यह ख़बर 24 जून, 2012 को प्रकाशित हुई थी

'रुपये की सेहत के लिए सब्सिडी कटौती, आर्थिक सुधार जरूरी'

खास बातें

  • विश्लेषकों का कहना है कि रुपया और नीचे जा सकता है और यह जल्द ही एक डॉलर के मुकाबले 58 के स्तर पर पहुंच सकता है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा उठाए गए विनियामक कदमों का मुद्रा पर कोई खास असर होता नहीं दिखता।
नई दिल्ली:

विश्लेषकों का कहना है कि रुपया और नीचे जा सकता है और यह जल्द ही एक डॉलर के मुकाबले 58 के स्तर पर पहुंच सकता है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा उठाए गए विनियामक कदमों का मुद्रा पर कोई खास असर होता नहीं दिखता।

डीलॉइटी इंडिया के वरिष्ठ निदेशक, अनीस चक्रवर्ती ने कहा, "मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं। आरबीआई के हस्तक्षेप का कोई खास असर नहीं होगा, क्योंकि मुद्दा ढांचागत है।"

ज्ञात हो कि आरबीआई द्वारा लगातार कई विनियामक कदम उठाए जाने के बावजूद रुपये में गिरावट जारी है।

आंशिक रूप से परिवर्तनीय रुपया शुक्रवार को दिन के कारोबार के दौरान रिकार्ड स्तर पर गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 57.33 पर पहुंच गया। सप्ताह के सभी पांचों कारोबारी दिन में नकारात्मक रुख के साथ रुपया अंतिम कारोबारी दिन एक डॉलर के मुकाबले 57.12 पर बंद हुआ।

पिछले एक वर्ष में रुपये की कीमत एक डॉलर के मुकाबले पूरे 22 प्रतिशत कम हुई है। अप्रैल से लेकर अबतक रुपये में 11 प्रतिशत का अवमूल्यन हुआ है।

वास्तव में जनवरी 2008 में एक डॉलर के मुकाबले 39 के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचने के बाद से रुपये में 46 प्रतिशत से अधिक का अवमूल्यन हुआ है।

चक्रवर्ती ने कहा कि यदि आर्थिक विकास और सब्सिडी के ढांचागत मुद्दे से नहीं निपटा गया तो मध्यम अवधि में रुपये में गिरावट जारी रहेगी।

चक्रवर्ती ने कहा, "गिरावट के खतरे अधिक हैं। यह जल्द ही 58 के स्तर पर पहुंच सकता है, या इससे भी नीचे जा सकता है।" उन्होंने कहा कि वैश्विक और घरेलू कारणों से हाल के महीनों में रुपया बहुत तेजी से कमजोर हुआ है।

सीएनआई रिसर्च लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, किशोर पी. ओस्तवाल ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का रुपये पर अपेक्षित असर नहीं हुआ है और यह बाजार के लिए लगातार चिंता बना हुआ है।

ओस्तवाल ने कहा, "कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट एक बड़ी राहत है, क्योंकि इससे पेट्रोल कीमतें घटने की आशा जगी है, जिससे महंगाई रोकने में मदद मिलेगी। चिंता का विषय रुपया है, और यह सिरदर्द बन रहा है।"

एचएसबीसी ने एक शोध रपट में कहा है कि रुपया एक डॉलर के मुकाबले लगभग 57 के आसपास बना रह सकता है।

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एचएसबीसी ने रपट में कहा है, "डॉलर के मुकाबले रुपये में अधिक अर्थपूर्ण मजबूती और स्थिरता के लिए सरकार को आवश्यक ढांचागत सुधार करने की आवश्यकता है।"