दिल्ली, मुंबई की सबको चिंता... लेकिन रांची, पटना, कानपुर, पुणे, लखनऊ- कब तक जाम में अटके रहेंगे ये शहर

सुप्रिया सुले का जाम में फंसना और लखनऊ हाईकोर्ट की सख्ती. ये दोनों घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि ट्रैफिक अब सिर्फ लोकल समस्या नहीं रही, बल्कि यह शहरी योजना, प्रशासनिक क्षमता और पॉलिसी की परीक्षा बन चुका है. जब तक शहरों की प्लानिंग डेटा और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से नहीं होगी, तब तक एक्सप्रेसवे से लेकर शहर की गलियों तक, हर जगह यही तस्वीर दोहराई जाएगी.

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नई दिल्ली:

मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर NCP नेता सुप्रिया सुले का घंटों जाम में फंसना और इलाहाबाद हाई कोर्ट का लखनऊ प्रशासन को सख्त चेतावनी देना, ये दो खबरें अलग-अलग नहीं हैं. ये उस बड़े संकट की झलक हैं, जिसमें भारत के शहर धीरे-धीरे रेंगते नजर आ रहे हैं. फर्क बस इतना है कि बड़े शहरों का दर्द दिख जाता है, लेकिन लखनऊ, पटना, रांची, कानपुर और पुणे जैसे शहरों का जाम अभी भी ‘नॉर्मल' मान लिया गया है.

एक्सप्रेसवे पर जाम: जहां सिस्टम सबसे मजबूत होना चाहिए

मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे देश के सबसे आधुनिक हाईवे में गिना जाता है, लेकिन ‘मिसिंग लिंक' प्रोजेक्ट के उद्घाटन वाले दिन ही यहां लंबा जाम लग गया. सुप्रिया सुले खुद करीब दो घंटे तक फंसी रहीं और उन्होंने इसका वीडियो भी साझा किया. यह जाम सिर्फ छुट्टियों के ट्रैफिक का नतीजा नहीं था, बल्कि यह बताता है कि नई परियोजनाओं के साथ ट्रैफिक फ्लो की समुचित योजना नहीं बनाई जा रही. अगर देश के सबसे बेहतर माने जाने वाले एक्सप्रेसवे का यह हाल है, तो बाकी शहरों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.

लखनऊ में कोर्ट की नाराजगी: सालों की समस्या, कोई स्थाई हल नहीं

लखनऊ में पॉलिटेक्निक चौराहे से किसान पथ तक रोज लगने वाले जाम पर हाईकोर्ट को सख्ती दिखानी पड़ी. कोर्ट ने साफ कहा कि वर्षों से यह समस्या लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है, बावजूद इसके प्रशासन कोई स्थाई समाधान नहीं दे पाया है. अफसरों के पेश किए गए प्लान से असंतुष्ट कोर्ट ने दो हफ्ते के भीतर ठोस और प्रभावी समाधान पेश करने का आदेश दिया है. यह टिप्पणी सिर्फ लखनऊ पर नहीं, बल्कि उन सभी शहरों पर लागू होती है जहां ट्रैफिक मैनेजमेंट आज भी अस्थायी उपायों पर टिका हुआ है.

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आंकड़े क्या कहते हैं: तेजी से बढ़ती गाड़ियां, ठहरती सड़कें

भारत में ट्रैफिक संकट को समझने के लिए आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है. मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवेज के अनुसार, देश में वाहनों की संख्या 2011 के करीब 14 करोड़ से बढ़कर 2023 में 34 करोड़ से ज्यादा हो गई है. यानी एक दशक में वाहन दोगुने से भी ज्यादा हो गए, जबकि सड़क नेटवर्क उसी अनुपात में नहीं बढ़ा.

ट्रैफिक जाम से हर साल 2 लाख करोड़ का नुकसान

वहीं TomTom Traffic Index के अनुसार भारत के कई शहर दुनिया के सबसे ज्यादा कंजेशन वाले शहरों में शामिल हैं, जहां 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 25 से 30 मिनट तक लगते हैं. यह सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान भी है. NITI आयोग और अन्य प्रमुख अध्ययनों (जैसे बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, 2018) के अनुसार, भारत में ट्रैफिक जाम के कारण सालाना लगभग 22 अरब डॉलर (रीब ₹1.8 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़) से अधिक की उत्पादकता प्रभावित होती है. यह नुकसान दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे प्रमुख महानगरों में सबसे अधिक है.

Tier-2 शहर: जहां संकट ज्यादा, चर्चा कम

दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के ट्रैफिक पर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन असली संकट Tier-2 शहरों में तेजी से गहराता जा रहा है. लखनऊ में बढ़ती आबादी और सीमित सड़क नेटवर्क जाम को स्थाई बना चुका है. पटना में संकरी सड़कों और अतिक्रमण के कारण पीक आवर में वाहन 10-15 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं. कानपुर में औद्योगिक ट्रैफिक और स्थानीय भीड़ का दबाव है, जबकि रांची में बिना समुचित प्लानिंग के शहरी विस्तार ने ट्रैफिक को अनियंत्रित बना दिया है. पुणे जैसे शहर, जो तेजी से IT हब बने, वहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी ने निजी वाहनों की संख्या विस्फोटक रूप से बढ़ा दी है.

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छोटे शहरों को सशक्त बनाने के लिए 5,000 करोड़ रुपये होंगे खर्च

ऐसा नहीं है कि छोटे शहरों का संकट सरकारों से छिपा है. बजट 2026 में सरकार ने टियर‑2 और टियर‑3 शहरों के लिए 5,000 करोड़ रुपये का विशेष कोष घोषित किया था. यह राशि इन शहरों के सुनियोजित और टिकाऊ विकास पर खर्च किए जाने का प्लान था.

  • सरकार का प्लान था कि सड़क और ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी में सुधार लाया जाएगा. 
  • बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को मजबूत किया जाएगा. 
  • शहरी सुविधाओं का विस्तार होगा.

 सरकार का मानना है कि जब छोटे शहर मजबूत होंगे, तो लोगों का महानगरों की ओर पलायन कम होगा. इससे देश में शहरीकरण का संतुलन बनेगा और आर्थिक वृद्धि अधिक स्थिर रहेगी. लेकिन इसके लिए भी प्राथमिकता ट्रैफिक मैनेजमेंट होना चाहिए. 

जाम का असर: देरी से आगे, सीधे जीवन पर खतरा

ट्रैफिक जाम को अक्सर सिर्फ असुविधा के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसका असर कहीं ज्यादा गंभीर है. जाम में फंसी एम्बुलेंस के लिए हर मिनट की देरी जानलेवा हो सकती है. कंजेशन के कारण अचानक ब्रेक और ओवरटेकिंग से हादसों का खतरा बढ़ता है. मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवेज के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल 1.5 लाख से ज्यादा लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं, जिनमें कंजेशन भी एक अहम फैक्टर है. इसके अलावा, लगातार रेंगते ट्रैफिक से प्रदूषण बढ़ता है और ईंधन की बर्बादी भी होती है.

इसके अलाला ट्रैफिक जाम वायु और ध्वनि प्रदूषण का भी एक प्रमुख कारण है, जो वाहनों के रेंगने या निष्क्रिय (idle) खड़े रहने के कारण ईंधन की बर्बादी और हानिकारक उत्सर्जन बढ़ाता है. यह समस्या विशेष रूप से बड़े शहरों में सांस रोग, तनाव और दिल की बीमारियों में बढ़ोतरी कर रही है, जो हर साल आर्थिक रूप से भी भारी नुकसान पहुंचाती है.

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  • ईंधन की बर्बादी: जाम में फंसे वाहन बंद होने के बजाय चालू रहते हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन और नाइट्रोजन ऑक्साइड में वृद्धि होती है.
  • स्वास्थ्य पर असर: जाम में खड़े रहने से लोगों को सांस लेने में समस्या, सिरदर्द और तनाव जैसी बीमारियां हो रही हैं.
  • अव्यवस्था: जनसंख्या वृद्धि, वाहनों की बढ़ती संख्या और खराब ट्रैफिक मैनेजमेंट के कारण जाम की स्थिति विकट हो रही है.
  • आर्थिक नुकसान: ट्रैफिक जाम के कारण भारत को हर साल 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की चपत लगती है.

10 किलोमीटर की यात्रा में अब करीब 36 मिनट का समय

वैश्विक स्तर पर शहरों की ट्रैफिक स्थिति का आकलन करने वाला टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स ने 2025 की रिपोर्ट में बेंगलुरु की बिगड़ती सड़क व्यवस्था की ओर इशारा किया. रिपोर्ट में बताया गया कि तेज शहरीकरण, बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या में लगातार इजाफे के कारण शहर की सड़कों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल की तुलना में बेंगलुरु का कंजेशन स्तर 1.7 प्रतिशत अंक बढ़ा है. औसतन, शहर में वाहन चालक 15 मिनट में केवल 4.2 किलोमीटर की दूरी तय कर पा रहे हैं. वहीं, 10 किलोमीटर की यात्रा में अब करीब 36 मिनट 9 सेकंड लग रहे हैं, जो रोजाना दफ्तर जाने वालों और आम यात्रियों की परेशानी को दर्शाता है.

पीक आवर्स में हालात और खराब

भीड़भाड़ के समय ट्रैफिक स्थिति और बिगड़ जाती है. पीक आवर्स में औसत वाहन गति घटकर 13.9 किमी प्रति घंटा रह जाती है. इंडेक्स के मुताबिक, 17 मई 2025 को बेंगलुरु में साल का सबसे खराब ट्रैफिक दर्ज किया गया. उस दिन कंजेशन 101 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि शाम करीब 6 बजे यह बढ़कर 183 प्रतिशत हो गया था. नतीजतन, शाम के समय वाहन 15 मिनट में महज 2.5 किलोमीटर ही चल सके.

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वैश्विक ट्रैफिक जाम की लिस्ट में रेंग रहे भारतीय शहर

वैश्विक ट्रैफिक जाम रैंकिंग में भारतीय शहरों का दबदबा किसी से छिपा नहीं है. बेंगलुरु अकेला ऐसा शहर नहीं रहा जो जाम की समस्या से जूझ रहा हो. लिस्ट में पुणे 71.1 प्रतिशत ट्रैफिक जाम स्तर के साथ दुनिया में पांचवें स्थान पर रहा था. मुंबई 63.2 प्रतिशत जाम स्तर के साथ 18वें, जबकि नई दिल्ली 60.2 प्रतिशत के साथ 23वें स्थान पर रही. इसके अलावा कोलकाता, जयपुर और चेन्नई भी सूची के ऊपरी हिस्से में शामिल रहे. ये क्रमशः 29वें, 30वें और 32वें स्थान पर रहे, जहां औसतन लगभग 59 प्रतिशत ट्रैफिक जाम दर्ज किया गया.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह स्थिति तेज शहरीकरण, बढ़ती आबादी और निजी वाहनों की संख्या में लगातार इजाफे के कारण पैदा हो रही है, जिससे भारतीय शहरों की सड़कें भारी दबाव में हैं.

जाम अब ‘लोकल इश्यू' नहीं 

सुप्रिया सुले का जाम में फंसना और लखनऊ हाईकोर्ट की सख्ती. ये दोनों घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि ट्रैफिक अब सिर्फ लोकल समस्या नहीं रही, बल्कि यह शहरी योजना, प्रशासनिक क्षमता और पॉलिसी की परीक्षा बन चुका है. जब तक शहरों की प्लानिंग डेटा और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से नहीं होगी, तब तक एक्सप्रेसवे से लेकर शहर की गलियों तक, हर जगह यही तस्वीर दोहराई जाएगी.

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