- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के नितीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव को होली पर सात मार्च तक फरलो दी है
- विकास यादव ने 25 साल की सजा में से अधिकतर समय काट लिया है और परिवार के साथ होली मनाना चाहता था
- अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना याचिकाकर्ता को अस्थायी रिहाई की अनुमति दी है
दिल्ली के नितीश कटारा हत्याकांड में सजा काट रहे बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटे विकास यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. अदालत ने विकास को 7 मार्च तक फरलो दी है. यानी कि विकास यादव होली अपने परिवार के साथ मना सकेगा. यह आदेश जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पारित किया. अदालत ने कहा कि विकास यादव 25 साल बिना रिमिशन की सजा में से 23 साल से ज्यादा की सजा काट चुका है. बता दें कि विकास यादव की तरफ से होली के दौरान परिवार के साथ समय बिताने के लिए फरलो मांगी गई थी. बेंच ने कहा कि मामले के गुण-दोष में गए बिना, हम याचिकाकर्ता को 7 मार्च तक रिहा करने की अनुमति देते हैं.
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फरलो के विरोध पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से फरलो का विरोध किए जाने पर असहमति जताई. जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि क्या आप उसे फांसी देना चाहते हैं. 23 साल बाद भी आप जाने नहीं देना चाहते. हमें जीवन में चीजों को छोड़ना सीखना होगा. जो उसने किया, वह हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि ऐसे अवसर कैदियों के सुधार में सहायक हो सकते हैं. उन्होंने अपने मद्रास हाईकोर्ट में कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि बम विस्फोट मामले में उम्रकैद की सजा पाए कैदियों को फरलो देने के बाद उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखा गया था.
2002 में दोषी ठहराया गया था विकास यादव
बता दें कि विकास यादव और उसके चचेरे भाई विशाल यादव को साल 2002 में 25 साल के व्यवसायी नितीश कटारा के अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. यह मामला कथित ‘ऑनर किलिंग' के रूप में चर्चित रहा, क्योंकि कटारा का संबंध विकास यादव की बहन से था. कटारा का जला हुआ शव उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के पास मिला था.
कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
इस घटना के बाद दोनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, साथ ही 25 साल बिना रिमिशन जेल में बिताने का निर्देश दिया गया था. इससे पहले 11 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने विकास यादव की तीन सप्ताह की फरलो याचिका खारिज कर दी थी.
जानें हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की थी फरलो की याचिका?
हाईकोर्ट ने कहा था कि जेल महानिदेशक द्वारा फरलो से इनकार करने में कोई मनमानी या संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है. अपराध की गंभीरता, वार्षिक आचरण रिपोर्ट की अनुपस्थिति और पीड़ित परिवार की आपत्तियों को भी ध्यान में रखा गया था. हाईकोर्ट के इस फैसले को विकास यादव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर शीर्ष अदालत ने यह राहत दी है.












