खास बातें
- आम जनता उम्मीद लगाए हुए है कि बजट में कुछ ऐसे प्रावधान जरूर होंगे, जिनसे महंगाई से राहत मिलेगी।
नई दिल्ली: वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी सोमवार को संसद में अपना छठा राष्ट्रीय बजट पेश करेंगे। आम जनता उम्मीद लगाए हुए है कि बजट में कुछ ऐसे प्रावधान जरूर होंगे, जिनसे महंगाई से राहत मिलेगी और उद्योग जगत ऐसे उपायों की उम्मीद लगाए बैठा है, जिससे मांग बढ़े और कर का बोझ कम हो। विशेषज्ञ इस मुद्दे पर अभी बंटे हुए हैं कि बजट का रुख महंगाई विरोधी होगा या वृद्धि बढ़ाने वाला। लेकिन इस बात से हर कोई सहमत है कि वित्त मंत्री को दोनों तरफ संतुलन बनाए रखना होगा। अर्थव्यवस्था की स्थिति का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड, आर्थिक समीक्षा 2010-11 ने संकेत दिया है कि महंगाई कम से कम अल्प से मध्यम अवधि तक के लिए बनी रहेगी, भले ही देश का सकल घरेलू उत्पाद इस वित्त वर्ष में 8.6 प्रतिशत और अगले वित्त वर्ष में नौ प्रतिशत क्यों न रहे। 12 फरवरी को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य महंगाई की दर पूर्व के सप्ताह के 11.05 प्रतिशत के मुकाबले 11.49 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। खाद्य पदार्थों की कीमतों को नापने वाला पैमाना 2010-11 के दौरान अधिकांश समय दो अंकों में बना रहा है। थोक मूल्य पर आधारित वार्षिक मुद्रास्फीति की दर जनवरी में 8.23 प्रतिशत थी। मुखर्जी को अक्सर सरकार का संकटमोचक कहा जाता रहा है, लेकिन उनके सामने एक दूसरी समस्या आ खड़ी हुई है। मध्य पूर्व एवं लीबिया में जारी अशांति के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें शुक्रवार को लगभग 112 डॉलर प्रति बैरेल पहुंच गईं। इससे इस बात की चिंता बनी हुई है कि अरब जगत में राजनीतिक अशांति के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। चूंकि अब तेल विपणन से जुड़ी कम्पनियों को इस बात की छूट है कि वे वैश्विक कीमतों के आधार पर पेट्रोल बेच सकती हैं, लिहाजा तेलों की कीमतों में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी महंगाई को और हवा ही देगी। इसके अलावा सरकार के सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम भी हैं, जिनमें उचित ऑडिट के अभाव में पहले से ही निर्धारित कोष की बड़ी मात्रा लीक हो रही है। इनमें से तमाम कार्यक्रमों को सरकार बंद नहीं कर सकती, क्योंकि कई राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। मुखर्जी को राजस्व वसूली बढ़ाने और वित्तीय घाटे को कम करने के लिए खर्च में कटौती करने के रास्ते भी तलाशने होंगे। इस वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा 5.5 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है। अब देखना यह है कि क्या वह मार्च 2012 के अंत तक वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.5 प्रतिशत पर ला पाते हैं या नहीं। विशेषज्ञों को इस पर संदेह है, क्योंकि खाद्य, उर्वरक, तेल पर लगातार सब्सिडी जारी है और राजस्व में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है।