- राकेश बेदी ने 1979 में फिल्म हमारे तुम्हारे से अभिनय की शुरुआत की थी, लेकिन पहचान चश्मे बद्दूर से मिली
- चश्मे बद्दूर 1981 में रिलीज हुई थी, जिसका निर्देशन सई परांजपे ने किया और इसमें तीन दोस्तों की कहानी थी
- फिल्म दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र जीवन और 1980 के दशक की दिल्ली की सादगीपूर्ण जिंदगी को बखूबी प्रस्तुत करती है
Rakesh Bedi Chashme Buddoor Movie: कहते हैं जो दिखता है बिकता है. बेशक सिनेमा की दुनिया में कई बार ये दिखने वाला, काफी समय भी ले लेता है. हालांकि ये होता सबके सामने है, लेकिन दिखता लेट है. अब धुरंधर हिट हुई तो नई पीढ़ी को पता चला कि राकेश बेदी कौन है. ये भी पता चला कि राकेश बेदी कमाल के एक्टर है. ये भी पता चला कि वह हर किरदार में उतरने की कूव्वत रखते हैं. ये भी कहा जा रहा है कि उन्हें स्टार बनने में लगभग पांच दशक का समय लग गया. लेकिन जनाब आप कुछ भी कहें, इसमें कोई शुबहा नहीं कि राकेश बेदी को कुछ ऐसे लोगों ने अब जाना, जिनका पहले क्वालिटी फिल्मों से वास्ता पड़ नहीं पाया. या फिर यह कहें कि नई पीढ़ी इस सितारे तक अब पहुंच पाई. लेकिन वो तो हमेशा से यहीं थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे खाने में आज पॉपुलर हुए मिलेट्स भारत के ग्रामीण इलाकों में कई सौ साल से खाए जा रहे थे.
मैं आपको यहां बता देना चाहूंगा कि राकेश बेदी ने 1979 में फिल्म 'हमारे तुम्हारे' से डेब्यू किया था. लेकिन उन्हें पहचान मिली 'चश्मे बद्दूर' से. अरे हुजूर, यहां कन्फ्यूज मत हो जाइएगा क्योंकि जो 'चश्मेबद्दूर' आप सोचने लगे होंगे वो डेविड धवन वाली होगी. ये हम ओरिजिनल 'चश्मे बद्दूर' की बात कर रहे हैं जो 1981 में रिलीज हुई थी. ये तीन दोस्तों और रोमांस की दुनिया में उनके एडवेंचर की कहानी थी. जिसका निर्देशन सई परांजपे ने किया था. आइए 45 साल बाद एक बार फिर नजर डालते हैं राकेश बेदी की इस फिल्म पर...

चश्मे बद्दूर की कहानी
चश्मे बद्दूर की कहानी दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले तीन युवाओं फारुख शेख, रवि बासवानी और राकेश बेदी की है. ब्रोमांस के दिन, फक्कड़पने के दिन और उसमें एक लड़की की एंट्री. 1980 के दशक की शांत खुली-खुली दिल्ली, और उसमें तीन दोस्तों के रोमांटिक एडवेंचर. अब उस जमाने में मोबाइल तो होता नहीं था और ना ही डेटिंग साइट्स और ना ही सोशल मीडिया ऐप्स. अब कौन कहां किस से टकरा जाए और टकरा भी जाए तो दोबारा उसे कैसे खोज पाएं. ये बड़े सवाल हुआ करते थे.
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अब ऐसे में कई बार तो लड़की का पीछा करते हुए उसके घर तक जाना पड़ता था. फिर घर में एंट्री कैसे पाएं, ये भी आसान जुगत नहीं थी. बस दो दोस्त कुछ ऐसा ही करते नजर आते हैं और दिलजले बनते हैं. फिल्म के कैरेक्टर एक से एक दिलचस्प. अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में पान की दुकान वाले सईद जाफरी हों या फिर दीप्ति नवल के पहलवान टाइप भाई. अब सईद जाफरी की बात करें तो वो एक्टर रहे हैं जिनके बोलने का स्टाइल और 'अमां यार' कहना तो दूसरी ही दुनिया का अंदाज है. कहानी सादगी भरी लेकिन बांधकर रख देने वाली.

चश्मे बद्दूर की डायरेक्टर सई पारंजपे, सई जाफरी और दीप्ति नवल (बाएं से दाएं)
चश्मे बद्दूर डायरेक्शन
अब बात करते हैं डायरेक्शन की तो सई परांजपे ऐसी डायरेक्टर रही हैं, जो असल जिंदगी में जितनी जिंदादिल हैं, परदे पर उनकी कहानियां उतनी ही अनोखी होती हैं. इससे पहले 1980 में उनकी फिल्म स्पर्श आई थी जिसके लिए वह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीत चुकी थीं. उनके डायरेक्शन का हुनर ही यही था कि वह रेलिवेंट टॉपिक को छूते हुए कहानी को बहुत ही सादगी के साथ पेश करती थीं और ये दिल में उतर जाती थी. उन्होंने कॉलेज लाइफ और दिल्ली यूनिवर्सिटी की जो बारीकियां पकड़ी हैं वो लाजवाब हैं.
चश्मे बद्दूर में एक्टिंग
अब एक्टिंग की बात करें तो फारुख शेख तो कमाल के एक्टर रहे ही हैं. उन्होंने सीधे-सादे और पढ़ाकू सिद्धार्थ का कैरेक्टर बहुत ही सधे हुए ढंग से निभाया है. लेकिन पढा़ई में निकम्मे लेकिन आशिकी में अव्वल बने ओमी राकेश बेदी और जोमो तो कमाल ही रहे. राकेश बेदी चेहरे से एकदम सादगी समेटे नजर आते हैं, लेकिन किरदार में गहराई दिखाते हैं. फिर सईद जाफरी तो लल्लन मियां के किरदार में आज 45 साल भी जेहन में पूरी तरह से तरोताजा हैं.

चश्मे बद्दूर चलते चलते...
फिल्म का टाइटल पहले 'धुआं धुआं' रखा गया था, लेकिन बाद में इसे बदल गया. दीप्ति नवल वाले रोल के लिए पूनम ढिल्लों को अप्रोच किया गया था,और बात नहीं बन पाई. ये भी आपको बता दें कि इस फिल्म और दीप्ति नवल के साथ चमको ऐसा जुड़ा आज तक कायम है. फिल्म दीप्ति नवल चमको वाशिंग पाउडर के सेल्स गर्ल के तौर पर इन तीन लड़कों से मिलती हैं.
मेरा मानना है कि ब्रोमांस और सच्चे प्यार की बारीकियों को समेटे हुए यह फिल्म अपने आप में कमाल है. समय से परे है और ऐसी फिल्म है जिसे देखते ही कॉलेज के दिन अपने आप से ही जेहन के सामने घूमते रहते हैं. फिर अपने राकेश बेदी के टैलेंट की झलक यहीं मिल गई थी. ये ऐसी फिल्म है जिसे देखकर मन यही कहता है 'चश्मे बद्दूर (जिसके अर्थ होते हैं: एक आशीर्वाद, तुम्हें बुरी नजर न लगे, भगवान बुरी नजर से बचाए)'.
डायरेक्टर: सई परांजपे
कलाकार: फारुख शेख, रवि वासवानी, राकेश बेदी, दीप्ति नवल, सईद जाफरी और लीला मिश्रा
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