- अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर डील के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने पर सहमति बनी है
- ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी तेल की कीमतों में करीब पंद्रह से सोलह प्रतिशत की गिरावट आई है
- सीजफायर से फिलहाल राहत मिली है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि खतरा बना हुआ है
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की डील होते ही दुनियाभर में तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई और शेयर बाजार उछल पड़े. इस समझौते में सबसे अहम बात यह है कि हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने पर सहमति बनी है, जो दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम रास्ता है.
कीमतें अब भी ज्यादा
ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 15.9 प्रतिशत गिरकर 92.30 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई, जबकि अमेरिका में ट्रेड होने वाला तेल भी लगभग 16.5 प्रतिशत टूटकर 93.80 डॉलर तक पहुंच गया,लेकिन राहत के बावजूद कीमतें अभी भी उस स्तर से ज्यादा हैं, जब 28 फरवरी को यह संघर्ष शुरू हुआ था. उस वक्त तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल पर था.
क्यों बढ़ी थीं कीमतें?
मिडिल ईस्ट से तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो गई थी. ईरान ने धमकी दी थी कि अगर उस पर अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले जारी रहे, तो वह हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमला कर सकता है. इसी वजह से एनर्जी की कीमतों में तेज उछाल आया.
शेयर बाजार में तेजी
सीजफायर की खबर आते ही एशिया पैसिफिक के बाजारों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली. जापान का निकेई 225 करीब 4.5 प्रतिशत चढ़ गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगभग 5.5 प्रतिशत उछल गया. निवेशकों ने राहत की सांस ली और बाजार में भरोसा लौटा.
ट्रंप का सख्त लेकिन रणनीतिक बयान
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि वह दो हफ्तों के लिए ईरान पर हमले रोकने को तैयार हैं, लेकिन शर्त यह है कि ईरान तुरंत और सुरक्षित तरीके से हॉर्मुज खोले. उन्होंने एक तय समय सीमा भी दी थी और चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो हालात बेहद खतरनाक हो सकते हैं.
ईरान की शर्त
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आरागची ने कहा कि अगर ईरान पर हमले रोके जाते हैं, तो वह सीजफायर के लिए तैयार है. साथ ही हॉर्मुज से सुरक्षित आवाजाही फिर से संभव बनाई जाएगी.
अभी भी क्यों बना है खतरा?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप पूरी तरह युद्ध बढ़ाने से बचना चाहेंगे, क्योंकि इससे तेल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ सकती हैं और यह खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है. यह एक तरह से खुद के लिए आर्थिक नुकसान का जोखिम होगा, खासकर तब जब उनकी लोकप्रियता पर भी दबाव है.
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एशिया पर सबसे ज्यादा असर
➔ईरान युद्ध का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ा है, क्योंकि ये देश खाड़ी क्षेत्र से आने वाली ऊर्जा पर काफी निर्भर हैं. कई सरकारों और कंपनियों ने हाल के हफ्तों में महंगे ईंधन और कमी से निपटने के लिए कदम उठाए.
➔24 मार्च को फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया, क्योंकि पेट्रोल की कीमतें दोगुनी से ज्यादा हो गई थीं.
➔जेट फ्यूल महंगा होने की वजह से कई एयरलाइंस ने टिकट के दाम बढ़ा दिए और कुछ उड़ानें कम कर दीं.
कुल मिलाकर सीजफायर से फिलहाल राहत जरूर मिली है. तेल सस्ता हुआ और बाजार में तेजी आई. लेकिन खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है.अगर यह समझौता टूटता है, तो तेल की कीमतें फिर से तेजी से बढ़ सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नया दबाव आ सकता है. यानी अभी की राहत अस्थायी है और आगे की स्थिति इस समझौते पर निर्भर करेगी.
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