नई दिल्ली:
अगर मॉनसून पर अल नीनो का असर रहता है और बारिश कम होती है, तो दलहन उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। इससे लोगों का रसोई का बजट गड़बड़ा सकता है।
उद्योग मंडल एसोचैम के एक अध्ययन में कहा गया है कि यदि ऐसा हुआ तो दालें भी प्याज की तरह आम आदमी के आंसू निकाल सकती हैं। देश में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश महत्वपूर्ण दलहन उत्पादक राज्य हैं। इन राज्यों में दलहन का 80 फीसदी उत्पादन होता है।
बारिश कम रहने पर इन राज्यों में दलहन उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। अध्ययन में कहा गया है, भारत की आयात पर अधिक निर्भरता, अधिक कीमतें और दलहन की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होना चिंता के विषय हैं। अध्ययन में कहा गया है कि दलहन की मांग और आपूर्ति का भारी अंतर इनकी कीमतों पर भारी दबाव डालता है और इसलिए समय पर बचावकारी कदम उठाने की आवश्यकता है।
पिछले तीन सालों में उत्पादन में वृद्धि के बावजूद आने वाले सालों में दलहन की घरेलू मांग आपूर्ति से कहीं अधिक रहने की संभावना है। चार वर्षों तक सामान्य और सामान्य से बेहतर बारिश के बाद भारत में इस वर्ष सामान्य से कम मॉनसून रहने की आशंका है। इस साल बारिश 95 प्रतिशत होने की उम्मीद है। मौसम विभाग के अधिकारियों ने पहले कहा था कि अल नीनो प्रभाव के कारण मॉनसून सामान्य से कम रह सकता है।
अल नीनो को आमतौर पर समुद्री पानी के गर्म होने के साथ संबद्ध किया जाता है। इस भविष्यवाणी को ध्यान में रखते हुए एसोचैम के अध्ययन में पाया गया है कि भारत वर्ष 2016 तक करीब 2.1 करोड़ टन दलहन का उत्पादन कर सकता है, जबकि अगले कुछ सालों में मांग करीब 2.3 करोड़ टन हो सकती है।
एसोचैम के अनुसार दलहन का उत्पादन 2.2 से 2.3 करोड़ हेक्टेयर में किया जाता है, जहां वार्षिक उत्पादन करीब 1.3 से 1.8 करोड़ टन का होता है। दुनिया भर में दलहनों की जितने रकबे में खेती होती है, उसमें भारत का हिस्सा 33 प्रतिशत का है और यहां वैश्विक उत्पादन के 24 प्रतिशत भाग का उत्पादन होता है। देश में दलहन की उपलब्धता बढ़ाने और प्रति व्यक्ति खपत की स्थिति में सुधार लाने के लिए अध्ययन में प्रौद्योगिकीय उन्नयन, उपज बढ़ाने और खेती का रकबा बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया है।