- विजयपत सिंघानिया ने 1988 में माइक्रोलाइट एयरक्राफ्ट से लंदन से अहमदाबाद तक जोखिम भरी यात्रा की थी
- उन्होंने 2005 में हॉट एयर बैलून से 69,852 फीट की ऊंचाई छूकर विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया था
- भारतीय वायुसेना ने 1994 में उन्हें हॉनरेरी एयर कमोडोर की उपाधि देकर असाधारण उपलब्धियों को सम्मानित किया था
Vijaypat Singhania: कमाल की शख्सियत थे भई, विजयपत सिंघानिया! इसे शौक कहें, जिद या जुनून कि एक छोटा-सा माइक्रोलाइट एयरक्राफ्ट लेकर लंदन से अहमदाबाद के लिए निकल पड़े थे, विजयपत. इतना छोटा एयरक्राफ्ट जो थोड़ी ही देर में आसमान में पतंग-सा दिखने लगता था. मौसम जरा खराब हुआ या फिर छोटी-मोटी तकनीकी खराबी भी आई तो जान पर आफत हो जाती! लेकिन विजयपत कहां मानने वाले थे. वो साल था-1988, जब उन्होंने अपने फौलादी पंखों से हौसलों की ऐसी उड़ान भरी कि पूरी दुनिया ने सलाम किया. फिर एक मौका आया और हॉट एयर बैलून में भी उन्होंने सबसे ऊंची उड़ान भरते हुए विश्वरिकॉर्ड बना डाला.
विजयपत सिंघानिया केवल 'रेमंड' के मालिक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे आधुनिक 'इकारस' थे जिन्होंने मोम के नहीं, बल्कि फौलाद के पंखों से आसमान को नापा था. उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा मखमली सूटों के बीच नहीं, बल्कि आसमान में विमानों के शोर और बादलों की गहराइयों में बीता. जीवन के आखिरी हिस्से में आकर उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखी, An Incomplete Life: The Autobiography, जिसमें उन्होंने अपने इस रोमांच के बारे में भी बताया है.
कैसे हुआ आसमान का 'जुनून'?
विजयपत सिंघानिया को विमानन (Aviation) का शौक विरासत में नहीं मिला, बल्कि यह उनके भीतर की उस छटपटाहट से उपजा था जो सीमाओं को नहीं मानती थी. 1980 के दशक में, जब वे रेमंड की कमान संभाल रहे थे, तब उन्होंने पाया कि कॉकपिट में बैठना उन्हें वह शांति और नियंत्रण देता है जो बोर्डरूम की बैठकों में संभव नहीं था. उनके लिए उड़ना केवल एक शौक नहीं, बल्कि खुद को साबित करने का जरिया था.
उनका यह जुनून तब दुनिया के सामने आया जब 1988 में उन्होंने एक दुस्साहसी फैसला लिया. उन्होंने एक छोटे से 'माइक्रोलाइट' एयरक्राफ्ट (जो आकार में किसी बड़ी पतंग जैसा दिखता था) से अकेले ही लंदन से अहमदाबाद तक का सफर तय करने की ठानी. करीब 7,000 किलोमीटर की यह यात्रा अत्यंत जोखिम भरी थी, क्योंकि छोटे विमान खराब मौसम और तकनीकी खराबी के सामने बहुत कमजोर होते हैं. लेकिन सिंघानिया ने अपनी जिद और कौशल से इसे पूरा किया और रातों-रात दुनिया के नक्शे पर एक महान 'एविएटर' के रूप में उभर कर आए.
भारतीय वायुसेना का 'हॉनरेरी एयर कमोडोर'
विजयपत सिंघानिया का एिवएशन के प्रति समर्पण और उनकी उपलब्धियां इतनी असाधारण थीं कि भारतीय वायुसेना (IAF) ने उन्हें एक दुर्लभ सम्मान से नवाजा. 1994 में, उन्हें 'हॉनरेरी एयर कमोडोर' की उपाधि दी गई.
ये उपाधि उन्हें इसलिए दी गई क्योंकि उन्होंने एक नागरिक होकर भी विमानन के क्षेत्र में वह अनुशासन और साहस दिखाया था जो आमतौर पर केवल प्रशिक्षित लड़ाकू पायलटों में देखा जाता है. वायुसेना ने उनके विश्व रिकॉर्ड्स और देश का नाम रोशन करने के जज्बे को सलाम किया. वे उन गिने-चुने नागरिकों में शामिल थे जिन्हें वायुसेना की वर्दी पहनने का गौरव प्राप्त हुआ.
पद्म भूषण: देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
साल 2006 में भारत सरकार ने विजयपत सिंघानिया को 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया. भारत रत्न और पद्मभिूषण के बाद ये देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है.
इसके पीछे उनका सामाजिक और व्यापारिक योगदान रहा. उन्होंने 'रेमंड' को एक वैश्विक ब्रांड बनाकर भारतीय वस्त्र उद्योग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. उन्होंने न केवल इकोनॉमी में योगदान दिया, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार भी दिया.
2005 में, 67 वर्ष की आयु में, उन्होंने एक हॉट एयर बैलून के जरिए 69,852 फीट की ऊंचाई छूकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और शून्य से भी नीचे के तापमान में जाना जानलेवा हो सकता था, लेकिन उन्होंने 'आकाश को चूमकर' भारत का मस्तक ऊंचा किया.
उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि उम्र केवल एक संख्या है. वे एक ऐसे 'कंप्लीट मैन' थे जिन्होंने जमीन पर साम्राज्य खड़ा किया और आसमान में अपनी इबारत लिखी.
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