Rangbhari Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में पड़ने वाली आमलकी एकादशी पर सिर्फ भगवान विष्णु ही नहीं बल्कि देवों के देव महादेव और पूर्णावतार माने जाने वाले भगवान श्री कृष्ण की पूजा का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. इस पावन तिथि को बाबा विश्वनाथ की नगरी में रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है और इस पावन तिथि पर भोले के भक्त अपने आराध्य देवता के संग विशेष होली खेलते हैं, जबकि भगवान कृष्ण के लीला स्थल ब्रज में इसे रंगभरनी एकादशी के नाम से जाना जाता है और इसी दिन से यहां पर रंग वाली होली की शुरुआत होती है. इस तरह फाल्गुन मास की यह एकादशी हरि और हर दोनों की पूजा से जुड़ी हुई है.
रंगभरी एकादशी का शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त : प्रात: 05:09 बजे से 05:59 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक
विजय मुहूर्त : दोपहर 02:29 से 03:15 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग : प्रात:काल 10:48 से पूरी रात्रि तक
एकादशी के पारण का समय: 28 फरवरी 2026 की सुबह 06:47 से 09:06 बजे तक
ब्रज से आता है बाबा विश्वनाथ का विशेष उपहार
काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्वभूषण मिश्र के अनुसार इस पर्व का जुड़ाव 2025 से तब और बढ़ गया, जब इस पर्व के मौके पर कृष्णजन्मभूमि स्थल से बाबा विश्वनाथ को उपहार और बाबा विश्वनाथ मंदिर की तरफ से बाल कृष्ण के लिए उपहार भेजने की परंपरा प्रारंभ हुई. विश्व भूषण मिश्र के अनुसार रंग भरी एकादशी के पर्व पर ब्रज से जहां भगवान भोलेनाथ के लिए भस्म आती है तो वहीं काशी से बाल कृष्ण के लिए खिलौने, वस्त्र आदि भेजा जाता है.
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ब्रज के रसिया और भोले के भक्त साथ करेंगे शिव साधना
इस तरह रंगोत्सव के इस महापर्व पर सनातन परंपरा के दो प्रमुख केंद्रों का सांस्कृतिक संबंध स्थापित किया गया है. साल 2026 में इस सांस्कृतिक संबंध का एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है. जिसमें ब्रजमंडल से एक पूरी टीम काशी में रास को प्रस्तुत करने के लिए पहुंच रही है. ऐसे में इस बार ब्रज के रसिया और भोले के भक्त साथ में फाग गाते हुए भगवान विश्वनाथ की पूजा-अर्चना और आराधना करेंगे.
क्यों खास है काशी की रंग भरी एकादशी?
बाबा विश्वनाथ की नगरी में रंग भरी एकादशी का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी पावन तिथि पर भगवान भोलेनाथ माता पार्वती का गौना कराने के बाद काशी पहुंचे थे. जिसके बाद काशी में उनके भक्तों ने खुशियां मनाते हुए उनके साथ जब कर पुष्प, रंग, अबीर-गुलाल और भस्म से होली खेली थी. बाबा के साथ होली मनाने की परंपरा हर साल बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














