लेंडर्स ने वेदांता की ज्यादा बोली होने के बाद भी अदाणी के तुरंत भुगतान मॉडल को क्यों चुना? एक्सपर्ट से जानें

वेदांता ने ज्यादा पैसे की बोली लगाई थी, लेकिन अदाणी का प्रस्ताव तुरंत ज्यादा नकद देने और जल्दी भुगतान करने की वजह से बेहतर माना गया. एक्सपर्ट के अनुसार यही बातें बैंकों के लिए ज्यादा अहम थीं.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins

जेपी ग्रुप की बड़ी कंपनी जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. वेदांता ने लेनदारों की समिति (CoC) के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने वेदांता की ज्यादा बोली होने के बावजूद अदाणी समूह की योजना को चुन लिया. एक्सपर्ट का मानना है कि नेट प्रसेंट वैल्यू को देखते हुए लेंडर्स ने अदाणी को चुना.

क्या है विवाद?

जेपी एसोसिएट्स (JAL) की समाधान प्रक्रिया के दौरान, कर्जदाताओं की समिति (CoC) ने अदाणी ग्रुप की बोली को मंजूरी दी थी. वेदांता ने इसे चुनौती देते हुए दावा किया कि उसकी बोली ज्यादा मूल्य की थी. हालांकि, कर्जदाताओं ने अदाणी की योजना को इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि उसमें अपफ्रंट कैश यानी तुरंत मिलने वाला अमाउंट ज्यादा था और भुगतान की समयसीमा भी कम थी.

नेट प्रसेंट वैल्यू है अहम

क्रॉफर्ड बेली के वरिष्ठ पार्टनर संजय अशर ने कहा कि किस बोली से ज्यादा फायदा है, ये बैंक सबसे अच्छी तरह जानते हैं और अदालतें इसमें दखल नहीं देतीं, जब तक कोई गलत इरादा या धांधली ना दिखे. नियोस्ट्रेट एडवाइजर्स के संस्थापक अबीजर दीवानजी ने भी कहा कि सिर्फ ऊपर‑ऊपर दिखने वाले आंकड़े मायने नहीं रखते. असली ध्यान इन बातों पर होता है कि नेट प्रसेंट वैल्यू कितनी है, वसूली की संभावना और प्लान को सही तरह से लागू करने की क्षमता क्या है. उन्होंने साफ कहा कि लंबे समय तक टाले गए भुगतान में ज्यादा जोखिम होता है. IBC के तहत किसी कंपनी को बचाना सिर्फ पैसे की वसूली नहीं है. इसमें व्यवसाय को चलने देना, रोजगार बचाना और लंबी अवधि में मूल्य बनाना भी शामिल है.

ये भी पढ़ें- अदाणी पोर्ट्स ने रचा इतिहास, 500 मिलियन टन कार्गो हैंडल करने वाली पहली कंपनी बनी, गौतम अदाणी ने बताया- उपलब्धि क्‍यों है खास

Advertisement

मार्केट एक्सपर्ट देवेन चोकसी ने बताया कि जेएएल की संपत्तियां चाहे वो सीमेंट, बिजली, लॉजिस्टिक्स या जमीन से जुड़ी हों, अदाणी समूह के मौजूदा कारोबार के लिए अच्छी तरह फिट बैठती हैं. उनके मुताबिक, भले ही अदाणी समूह को इन संपत्तियों को लेने में कुछ शुरुआती नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन इससे उनकी कुल ताकत बढ़ती है, जिससे लेंडर्स का भरोसा भी बढ़ता है.

पूर्व बैंकर और सलाहकार नरेश मल्होत्रा ने समझाया कि लेंडर्स के लिए केवल बोली का दाम ही जरूरी नहीं होता. उनके लिए ये ज्यादा जरूरी है कि बोली लगाने वाली कंपनी कितनी भरोसेमंद है और काम को समय पर पूरा कर सकती है या नहीं. क्योंकि लोन अक्सर कई किस्तों में वापस मिलता है, इसलिए कंपनी की वित्तीय स्थिति और उसका ट्रैक रिकॉर्ड अहम होते हैं.

Advertisement

वहीं कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मुकदमे लंबे समय तक चलते रहे, तो दिवालियापन कानून (IBC) की असली मंशा ही कमजोर हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वप्निल कोठारी ने कहा कि कोर्ट तभी दखल देगा, जब कोई बड़ी कानूनी गलती दिखाई दे. उन्होंने ये भी कहा कि दिवालिया कंपनियों का समाधान तेजी से होना जरूरी है. कई बार, जल्दी मिला हुआ हल, भले ही रकम थोड़ी कम हो देरी से मिलने वाले ज्यादा पैसे से बेहतर साबित होता है.

ये भी पढ़ें- अदाणी ग्रीन एनर्जी का दुनिया में बजा डंका, एक साल में रिकॉर्ड 5GW रिन्यूएबल कैपिसिटी जोड़कर बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड, शेयरों में उछाल

(Disclaimer: New Delhi Television is a subsidiary of AMG Media Networks Limited, an Adani Group Company.)

Featured Video Of The Day
West Bengal Elections 2026: बंगाल में SIR बनेगा BJP Masterstroke? | Rahul Kanwal | TMC | BJP
Topics mentioned in this article