क्या माता-पिता का ट्रॉमा(Trauma) बच्चों तक पहुंच सकता है? रिसर्च क्या कहती है? 

Kya mata pita ka trauma bacchon tak pahunch sakta hai: हम आमतौर पर मानते हैं कि किसी इंसान के जीवन में जो दुख, डर या तनाव होता है उसका असर उसी व्यक्ति तक सीमित रहता है. लेकिन अब कई वैज्ञानिक रिसर्च यह बता रही हैं कि कई बार ट्रॉमा या सदमा यानी गहरे भावनात्मक दर्द का असर अगली पीढ़ी तक भी पहुंच सकता है. यानी अगर माता-पिता ने अपने जीवन में बहुत बड़ा तनाव या दर्द झेला है, तो उसके कुछ असर बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्थिति में भी दिखाई दे सकते हैं.

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Kya mata pita ka trauma bacchon tak pahunch sakta hai
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Kya mata pita ka trauma bacchon tak pahunch sakta hai: हम आमतौर पर मानते हैं कि किसी इंसान के जीवन में जो दुख, डर (fear) या तनाव होता है उसका असर उसी व्यक्ति तक सीमित रहता है. लेकिन अब कई वैज्ञानिक रिसर्च (Scientific Research) यह बता रही हैं कि कई बार ट्रॉमा या सदमा यानी गहरे भावनात्मक दर्द का असर अगली पीढ़ी (Next Generation) तक भी पहुंच सकता है. यानी अगर माता-पिता ने अपने जीवन में बहुत बड़ा तनाव (Stress) या दर्द झेला है, तो उसके कुछ असर बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्थिति में भी दिखाई दे सकते हैं.

ट्रॉमा पीढ़ियों तक कैसे पहुंचता है?

जब किसी व्यक्ति को जीवन में बहुत बड़ा झटका या दर्दनाक अनुभव होता है, तो उसका असर सिर्फ उस समय तक नहीं रहता. कई बार वह डर, चिंता (Tension) या तनाव (Stress) लंबे समय तक व्यक्ति के जीवन में बना रहता है. अगर माता-पिता ऐसे अनुभवों (Experiences) से गुजरते हैं, तो उनके व्यवहार, सोच (Thinking) और भावनाओं (Feelings) का असर बच्चों पर भी पड़ सकता है. उदाहरण के लिए युद्ध, हिंसा, मजबूरी में घर छोड़ना, भेदभाव या बहुत कठिन पारिवारिक हालात. इन घटनाओं का असर इंसान के मन पर गहरा हो सकता है.

शरीर में क्या बदलाव हो सकते हैं?

वैज्ञानिकों के अनुसार जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो शरीर की तनाव से जुड़ी प्रक्रिया बदल सकती है. इससे शरीर और दिमाग दोनों प्रभावित हो सकते हैं. कुछ रिसर्च यह भी बताती हैं कि हमारे अनुभव हमारे जीन के काम करने के तरीके को बदल सकते हैं. इसे एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) कहा जाता है. इसका मतलब यह नहीं है कि जीन बदल जाते हैं, बल्कि उनके काम करने का तरीका प्रभावित हो सकता है.

रिसर्च में क्या पता चला?

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुई कई रिसर्च में यह देखा गया है कि जिन परिवारों ने बड़े संकट झेले हैं, उनके बच्चों में चिंता, डर या तनाव की समस्या थोड़ी ज्यादा देखी जाती है. हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यह विषय अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है और इस पर अभी और रिसर्च की जरूरत है.

क्या इसका असर कम किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि ट्रॉमा का असर हमेशा स्थायी नहीं होता. सही सलाह, काउंसलिंग Counselling), परिवार का सहयोग और अच्छा माहौल मिलने से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लोग मानसिक स्वास्थ्य को महत्व दें और अपने अनुभवों के बारे में खुलकर बात करें, तो आने वाली पीढ़ियों पर ट्रॉमा का असर कम किया जा सकता है. इसलिए जागरूकता और सही मदद बहुत जरूरी है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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