US Education System Vs Indian Education: भारत के एजुकेशन सिस्टम को लेकर अक्सर कई तरह के सवाल उठते हैं, खासतौर पर सरकारी स्कूलों को लेकर लोगों का रुख कुछ ठीक नहीं रहता है. यही वजह है कि लोग कई बार भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तुलना विदेशों के एजुकेशन सिस्टम से करने लगते हैं. सबसे ज्यादा चर्चा अमेरिका के स्कूल और कॉलेजों की होती है. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि किन मायनों में अमेरिका के स्कूल भारत से अलग होते हैं और यहां क्या कुछ अलग होता है, जो भारत के स्कूलों में भी होना चाहिए.
पढ़ाई के तरीके में बड़ा अंतर
भारत में न्यू एजुकेशन पॉलिसी (NEP) के तहत कई तरह के बदलाव किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद अब तक यहां याद रखने यानी मेमोराइजेशन पर जोर दिया जाता है. NEP से रट्टा मारने की इस आदत को बदलने की कोशिश हो रही है. वहीं अमेरिका की बात करें तो यहां इनक्वायरी-बेस्ड एजुकेशन पर जोर दिया जाता है, जिसमें ग्रुप एक्टिविटी से लेकर गंभीर विषयों पर सोचने की आदत छात्रों में डाली जाती है.
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हाईस्कूल के बाद विकल्प
अमेरिका में हाईस्कूल पास करने के बाद छात्रों के सामने कई तरह के विकल्प होते हैं. यहां इसके बाद की पढ़ाई को कॉलेज कहा जाता है और यहां छात्र अपनी मर्जी से किसी भी विषय को चुन सकते हैं. वहीं भारत में छात्रों को 10वीं पास करने के बाद तीन ही विकल्प मिलते हैं. जिनमें पहला साइंस, दूसरा आर्ट्स और तीसरा कॉमर्स होता है.
- बच्चों को अमेरिकी स्कूलों में तीसरी ग्रेड के बाद स्कूल की तरफ से एक मिनी लैपटॉप भी दिया जाता है.
- यूएस में एकेडमिक ईयर अगस्त से शुरू होता है और जून में खत्म होता है.
- अमेरिका में साइंस एंड टेक्नोलॉजी के लिए अलग से स्कूल होते हैं.
- अमेरिका में भी भारत की ही तरह प्री-स्कूल से लेकर मिडिल स्कूल और हाई स्कूल का सिस्टम होता है.
- स्कूलों में बच्चों को मुफ्त बस सर्विस और स्टेशनरी भी दी जाती है.
टेक्नोलॉजी का भी असर
भारत के स्कूलों में लगातार स्मार्ट क्लासेस और एआई का इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है, लेकिन ये सब कुछ ही बड़े शहरों तक सीमित है. वहीं अमेरिका में टेक्नोलॉजी काफी ज्यादा आगे है, जिसका इस्तेमाल स्कूलों में भी खूब होता है. अमेरिकी स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड से लेकर ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म और बाकी चीजें टेक्नोलॉजी से लैस होती हैं. यहां डिजिटल एजुकेशन को प्राथमिकता दी जाती है और छात्र लैपटॉप-टैबलेट का इस्तेमाल करते हैं.
क्लास में होते हैं कम बच्चे
भारत में जहां एक ही क्लास में 50 से 60 बच्चे होते हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए हर पीरियड में एक टीचर आता है. वहीं अमेरिका में ऐसा नहीं है, वहां क्लारूम का साइज छोटा होता है और एक टीचर 15 से 20 बच्चों के समूह तो पढ़ाता है. इससे बच्चों पर ध्यान देना आसान होता है और हर किसी छात्र की प्रोग्रेस रिपोर्ट टीचर के पास होती है. इसके अलावा अमेरिका के कई स्कूलों में कोई एक ड्रेस कोड भी नहीं बनाया गया है, छात्र अपनी मर्जी के कपड़े पहनकर स्कूल आ सकते हैं.
परीक्षा का दबाव होता है कम
भारत में जहां साल में होने वाली मुख्य परीक्षा को लेकर छात्रों पर काफी दबाव होता है, वहीं अमेरिका में ऐसा बिल्कुल नहीं है. यहां रोजाना ही छात्रों का मूल्यांकन होता है, यानी वो प्रोजेक्ट्स, क्विज और बाकी चीजों की परीक्षाएं रोजाना होती हैं. ऐसे में किसी एक मुख्य परीक्षा का बोझ छात्रों पर नहीं होता है. पढ़ाई के साथ-साथ ही छात्रों की स्किल और कमजोरियों को पकड़ लिया जाता है.
फीस में भारी अंतर
अमेरिका और भारत के एजुकेशन सिस्टम में भले ही कई तरह के अंतर हों, लेकिन अमेरिका में भारतीय स्कूलों की तुलना में फीस काफी ज्यादा है. भारत में सरकारी स्कूलों की फीस काफी कम है, वहीं अमेरिका में 10वीं के बाद की पढ़ाई काफी ज्यादा महंगी होती है. इसके लिए कई छात्रों को लोन भी लेना पड़ता है, वहीं बाकी छात्र स्कॉलरशिप से अपना काम चलाते हैं. हालांकि शुरुआती शिक्षा ज्यादातर सरकारी स्कूलों में मुफ्त में दी जाती है.
स्कूलों में सुरक्षा का हाल
अमेरिका में होने वाली गोलीबारी की घटनाओं और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए यहां के स्कूलों में सिक्योरिटी काफी टाइट होती है. हर जगह इलेक्ट्रॉनिक गेट लगे होते हैं, जिनका एक्सेस सिर्फ स्कूल के स्टाफ और छात्रों को होता है. किसी बाहरी शख्स को फोटो आईडी और जांच पड़ताल के बाद ही अंदर जाने की इजाजत दी जाती है.
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