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This Article is From Aug 01, 2025

पहन सकती थीं वकील का काला कोट, पर थामी चॉक... जीरो से कोचिंग की क्वीन बनने वाली नीतू मैम की कहानी...

Success story : आपको बता दें कि लॉकडाउन के समय जब सारे स्कूल कालेज, ट्यूशन क्लासेज बंद कर दिए गए तब उन्होंने केडी कैंपस लाइव शुरू किया. आज उनके चैनल पर मीलियन फॉलोअर्स हैं.

पहन सकती थीं वकील का काला कोट, पर थामी चॉक... जीरो से कोचिंग की क्वीन बनने वाली नीतू मैम की कहानी...
 उन्होंने 1992 में अपने गिरिडीह में नर्सरी से दसवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए 'पैरामाउंट कोचिंग सेंटर' शुरू किया.

Success Story Neetu Singh : केडी कैंपस शुरू करने वाली नीतू सिंह जिसे आज लोग नीतू मैम के नाम से जानते हैं; इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कड़े संघर्ष किए. आज मुखर्जी नगर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आने वाले हर छात्र की केडी कैंपस पहली पसंद बन चुका है. इनकी अंग्रेजी क्लास बहुत इंट्रेस्टिंग होती है. जिससे छात्रों को अंग्रेजी व्याकरण जुड़े सारे सवालों के जवाब आसानी से मिल जाते हैं. इसलिए इनके ऑनलाइन और ऑफलाइन क्लासेस में हजारों की संख्या में छात्र शामिल होते हैं. उनके पढ़ाने का अंदाज हर किसी का दिल जीत लेता है. आपको बता दें कि लॉकडाउन के समय जब सारे स्कूल कालेज, ट्यूशन क्लासेज बंद कर दिए गए, तब उन्होंने केडी कैंपस लाइव शुरू किया. आज उनके चैनल पर मीलियन फॉलोअर्स हैं. इस लेख में हम नीतू मैम के नाम से मशहूर नीतू सिंह के जीवन के बारे में जानेंगे...

3 साल की थीं तब पिता का देहांत

बात शुरू करते हैं बचपन से. नीतू सिंह 6 बहनें और 1 भाई हैं, जिसमें नीतू मैम छठे नंबर पर हैं. नीतू सिंह 3 साल की थीं तब उनके पिता कृष्ण देव का देहांत हो गया. तब उनके 18 साल के भाई ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी मां के साथ मिलकर संभाली. भाई ने अपनी बहनों की कार्मेल स्कूल नामक कांन्वेंट स्कूल में पढ़ाई कराई.

1992 में 'पैरामाउंट कोचिंग सेंटर' किया शुरू

आपको बता दें कि नीतू सिंह ने झारखंड (तत्कालीन बिहार) के गिरिडीह के कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल से दसवीं और वाराणसी के सेंट जॉन्स स्कूल से बारहवीं की पढ़ाई की है. 12 वीं के बाद वो गिरिडीह लौट आईं और अपनी पॉकेट मनी के लिए खुद कमाने का फैसला लिया. उन्होंने अपने गृहनगर में ही 1992 में नर्सरी से दसवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए 'पैरामाउंट कोचिंग सेंटर' शुरू किया.

दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की 

इस दौरान उन्होंने गिरिडीह स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय से ग्रैजुएश की पढ़ाई पूरी की और दिल्ली आ गईं. यहां से उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की डिग्री हासिल की.

पैसों की दिक्कतों के कारण उन्होंने दिल्ली की अलग-अलग अदालतों में प्राइवेट प्रैक्टिस के साथ-साथ ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू कर दिया. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.

अगस्त 2005 में, उन्होंने 'पैरामाउंट कोचिंग सेंटर' की स्थापना की. हालांकि इसे शुरू करने के लिए उनके पास कोई जमा पूंजी नहीं थी. लेकिन उनके ईमानदार प्रयासों और उत्साह के कारण धीरे-धीरे इंस्टीट्यूट लोकप्रिय होता गया.  शुरूआती दिनों में तो उनकी क्लास में 4 ही बच्चे थे. लेकिन धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया बच्चों की संख्या 4 से हजार में बदल गई.  देखते ही दखते उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंग्लिश फॉर जनरल कॉम्पिटिशन - फ्रॉम प्लिंथ टू पैरामाउंट' का विमोचन किया, जिसे अमेजन पर 'प्रतियोगी परीक्षाएं' श्रेणी में 'बेस्टसेलर' के रूप मे दर्जा किया गया. लेकिन कुछ कारणों से 2014 में नीतू सिंह को  'पैरामाउंट कोचिंग सेंटर' छोड़ना पड़ा. इसके बाद उन्होंने 2015 में केडी कैंपस शुरू किया, जो 3 से 4 साल के अंदर छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गया.

लाखों छात्रों की हैं आदर्श

आज वह शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रसिद्ध नाम बन चुकी हैं और प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवा अभ्यर्थी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. नीतू सिंह कोचिंग सेंटर चलाने के साथ समाज सेवा का भी काम करती हैं. वह वृद्धाश्रम, बाल गृह, बेघर बच्चों, और जिन्हें मेडिकल हेल्प की जरूरत होती है उनकी मदद करने का पूरा प्रयास करती हैं.

चैरिटी फर्स्ट है मिशन

यही नहीं नीतू सिंह ने अपने 'पैराडाइज चिल्ड्रन होम' में लगभग 15 लड़कियों को आश्रय दिया, साथ ही उनके खाने पीने का इंतजाम किया और पब्लिक स्कूल में एडमिशन कराया. केडी कैंपस प्राइवेट लिमिटेड उनके लिए किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है; उनके लिए केडी कैंपस एक पूजा है क्योंकि इस संस्थान का नाम उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय कृष्ण देव सिंह के नाम पर रखा है.

चैरिटी फर्स्ट के अपने मिशन के तहत नीतू मैम केडी कैंपस से होने वाली कमाई का एक निश्चित प्रतिशत गरीबों और वंचितों के उत्थान के लिए दान करती हैं.  अपनी सफलता को लेकर नीतू मैम कहना है कि अंत में जीतता वही है, जो कड़ी मेहनत करता है. 

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