा और हल्का मीठा ग्लूकोज और ऊर्जा में वृद्धि करेगा. आयुर्वेद के अनुसार, अत्यधिक उपवास, अनियमित भोजन और मानसिक तनाव 'वात वृद्धि' कर ऊर्जा असंतुलन पैदा कर सकते हैं, इसलिए लंबे समय तक खुद को भूखा न रखें और कुछ न कुछ खाते रहें. ग्लूकोज को संतुलित करने के लिए आहार में कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का संयोजन शामिल करें. कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का संयोजन शरीर को ऊर्जा और मस्तिष्क को मजबूती देता है.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














