AIRCARE Study: गंदी हवा और फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते खतरे पर AIIMS करेगा गहराई से जांच!

​​​​​​भारत में खराब हवा बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही है, खासकर महीन कण पदार्थ यानी PM 2.5 के संपर्क का सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता है. ऐसे में इसी मुद्दे को समझने के लिए AIIMS-दिल्ली ने AIRCARE (Air Pollution and Cancer Risk) नामक एक जरूरी और कंप्रिहेंसिव स्टडी शुरू की है, जिसका मकसद यह पता लगाना है कि वायु प्रदूषण किस तरह फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को बढ़ा रहा है. बता दें इस स्टडी का इसका नेतृत्व AIIMS के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर कर रहे हैं.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
AIIMS-Delhi is set to conduct the AIRCARE study

​​​​​​भारत में खराब हवा बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही है, खासकर महीन कण पदार्थ यानी PM 2.5 के संपर्क का सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता है. ऐसे में इसी मुद्दे को समझने के लिए AIIMS-दिल्ली ने AIRCARE (Air Pollution and Cancer Risk) नामक एक जरूरी और कंप्रिहेंसिव स्टडी शुरू की है, जिसका मकसद यह पता लगाना है कि वायु प्रदूषण किस तरह फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को बढ़ा रहा है. बता दें इस स्टडी का इसका नेतृत्व AIIMS के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर कर रहे हैं.

डॉ. शंकर बताते हैं कि जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इससे जुड़े जोखिमों को वैज्ञानिक तरीके से समझना और नीति-निर्माण में शामिल करना बेहद जरूरी हो गया है. डॉ. शंकर के अनुसार भारत एक ऐसा देश है जहाँ दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर पाए जाते हैं. इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हवा में मौजूद जहरीले कण किस तरह शरीर को प्रभावित कर रहे हैं.

डॉ. शंकर के मुताबिक पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर सबसे आम कैंसरों में से एक है, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं और युवा लोगों में भी, धूम्रपान न करने के बावजूद, फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण फेफड़ों के कैंसर में योगदान देने वाले एक कारक के रूप में उभरा है, लेकिन इस मुद्दे पर भारत से और अधिक साक्ष्य की आवश्यकता है. आगे डॉक्टर ने बताया "यह बेहद चिंताजनक है कि फेफड़ों का कैंसर, जिसे कभी मुख्य रूप से तंबाकू धूम्रपान करने वाले लोगों से जुड़ा रोग माना जाता था, अब उन लोगों में भी तेजी से बढ़ रहा है जो धूम्रपान नहीं करते हैं."

AIRCARE अध्ययन दिल्ली-NCR के 1,615 फेफड़ों के कैंसर के मामलों और उनके परिवार के सदस्यों में से चुने गए 1,615 नियंत्रण (controls) मामलों का अध्ययन करेगा.

Advertisement

डॉ. शंकर ने कहा कि यह स्टडी एक बेहद मुश्किल कार्य है जिसमें क्लिनिकल और नॉन क्लिनिकल दोनों कंपोनेंट्स शामिल हैं. यह संरचना ‘केस-कंट्रोल' और ‘कोहोर्ट' दोनों तरीकों का इस्तेमाल करती है, ताकि अलग-अलग सामाजिक–आर्थिक और जनसांख्यिकीय समूहों पर PM 2.5 के लंबे समय तक संपर्क के प्रभाव को समझा जा सके.

डॉक्टर के अनुसार स्टडी का एक बड़ा हिस्सा यह समझने पर केंद्रित है कि क्या लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में आने से भारतीय आबादी में कोई विशेष आनुवंशिक बदलाव(genetic signature) बनता है.

Advertisement

डॉ. शंकर ने कहा कि सरल शब्दों में, यह स्टडी यह जानने की कोशिश करेगा कि क्या प्रदूषण से शुरू होने वाली कोई शुरुआती आनुवंशिक प्रक्रिया आगे चलकर फेफड़ों के कैंसर में बदल सकती है.

इस डेटा की मदद से, शोधकर्ता एक जोखिम-आधारित स्क्रीनिंग मॉडल विकसित करेंगे, जो भारतीय आबादी और उनके संपर्क के स्तरों के लिए विशिष्ट नैदानिक ​​और आणविक (molecular) दोनों घटकों पर आधारित होगा. उन्होंने कहा कि यह उस समूह में उन लोगों की भी पहचान करेगा, जिन्हें फेफड़ों का कैंसर होने का ज़्यादा खतरा है.

डॉ. शंकर ने कहा, "भारत में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर बना हुआ है, और दोनों लिंगों में यह चौथा सबसे आम प्रकार है, इस बीमारी से निपटने और जान के और नुकसान को कम करने के लिए नीतियों और प्रबंधन रणनीतियों को लागू करने की तत्काल आवश्यकता है."

इसे भी पढ़ें: Eid 2026: इस ईद को बनाएं और भी खास, अपनों को दें ये 4 तोहफे, सस्ते में बन जाएगी बात

Advertisement

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

Featured Video Of The Day
Iran Israel War: भारत निकालेगा महायुद्ध का समाधान? Major General G.D. Bakshi (Retd.) ने क्या बताया?