Explainer: गाजा पीस बोर्ड पर भारत की चुप्पी, चीन ने किया खारिज पर पाकिस्तान शामिल, कौन जुड़ा किसने बनाई दूरी?

गाजा पीस बोर्ड में पाकिस्तान और इसराइल साथ आए. ट्रंप के निमंत्रण के बाद भी भारत अब तक चुप है. चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया. कौन जुड़ा, किसने किया इनकार? भारत चुप क्यों है? पढ़ें पूरा एक्सप्लेनर

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  • ट्रंप का गाजा पीस बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर की पहल है, जिसमें पाकिस्तान और इसराइल शामिल हुए हैं.
  • चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए खारिज किया है.
  • भारत संतुलन नीति और यूएन आधारित समाधान में विश्वास के चलते फिलहाल चुप्पी बनाए हुए है.
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गाजा युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है. इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रस्तावित ‘गाजा पीस बोर्ड' ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. इस पहल में जहां पाकिस्तान और इसराइल जैसे एक-दूसरे के कट्टर विरोधी देशों का साथ आना चौंकाता है, वहीं फ्रांस और नॉर्वे जैसे यूरोपीय लोकतंत्रों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है. भारत ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिसने उसकी रणनीतिक चुप्पी को लेकर बहस तेज कर दी है.
अब सवाल वैश्विक मंचों पर पूछा जा रहा है कि आखिर यह गाजा पीस बोर्ड है क्या? ट्रंप इसके जरिए क्या हासिल करना चाहते हैं? कौन-कौन देश इसके साथ हैं और कौन इसका विरोध कर रहे हैं? क्या यह संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करता है? और भारत की चुप्पी के पीछे असली कारण क्या हैं?

भारत की चुप्पी की वजह क्या?

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने को लेकर भारत ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है और उसने चुप्पी साध रखा है.  भारत की नजर से देखें तो ट्रंप का गाजा पीस बोर्ड प्रस्ताव एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है. भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय, दो-राज्य समाधान और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का समर्थक रहा है. वहीं हाल के वर्षों में इसराइल के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते भी मजबूत हुए हैं. ऐसे में भारत ने अब तक खुली प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है. 

भारत हमेशा कहता आया है कि फिलिस्तीन-इसराइल विवाद का समाधान संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों और बातचीत से होना चाहिए. ट्रंप का बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर है, इसलिए भारत खुलकर समर्थन देने से बच रहा है. भारत गाजा में मानवीय सहायता भेजता रहा है, लेकिन राजनीतिक ढांचे पर चुप्पी बनाए रखना उसे कूटनीतिक लचीलापन देता है. भारत की रणनीति फिलहाल देखो और इंतजार करो की लगती है न समर्थन, न विरोध.

भारत में वाम दलों ने सरकार से आग्रह किया कि वह 'बोर्ड ऑफ पीस' में नहीं शामिल हो क्योंकि इससे फिलिस्तीन से जुड़े मकसद के साथ 'बड़ा विश्वासघात' होगा. वाम दलों ने कहा है कि भारत सरकार को ऐसे प्रस्ताव से दूर रहना चाहिए और फिलिस्तीन और ग्लोबल साउथ के (विकासशील और अल्प विकसित) देशों की रक्षा में मजबूती से खड़ा होना चाहिए. 

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चीन ने खारिज किया प्रस्ताव

चीन ने भी कहा है कि वह फिलिस्तीन मुद्दे पर 'संयुक्त राष्ट्र केंद्रित' समाधान का समर्थन करता है और किसी भी ऐसी पहल में शामिल नहीं होगा जो संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करे. चीन ने गुरुवार को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के अमेरिका प्रस्ताव को ठुकराते हुए जोर दिया कि वो संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखकर अंतरराष्ट्रीय सिस्टम के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. सोशल मीडिया एक्स पर अपने पोस्ट में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने कहा कि "चीन सच्चे बहुपक्षवाद का समर्थक है और वह संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखकर अंतरराष्ट्रीय सिस्टम की रक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है."

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क्या रूस शामिल होगा, पुतिन क्या बोले?

इसका न्योता दुनिया के दूसरे देशों की तरह ही रूस को भी मिला है. क्रेमलिन ने इसकी पुष्टि की है लेकिन फिलहाल इसमें स्वीकार करने या अस्वीकार करने को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है.बता दें कि पुतिन ने कुछ समय पहले ही फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास को अपना दोस्त कहकर संबोधित किया था और वेस्ट बैंक को हर संभव मदद पहुंचाने का वादा किया था. अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि गाजा संघर्षविराम योजना की निगरानी के लिए प्रस्तावित अमेरिका की अगुवाई वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने पर कोई भी फैसला रणनीतिक साझेदारों से परामर्श के बाद ही लिया जाएगा.

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राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक की शुरुआत में पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को निमंत्रण के लिए धन्यवाद देते हुए कहा, "पीस बोर्ड में हमारी भागीदारी के संबंध में विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वह प्राप्त दस्तावेजों का अध्ययन करे, इस मुद्दे पर हमारे रणनीतिक साझेदारों से परामर्श करे और उसके बाद ही हम भेजे गए निमंत्रण पर प्रतिक्रिया दे सकेंगे." इस दौरान पुतिन ने अमेरिकी सहयोग की अहमियत की बात भी की. उन्होंने कहा, "हमने हमेशा अंतरराष्ट्रीय स्थिरता को मजबूत करने के प्रयास का समर्थन किया है और आगे भी करेंगे. हम यूक्रेन संकट के समाधान की तलाश में अमेरिकी प्रशासन के योगदान को भी अहमियत देते हैं."

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों
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फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने खारिज किया; ब्रिटेन, जापान का रुख स्पष्ट नहीं 

ब्रिटेन और जापान सहित अन्य प्रमुख अमेरिकी सहयोगियों ने अभी तक स्पष्ट सार्वजनिक रुख नहीं अपनाया है. कनाडा ने कहा कि वह "सैद्धांतिक रूप से" सहमत हो गया है लेकिन इसके डिटेल्स पर अभी भी काम किया जा रहा है. वहीं जर्मनी ने इस पहल पर औपचारिक समर्थन नहीं दिया है. उसने कहा कि वह किसी भी समाधान को यूएन, यूरोपीय संघ और अरब लीग के ढांचे में देखना चाहता है. जर्मनी ने संकेत दिया कि वह इस बोर्ड में शामिल होने की संभावना नहीं देखता.

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फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर चुके हैं और दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच पर भी खुलकर अमेरिका का विरोध जता चुके हैं. फ्रांस ने कहा कि वो मौजूदा फॉर्मेट में बोर्ड में शामिल नहीं होगा. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने विश्व आर्थिक मंच से कहा था कि ये यूएनएससी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) का विकल्प नहीं हो सकता. उनकी इस टिप्पणी से यूरोपीय देशों की उस आशंका को बल मिलता है जिसमें ट्रंप यूएन के समानांतर एक वैश्विक संगठन को खड़ा करने की ख्वाहिश रखते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस प्रस्ताव के मुताबिक ‘बोर्ड ऑफ पीस' जल्द ही वर्चुअल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरह वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा.

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नॉर्वे के उप विदेश मंत्री एंड्रियास मोट्जफेल्ट क्राविक
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नॉर्वे के उप विदेश मंत्री एंड्रियास मोट्जफेल्ट क्राविक ने नॉर्वे की एक अखबार को दिए इंटरव्यू में स्पष्ट किया था कि उनका देश ट्रंप के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस में शामिल नहीं होगा. उन्होंने कहा था, "नॉर्वे ऐसे किसी भी पहल में हिस्सा नहीं ले सकता जो संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों और बुनियाद को कमजोर करता हो."

उधर ब्रिटेन ने भी इस बोर्ड की बनावट पर चिंता जताई क्योंकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके बेलारूसी समकक्ष अलेक्जेंडर लुकाशेंको को बोर्ड में पद की पेशकश की गई है.

स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने दावोस में पत्रकारों को जानकारी दी कि मौजूदा टेक्स्ट के साथ वे इस बोर्ड में शामिल नहीं होंगे.

इतना ही नहीं स्पेन, आयरलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी फिलिस्तीन को मान्यता देने की दिशा में कदम उठाए हैं और उनका मानना है कि ट्रंप का प्रस्ताव दो-राज्य समाधान की बुनियाद को कमजोर करता है. इसलिए उन्होंने भी इससे दूरी बनाए रखी है.

पाकिस्तान का शामिल होना क्यों आश्चर्यजनक?

पाकिस्तान का इस बोर्ड में शामिल होना चौंकाने वाला माना जा रहा है क्योंकि वो इसराइल को औपचारिक मान्यता नहीं देता. पाकिस्तान खुद को फिलिस्तीन मुद्दे पर मुस्लिम दुनिया का मुखर समर्थक बताता रहा है. हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इसराइल के साथ किसी प्रत्यक्ष संपर्क या द्विपक्षीय संवाद की बात से इनकार किया है, लेकिन बोर्ड में उसकी भागीदारी को मानवीय पहल बताया है, न कि राजनीतिक समझौता.
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान को भी ट्रंप ने न्योता भेजा और उसने यह कहते हुए इस पर अपनी सहमति जताई कि "पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस ढांचे के बनने से स्थायी संघर्ष विराम, फिलिस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता को और बढ़ाने और गाजा के पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे.

पाकिस्तान ने यह भी उम्मीद जताई कि ये प्रयास एक विश्वसनीय, समयबद्ध राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से फिलिस्तीन के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को साकार करने में मदद करेंगे, जो अंतरराष्ट्रीय वैधता और संबंधित संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के अनुरूप होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान ने 1 बिलियन डॉलर की स्थायी सदस्यता की शर्त पर हामी भरी है. वहीं हंगरी, इजरायल और यूएई समेत कुछ देशों ने बिना किसी शर्त के बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार किया है. पाकिस्तान के इस फैसले को वहां के विपक्षी और धार्मिक दल फिलिस्तीन मुद्दे पर सिद्धांतों से समझौता बता रहे हैं.

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अब तक किन देशों ने ट्रंप का न्योता स्वीकार किया है?

समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को बताया कि लगभग 50 देशों के नेताओं को निमंत्रण भेजा गया है जिनमें से अब तक करीब 35 नेताओं ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने पर अपनी सहमति दे दी है. इनमें इजराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, जॉर्डन, कतर और मिस्र जैसे मध्य पूर्व के सहयोगी देश शामिल हैं. ट्रंप के अच्छे मित्र माने जाने वाले नेटो सदस्य तुर्की और हंगरी ने भी इसमें शामिल होने पर अपनी रजामंदी दी है. मोरक्को, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, बेलारूस, वियतनाम, पैराग्वे, अर्मेनिया, अजरबायजान जैसे देशों ने भी इसमें शामिल होने पर सहमति जताई है.

गाजा
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गाजा युद्ध की पृष्ठभूमि- जहां से सब शुरू हुआ

2023–24 के बाद गाजा पट्टी दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बन चुकी है. हजारों नागरिकों की मौत, लाखों लोगों का विस्थापन, अस्पतालों, स्कूलों और बुनियादी ढांचे का तबाह होना-इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गहरे नैतिक और राजनीतिक संकट में डाल दिया. संयुक्त राष्ट्र बार-बार युद्धविराम, मानवीय सहायता और दो-राज्य समाधान की बात करता रहा, लेकिन सुरक्षा परिषद में अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों के वीटो के चलते ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी. इसी असहज माहौल में ट्रंप खेमे से यह संदेश आया कि संयुक्त राष्ट्र संघ पर आधारित ढांचे से बाहर जाकर एक नया शांति तंत्र बनाया जाना चाहिए और यहीं से गाजा पीस बोर्ड का विचार सामने आया.

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क्या है गाजा बोर्ड ऑफ पीस?

जिस गाजा बोर्ड ऑफ पीस की चर्चा है उसका प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहली बार पिछले साल सितंबर में दिया था. तब उन्होंने गाजा में युद्ध खत्म करने की अपने योजना का एलान किया था. हालांकि कुछ समय बाद ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि यह बोर्ड गाजा के बाद दुनिया भर के अन्य संघर्षों को सुलझाने की दिशा में कदम रखेगा. इस बोर्ड के प्रमुख अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे और सदस्य देशों का कार्यकाल तीन साल का होगा. हां उन देशों को स्थायी सदस्यता दी जाएगी जो इस बोर्ड की गतिविधियों के लिए 1 बिलियन डॉलर का भुगतान करते हैं. अमेरिका ने अपने विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रम्प के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर को कार्यकारी बोर्ड के सदस्यों के रूप में नामित किया है. इसमें शामिल होने के लिए दुनियाभर के करीब 50 देशों को आमंत्रित किया गया है.

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क्या ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता है?

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पिछले साल नवंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बोर्ड ऑफ पीस को केवल 2027 तक मंजूरी दी और निर्देश दिया कि यह पूरी तरह गाजा पर फोकस करेगा. रूस और चीन ने तब वोट नहीं दिया था. तब उनकी शिकायत थी कि अमेरिका के तैयार किए इस प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र को गाजा के भविष्य में कोई स्पष्ट भूमिका नहीं दी गई है.

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