Sikar coaching hub : जयपुर से 150 किलोमीटर दूर खाटू श्याम की नगरी से होते हुए उत्तर की तरफ हाईवे पर अगर सफर करेंगे तो 50 किलोमीटर दूर दिखने लगेंगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, जिसपर विक्ट्री का साइन करते हुए मुस्कुराते हुए बच्चे सीकर शहर के उन कोचिंग संस्थानों का विज्ञापन हैं, जहां से उन्होंने पढ़ के या तो नीट या JEE में रैंक हासिल की है. बता दें कि हाल ही में सीकर सुर्ख़ियों में रहा है, क्योंकि यहीं से नीट पेपर 2026 के लीक होने की खबर सामने आयी थी. पुलिस सूत्रों के अनुसार पहले सीकर में पेपर लीक की सुगबुगाहट सुनने को मिली और फिर यहां से तार जयपुर, हरयाणा और महाराष्ट्र तक पहुंचे.
सीकर के एक केमिस्ट्री टीचर ने ही पेपर लीक को लेकर NTA को सूचित किया और फिर परीक्षा को रद्द करना पड़ा. अगर सीकर ने पेपर लीक को उजागर किया है तो सीकर ने आपने आप को कोचिंग के नक्शे पर भी एक स्थान दिलवाया दिया है.

जी हां, होर्डिंग्स पर मुस्कुराते हुए, विक्ट्री का साइन बनाए, उन बच्चों की तस्वीरें हैं, जिन्होंने नीट में अच्छी रैंक के साथ सलेक्शन पाया. ये होर्डिंग्स मिडिल क्लास मां बाप के सपनों को उम्मीद देते हैं. उम्मीद अपने बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनाने की. सीकर पहुंचते हुए ये होर्डिंग और भी ज्यादा भव्य और विशाल हो जाते हैं. यूं तो राजस्थान की शिक्षा नगरी और कोचिंग हब कोटा को माना जाता है. लेकिन अब सीकर भी धीरे-धीरे इस रेस में आगे बढ़ रहा है.
कोटा की तरह सीकर उतना बड़ा शहर नहीं है. इतने हाईफाई हॉस्टल नहीं हैं. न ही सीकर में कोई मॉल है. केवल एक ही सिनेमाघर है. यूं कहिए कि सीकर बस एक बड़ा गांव ही है, जो नीट जेईई की कोचिंग का हब बनता जा रहा है. यही कारण है कि सीकर मीडिल क्लास लोगों के लिए कोचिंग का आसान साधन है. वे मिडिल क्लास लोग जो बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनाने की चाह रखते हैं, सीकर उनकी पहुंच में थोड़ा आसान है.

सीकर में रहकर तैयारी करने वाले 17 साल के पवित्र चौधरी ने थोड़ी मायूसी लेकिन उम्मीद भरी आंखों से अपना लक्ष्य बताया. उन्होंने एनडीटीवी से बातचीत में बताया "मेरे पापा का सपना था कि मैं डॉक्टर बनूं. 2016 में जब छठी क्लास में था तो अखबार में शोएब आफताब की आल इंडिया रैंक वन के साथ फोटो आई थी. तभी मैंने सोच लिया था, AIR 1 ही लाऊंगा. कोविड के वक्त मम्मी की हार्ट अटैक से डेथ हो गई. इसलिए मेरा मन है कार्डियोलॉजिस्ट बनूं. अब पापा भी नहीं रहे. उनका सपना पूरा करना ही मेरा उद्देश्य है. इस बार 12 वीं के साथ मेरा पहला ही अटेम्प्ट था, इसमें 690 अंक आ रहे थे. पेपर रद्द हो गया है पर मैं खुश हूं दोबारा मौका मिला है. 710 से ज्यादा ही अंक लाऊंगा."
पवित्र चौधरी, श्रीमाधोपुर के जानकीपुरा गांव का रहने वाला हैं. बचपन में पापा ने डॉक्टर बनाने का सपना देखा था. पिछली साल परीक्षा से महज 6 महीने पहले 17 दिसंबर को सड़क दुर्घटना में पिता का निधन हो गया. पवित्र ने बताया कि इसके बाद मैं काफी डिस्टर्ब भी हो गया था. लेकिन फिर खुद को समझाया. अब ज्यादा नहीं सोचता, क्योंकि जितना सोचता हूं उतना बुरा लगता है. बस यही मन में है कि पापा का सपना पूरा करना है. मेरा एक ही लक्ष्य है, बस ऑल इंडिया रैंक 1 लाना.
पवित्र अपने छोटे भाई के साथ अब मामा के पास चौमूं जयपुर में रहता है. पढ़ाई का खर्च मामा उठाते हैं. कोचिंग वालों ने भी मदद करते हुए फीस और हॉस्टल मुफ्त कर दिया है.
पवित्र की तरह ही अख्तर अंसारी भी सीकर में तैयारी करने आया है. वह उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले की पिपरवार सिवान पंचायत के मुगल टोली गांव का रहने वाला है. पिता हिसाबुद्दीन अंसारी छोटे किसान है. साथ में बांस के ठेकेदार के यहां मजदूरी करते हैं. हिसाबुद्दीन ने सपना देखा कि उनके गांव से पहले डॉक्टर कोई होगा तो उनके घर से ही होगा. बेटे को पढ़ने कानपुर भेज दिया. वहां से कोटा भेजा. पिछली साल ही वह सीकर आया है.
ये मेरा सातवां अटेम्प्ट था...लेकिन अब्बू ने समझाया"ये मेरा सातवां अटेम्प्ट था. आंसर की से मिलान करने पर 652 नंबर बन रहे थे. मुझे लगा था कि इस बार सलेक्शन हो जाएगा. ये बात अब्बू को फोन करके बताई तो बहुत खुश हुए. गांव में चाय की दुकान पर जाकर सब लोगों में हल्ला कर दिए कि हमारा बेटा डॉक्टर बन गया. इसी साल जनवरी में मेरी पढ़ाई जारी रखने के लिए जमीन बेची थी. अम्मी के गहने भी गिरवी रखे थे. जैसे ही पेपर रद्द की खबर आई बहुत बुरा लगा. लेकिन अब्बू ने समझाया मेहनत करो, निराश मत हो जैसे भी हो तुमको डॉक्टर बनाकर रहेंगे." अख्तर अंसारी मुस्कुराते हुए नम आंखों के साथ पिछले एक हफ्ते में जो भी हुआ उसका जिक्र करता है. अब अख्तर 21 जून को होने वाली तैयारी में जुट गया है.
महौल है बिल्कुल अलग नहीं भटकता ध्यानएजुकेशन एक्सपर्ट और गुरुकृपा इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रदीप बुडानिया ने बताया कि सीकर और कोटा में काफी अंतर है. सबसे बड़ा तो यही कि यहां पढ़ाई का खर्च, कोटा से लगभग आधा है. कोटा से आने वाली कोचिंगों को भी यहां फीस कम करनी पड़ती है. स्कॉलरशिप ज्यादा देनी पड़ती है.
इसके अलावा यहां का माहौल एकदम अलग है. यहां बच्चा यूनिडायरेक्शन यानी एक ही दिशा में सोचता है. ध्यान भटकाने वाली चीजें ज्यादा नहीं है. इसके साथ ही हॉस्टल पीजी संचालक गांव के लोग है, वे बच्चों का ध्यान रखते हैं. सीकर में शायद अब भी एक छोटे शहर का अपनापन है.

उन्होंने कहा कि सीकर में ज्यादातर छोटी जगहों से बच्चे आते हैं. हमारे पास ज्यादातर शेखावाटी क्षेत्र के जिलों और हरियाणा के आस पास से ही विद्यार्थी आते हैं. इस छोटी जगहों के बच्चों पर वन टू वन ध्यान देना पड़ता है. इसलिए कोटा और सीकर के रिजल्ट में ये फर्क है कि वहां भले ही टॉप रैंक आते हो. यहां ज्यादा बच्चों का सलेक्शन होता है और अब तो टॉप रैंकर भी आने लगे हैं.
कोटा एक तरह से बहुत कमर्शियल हो गया है, वहां बच्चे हॉस्टल में रहते हैं, पढ़ाई करते है और एग्जाम देते हैं, लेकिन शहर वासियों से घुल मिल नहीं गए हैं. कोटा में बच्चे एक कमाई का जरिया हैं, और वहां पर बढ़ती स्टूडेंट सुसाइड के केसेस के बाद काफी पेरेंट्स सीकर के छोटे शहर और माहौल को पसंद करते हैं.

प्रदीप बुडानिया बताते हैं कि आंकड़ों की बात करें तो जब एक ओर कोटा में तैयारी करने वाले बच्चों की संख्या घट रही है, वहीं 2021 से 2025 तक सीकर में करीब 3 गुना बच्चे बढ़े हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में पेपरलीक की घटना के बाद एनटीए को परीक्षा केंद्र के आधार पर रिजल्ट जारी करने के आदेश दिए. इसके बाद सीकर सुर्खियों में आया. इस साल भी एक बार फिर पेपरलीक की घटना के बाद सीकर का नाम चर्चा में आया. इस पेपरलीक का खुलासा करने वाले व्हिसलब्लोअर शशिकांत सुथार यहीं पढ़ाते हैं. हालांकि, इन खबरों से सुर्खियों में आया सीकर समानांतर रूप से आम आदमी तक कोचिंग की पहुंच को आसान भी बना रहा है.
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