मुंबई लोकल से गिरकर हुई थी लड़के की मौत, 17 साल बाद रेलवे से मिलेगा 8 लाख का मुआवजा, बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

मुंबई लोकल ट्रेन से गिरकर 16 वर्षीय किशोर की मौत के 17 साल बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने इसे आकस्मिक गिरने का मामला मानते हुए मृतक के माता‑पिता को अधिकतम 8 लाख रुपये तक मुआवजा देने का आदेश दिया और रेलवे के ट्रैक पार करने के दावे को खारिज कर दिया.

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  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने लोकल ट्रेन से गिरकर हुई किशोर की मौत पर उसके माता-पिता को 8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
  • अदालत ने घटना को "चलती ट्रेन से आकस्मिक गिरने" का मामला माना और रेलवे के ट्रैक पार करने के दावे को खारिज किया
  • हाईकोर्ट ने मृतक के माता-पिता को रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में नया मुआवजा दावा दायर करने का निर्देश दिया
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मुंबई में 16 वर्षीय किशोर की लोकल ट्रेन से गिरकर हुई मौत के करीब 17 साल बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसके माता-पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अधिकतम 8 लाख रुपये तक मुआवजा देने का आदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह घटना “चलती ट्रेन से आकस्मिक गिरने” (Accidental Fall from Moving Train) का मामला है, न कि रेलवे ट्रैक पार करते समय हुई दुर्घटना, जैसा कि इस मामले में वेस्टर्न रेलवे की तरफ से दावा किया गया था.

अदालत का आदेश और मुआवजा

न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने मृतक के माता-पिता को रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के समक्ष नया दावा दायर करने का निर्देश दिया. साथ ही पश्चिम रेलवे को 2009 में हुई घटना की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज सहित 4 लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया गया. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कुल मुआवजा 8 लाख रुपये तक सीमित रहेगा और इसका भुगतान 12 सप्ताह के भीतर किया जाए.

घटना का विवरण

मृतक की पहचान आरोग्यराज चेटियार के रूप में हुई, जो छोटे-मोटे काम करता था. 20 जून 2009 को वह अपने एक दोस्त के साथ नौकरी की तलाश में गोरेगांव रेलवे स्टेशन से चर्चगेट रेलवे स्टेशन की ओर एक भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन में यात्रा कर रहा था. दोपहर करीब 2:13 बजे जोगेश्वरी रेलवे स्टेशन के पास वह चलती ट्रेन से गिर गया. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसी रात उसकी मौत हो गई.

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पहले खारिज हुआ था दावा

मृतक के माता-पिता, रायप्पा और विक्टोरिया चेटियार, ने मुआवजे के लिए दावा Railway Claims Tribunal में दाखिल किया था, जिसे वर्ष 2016 में खारिज कर दिया गया। रेलवे ने तर्क दिया था कि किशोर ट्रैक पार करते समय हादसे का शिकार हुआ. इसके बाद परिवार ने 2017 में हाईकोर्ट का रुख किया और ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी.

साक्ष्य और गवाहों पर कोर्ट की टिप्पणी

परिवार की ओर से पेश याचिका में बताया गया कि आरोग्यराज के पास गोरेगांव से चर्चगेट तक का वैध ट्रेन टिकट मिला था, जिससे वह एक “बोना फाइड यात्री” साबित होता है. साथ ही उसके मित्र ने गवाही दी कि अत्यधिक भीड़ के कारण वह जोगेश्वरी के पास फास्ट लोकल से गिर गया. हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य पर ध्यान नहीं देकर “गंभीर त्रुटि” की। अदालत ने कहा, “2009 की घटना पर 2026 में भी निर्णय लंबित है और ट्रिब्यूनल ने अहम साक्ष्यों पर विचार नहीं किया। इसलिए देरी से बचने के लिए यह अदालत स्वयं इन साक्ष्यों की जांच कर रही है.”

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रेलवे के तर्क खारिज

अदालत ने रेलवे के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि घटनास्थल के पास झुग्गियां होने के कारण मृतक ट्रैक पार कर रहा होगा. कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. ट्रिब्यूनल द्वारा चोटों को लेकर की गई टिप्पणी पर भी कोर्ट ने असहमति जताई और कहा कि वह कोई चिकित्सकीय विशेषज्ञ नहीं है जो चोटों के आधार पर निष्कर्ष निकाले.

तकनीकी दलीलों पर भी सवाल

रेलवे द्वारा पेश किए गए जोगेश्वरी स्टेशन के नक्शे को भी अदालत ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि यह नक्शा वर्तमान संरचना पर आधारित है, जबकि 2009 के बाद स्टेशन में कई बदलाव हो चुके हैं. इसके अलावा, रेलवे के इस दावे पर भी सवाल उठाया गया कि शव फास्ट ट्रैक पर मिला, जबकि ट्रेन स्लो लाइन पर थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि प्लेटफॉर्म नंबर 2 और 3 संयुक्त हैं और ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृतक ट्रैक पार कर रहा था.

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