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एक खूबसूरत लव स्टोरी है सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की 'दो दीवाने सहर में’, 'संदीपा धर ने फिल्म को लेकर कही ये बात

20 फरवरी को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ में नैना के किरदार में नजर आने जा रही संदीपा धर ने हाल ही में अपने फैंस के साथ एक ऐसा भावुक और सच्चा अनुभव साझा किया है, जिससे हम सब कभी न कभी गुजरे होंगे.

एक खूबसूरत लव स्टोरी है सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की 'दो दीवाने सहर में’, 'संदीपा धर ने फिल्म को लेकर कही ये बात
एक खूबसूरत लव स्टोरी है 'दो दीवाने सहर में’
नई दिल्ली:

20 फरवरी को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘दो दीवाने सहर में' में नैना के किरदार में नजर आने जा रही संदीपा धर ने हाल ही में अपने फैंस के साथ एक ऐसा भावुक और सच्चा अनुभव साझा किया है, जिससे हम सब कभी न कभी गुजरे होंगे. फिल्म में मृणाल ठाकुर की बहन बनी संदीपा धर ने जिस खूबसूरती से अपनी बात रखी है, उससे उनके फैंस उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं. हालांकि अपने इस पोस्ट के जरिए उन्होंने न सिर्फ समाज की सच्चाई सामने रखी है, बल्कि फिल्म के भावनात्मक पहलू को भी उजागर किया है.

संदीपा ने अपने सोशल मीडिया पर एक संदेश के साथ कड़वी सच्चाई बयां करते हुए लिखा है, “अपने भाई या बहन को देखो, वह कितना अच्छा है… यह एक ऐसा वाक्य है जो बचपन की अनकही यादों को तुरंत जगा देता है." इस नोट के साथ उन्होंने बताया, फिल्म में नैना और रोशनी का रिश्ता इसी तुलना के दुष्चक्र से गुजरता है. रोशनी को बार-बार यह एहसास दिलाया जाता है कि वह ‘काफी नहीं' है, और नैना पर ‘बहुत ज़्यादा परफेक्ट' बने रहने का दबाव रहता है. संदीपा के मुताबिक, नैना का किरदार निभाते हुए उन्हें समझ आया कि कैसे लगातार तुलना किसी की पहचान, आत्मविश्वास और रिश्तों को धीरे-धीरे खोखला कर देती है.

संदीपा कहती हैं कि तुलना, भाई-बहनों को प्रतिद्वंद्वी बना देती है, प्यार को शर्तों से जोड़ देती है और ऐसे ज़ख्म छोड़ जाती है जिन्हें भरने में सालों लग जाते हैं. माता-पिता, शिक्षक या रिश्तेदार अक्सर अनजाने में कहे गए “अपनी बहन जैसी बनो” जैसे वाक्यों के असर को नहीं समझ पाते, लेकिन वही बातें जीवन भर दिमाग में गूंजती रहती हैं.

गौरतलब है कि रोमांस से आगे बढ़कर, 'दो दीवाने सहर में' एक ऐसी सच्चाई को सामने लाती है, जिसे आप छोटी उम्र से ही महसूस करना शुरू कर देते हैं.  यकीन मानिए, यह तुलना सिर्फ बचपन को नहीं, बल्कि इंसान की पूरी पहचान को आकार देती है. ऐसे में ये फिल्म दर्शकों से भी एक सीधा सवाल पूछती है कि बचपन में आप नैना थीं या रोशनी?
 

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