भारतीय सिनेमा आज दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में गिना जाता है. हर साल हजारों फिल्में बनती हैं और करोड़ों लोग इन्हें देखते हैं. एक समय ऐसा भी था, जब भारत में फिल्मों का कोई नामोनिशान नहीं था. उस दौर में एक इंसान ने सपना देखा कि भारत की अपनी फिल्में होंगी, अपनी कहानियां होंगी और अपने कलाकार होंगे. उस शख्स का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें दुनिया दादासाहेब फाल्के के नाम से जानती है. फिल्मों के प्रति उनका जुनून इतना जबरदस्त था कि उन्होंने फिल्म बनाने की तकनीक सीखने के लिए अपनी बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी. वहीं, उनकी पत्नी सरस्वती फाल्के ने भी अपने गहने बेचकर उनका साथ दिया. इन्हीं त्याग और संघर्षों से भारतीय सिनेमा की नींव रखी गई.
फोटोग्राफर के तौर पर शुरू किया करियर
दादासाहेब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में हुआ था. उनके पिता संस्कृत के बड़े विद्वान थे. बचपन से ही फाल्के को कला में काफी रुचि थी. उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फोटोग्राफर के रूप में काम शुरू किया. बाद में उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस भी चलाया. उनकी जिंदगी आसान नहीं थी. कारोबार में नुकसान हुआ और कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.

विदेशी फिल्म देखकर आया फिल्म मेकिंग का विचार
उनकी जिंदगी तब बदली जब उन्होंने एक विदेशी फिल्म 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखी. फिल्म देखते समय उनके मन में विचार आया कि अगर विदेशी लोग अपने धार्मिक किरदारों पर फिल्म बना सकते हैं, तो भारत में 'रामायण' और 'महाभारत' जैसी कहानियों पर फिल्म क्यों नहीं बन सकती. बस यहीं से उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखने का फैसला कर लिया.
पढ़ाई के लिए चले गए लंदन
उस समय भारत में फिल्म बनाना लगभग असंभव काम माना जाता था. न किसी को कैमरे की जानकारी थी और न ही फिल्म बनाने की तकनीक का अनुभव था. फाल्के ने तय किया कि वह खुद यह कला सीखेंगे. इसके लिए उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी गिरवी रखी और लंदन चले गए. वहां उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं और जरूरी उपकरण खरीदकर भारत लौट आए.
भारत आकर सबसे पहले बनाई राजा हरिश्चंद्र, पत्नी ने संभाली फाइनैंस से लेकर खाने-पीने तक की जिम्मेदारी
भारत लौटने के बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने की तैयारी शुरू की. लेकिन सबसे बड़ी परेशानी पैसों की थी. ऐसे मुश्किल समय में उनकी पत्नी सरस्वती फाल्के उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं. उन्होंने अपने गहने तक गिरवी रख दिए ताकि फिल्म पूरी हो सके. यही नहीं, सरस्वती फिल्म की पूरी टीम के लिए खाना बनाती थीं, कलाकारों के कपड़े संभालती थीं और शूटिंग के दौरान हर छोटे-बड़े काम में मदद करती थीं.

1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज हुई और यह भारत की पहली फीचर फिल्म बनी. फिल्म को लोगों ने खूब पसंद किया. इसके बाद दादासाहेब फाल्के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने 'मोहिनी भस्मासुर', 'सत्यवान सावित्री', 'लंका दहन', 'श्रीकृष्ण जन्म' और 'कालिया मर्दन' जैसी कई सफल फिल्में बनाईं. अपने लगभग 19 साल के करियर में उन्होंने 95 फीचर फिल्में और 26 शॉर्ट फिल्में बनाई थीं.
1937 में रिलीज हुई आखिरी फिल्म
हालांकि समय के साथ सिनेमा बदलने लगा. मूक फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ले ली. फाल्के इस बदलाव के साथ ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए. उनकी आखिरी फिल्म 'गंगावतरण' थी, जो 1937 में रिलीज हुई थी. इसके बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली. 16 फरवरी 1944 को दादासाहेब फाल्के ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन भारतीय सिनेमा में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा. उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' शुरू किया, जिसे भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं