खास बातें
- न्यायालय ने कहा कि किसी कर्मचारी के भविष्य निधि, ग्रेच्युटी को किसी ऋण को निपटाने में किसी भी व्यवस्था के तहत संलग्न नहीं किया जा सकता।
गांधीनगर: गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी कर्मचारी के भविष्य निधि और ग्रेच्युटी को किसी ऋण या दायित्व के मामले को निपटाने में किसी भी व्यवस्था के तहत संलग्न नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारी को भविष्य निधि और ग्रेच्युटी की राशि मिलने के बाद उसके इस्तेमाल से नहीं रोका जा सकता। वह जिस भी तरीके से चाहे इस राशि का इस्तेमाल कर सकता है। न्यायमूर्ति केए पुज की एकल पीठ ने विट्ठलभाई बारोट की याचिका पर यह आदेश दिया और मेहसाणा की एक अदालत के आदेश को दरकिनार कर दिया। मामले के अनुसार दूधसागर डेयरी इम्प्लाईज क्रेडिट एंड सप्लाई को-ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड ने बारोट के खिलाफ 15.3 लाख रुपये की वसूली का एक मुकदमा दायर किया था। अदालत ने 1996 में मुकदमा दायर करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ बारोट ने गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव ट्रिब्युनल में याचिका दायर की। ट्रिब्युनल ने याचिका खारिज कर दी। उसके बाद दूधसागर सोसायटी ने मेहसाणा की एक अदालत में आदेश के क्रियान्वयन के लिए याचिका दायर की। इस दौरान सोसायटी ने मेहसाणा डिस्ट्रिक्ट मिल्क पर्चेजर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड को यह निर्देश देने के लिए अदालत में एक याचिका दायर की कि बारोट को पेंशन, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि और छुट्टियों के नकदीकरण से जो राशि मिलने वाली है, उसे दूधसागर सोसायटी को सीधे भुगतान कर दिया जाए। बारोट ने विभिन्न आधार पर इस याचिका का विरोध किया, लेकिन अदालत ने फिर भी 2004 में इस बाबत निर्देश जारी कर दिया और बारोट को मिलने वाली धनराशि से 3.66 लाख रुपये काट लिए गए और उसे दूधसागर सोसायटी के खाते में जमा करा दिया गया। बारोट ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शनिवार को उपलब्ध हुए एक आदेश में कहा, "यदि याचिकाकर्ता (बारोट) को प्राप्त होने वाली भविष्य निधि और ग्रेच्युटी की राशि सिविल जज के आदेश के अनुसार प्रतिवादी (दूधसागर सोसायटी) के खाते में जमा हो गई है, तो उस राशि को तत्काल याचिकाकर्ता के नियोक्ता को वापस कर दिया जाए, क्योंकि प्रतिवादी किसी भी परिस्थिति में इस राशि को संलग्न नहीं कर सकता।" अदालत ने कहा, "यह धनराशि वापस हो जाए और नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को इसका भुगतान कर दिया जाए, उसके बाद निश्चित रूप से यह राशि याचिकाकर्ता की हो सकती है। लेकिन इस स्तर पर अदालत इस राशि के इस्तेमाल से उसे रोकने के लिए कोई आदेश नहीं दे सकती।"